आत्म संबोधन

हे आत्मन् ! अनादिकाल से लेकर अनंतानंत काल व्यतीत हो गया आज तक तुम दु:खी ही हो ?
क्यों ? उस दु:ख का कारण क्या है ? कभी सोचा ? यदि नहीं सोचा है तो अब सोचो ? अब तुम्हें जिनेन्द्र देव की वाणी को सुनने का , पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ है अत: अब विचार करो।
ये राग, द्वेष और मोह ही इस संसार में दु:ख के कारण हैं । वैâसे ? सो देखो। इसने मुझे सुख दिया, इसने मुझे दु:ख दिया, यह मेरा शत्रु है, यह मेरा मित्र है। इसने मेरा अपमान कर दिया, इसने मुझे गाली दे दी, कटु शब्द कह दिये, झूठे आरोप लगा दिये। ओह! यह मुझसे बहुत ईष्र्या करता है। यह मेरे ज्ञान को, मेरी उन्नति को, मेरे प्रभाव को, मेरे सुख को देख नहीं सकता है। अरे! यह मुझे पद-पद पर तिरस्कारित कर रहा है इत्यादि।
हे आत्मन्! बस ये ही भाव तो राग, द्वेष के लिये कारण हैं। जिन्हें अनुवूâल समझा उनके प्रति राग और जिन्हें प्रतिवूâल समझा उनके प्रति द्वेष। अरे! इससे तो चौबीस घंटे अशांति ही अशांति है, दु:ख ही दु:ख है।
तो कैसे सुख होगा ? सुनो-

स्वयं कृतं कर्म यदात्मनापुरा, फलं तदीयं लभते शुभाशुभं।
परेण दत्तं यदि लभ्यते स्फुटम्, स्वयं कृतं कर्म निरर्थक तदा।।

मैंने स्वयं जो कुछ भी पहले पुण्य या पाप कर्म किये हैं उन्हीं का फल मुझे आज शुभ या अशुभ-सुख या दु:ख रूप से मिल रहा है। इसमें किसी का कुछ भी दोष नहीं वे तो सब निमित्त मात्र हैं। जैसे सीता को राम ने वन में निकाल दिया, अनंतर सीता ने यही कहा कि इसमें आपका क्या दोष ? यह तो मेरे कर्मों का ही दोष था ।
वास्तव में यदि पर-दूसरे कोई हमें सुख दु:ख दे सकें तो मेरे स्वयं के द्वारा किये गये कर्म व्यर्थ ही हो जावेंगे अत: आज मुझे यह निश्चित विश्वास हो गया है कि मेरे द्वारा किये गये कर्म ही मुझे सुख दु:ख दे रहे हैं अन्य कोई नहीं। देखो, आचार्य कह रहे हैं-

निर्जािजतं कर्म विहाय देहिनो, न कोऽपि कस्यापि ददाति किन्चन।
विचारयन्नेवमनन्यमानस: परो ददातीति विमुंच शेमुशीं।।

हे आत्मन्! अपने द्वारा संचित किये हुये कर्म को छोड़कर कोई भी किसी को विंâचित मात्र भी कुछ नहीं दे सकता है। ऐसा विचार करते हुये हे आत्मन्! तुम एकचित्त होकर-किसी में अपने मन को न लगाकर ‘दूसरे कुछ देते हैं’ ऐसी बुद्धि को छोड़ो । इसी में तुम्हारी भलाई है, तुम्हें शांति है अन्यथा तुम सदा दु:खी रहे हो और आगे भी सदा दु:खी ही रहोगे ।
देखो, अनादिकाल से इस संसार में पाप ही अपना शत्रु है और धर्म ही अपना बंधु है ऐसा श्री समंतभद्रस्वामी ने कहा है-

पाप मरातिर्धर्मो बंधुर्जीवस्य चेति निश्चिन्वन् ।
समयं यदि जानीते श्रेयो ज्ञाता ध्रुवं भवति।।

पाप ही इस जीव का शत्रु है और धर्म ही बंधु है, ऐसा निश्चय करते हुये जो शास्त्र को जानते हैं वे सच्चे ज्ञाता हैं यह निश्चित है।
हे आत्मन् ! दूसरी बात यह भी विचार करने की है कि-
‘‘दु:ख शोक तापाक्रंदन वध परिदेवनान्यात्म परोभयस्थान्यसद्वेद्यस्य’’
दु:ख करना, शोक करना, पश्चाताप करना, रोना, दूसरे का वध करना और ऐसा रोना कि दूसरे भी रो पड़ें। ऐसी क्रियायें स्वयं करना, दूसरों में उत्पन्न कराना या दोनों मिलकर करना आदि। इन सब कार्यों से असाता वेदनीय कर्म का ही बंध होता है जो नियम से आगे-आगे हमें पुन:-पुन: रुलाता है, शोक कराता है इत्यादि।
अत: अब क्या करना चाहिये ? यदि पूर्व में ऐसे असाता का बंध किया था और आज हम उसका फल कडुवा भोग रहे हैं तो हमारा कर्तव्य है कि हम आगे ऐसा काम करें कि जिससे फिर असाता का बंध न हो, पुन: पुन: दु:खी होने , रोने का प्रसंग ही न आवे ।
यदि बार-बार दु:ख, शोक, पश्चात्ताप, रोना आदि होते हैं तो उन्हें दूर करने के लिये क्या करना ? स्वाध्याय करना, इससे तत्त्व ज्ञान प्रगट हो जाता है तब सब दु:ख, शोक पलायमान हो जाते हैं। जिनेन्द्र देव की स्तुति करना, इससे तो बड़े-बड़े भूत, पिशाच, व्यंतर भाग जाते हैं। देखो, आचार्य कहते हैं-

विघ्नौघा: प्रलयं यांति शाकिनी भूतपन्नगा:।
विषं निर्विषतां याति स्तूयमाने जिनेश्वरे।।

जिनेन्द्र देव की स्तुति करने पर सारे के सारे विघ्न समूह नष्ट हो जाते हैं, शाकिनी, भूत, पिशाच, भयंकर सर्प आदि भी भाग जाते हैं और तो क्या, विष भी निर्विष हो जाता है। यह सब पुण्य की महिमा है अत: हे आत्मन् ! तुम ऐसा पुण्य संचित करो कि जिससे तुम्हे फिर कभी दु:खी ही न होना पड़े । तुम से कोई ईष्र्या, द्वेष, कलह ही न कर सके, शत्रु भी तुम्हारे मित्र बन जायें। देखो कहा भी है-
‘‘मित्र अरी हो जाते हैं सब अशुभ करम के आने से।’’ और पुण्य संचित करने से क्या होता है?
‘‘शत्रु मित्र बन जाते हैं शुभ कर्म उदय में आने से’’।।
जैसे कि कहा भी है-

सर्पो हारलता भवत्यसिलता सत्पुष्पदामायते ।
संपद्येत रसायनं विषमपि प्रीतिं विधत्ते रिपु:।।
देवा यांति वशं प्रसन्न मनस: किम् वा बहु ब्रूमहे।
धर्मो यस्य न भोऽपि तस्य सततं रत्नै: परैर्वर्षति।।१९१।।

सर्प भी हार बन जाता है, तलवार भी सुंदर पूâलों की माला बन जाती है, विष भी रसायन बन जाता है, शत्रु भी प्रेम करने लगते हैं तथा देव भी प्रसन्नचित्त होकर आज्ञाकारी बन जाते हैं। बहुत क्या कहना ? जिसके पास धर्म है आकाश भी उसके ऊपर हमेशा रत्नों की वर्षा करता रहता है।
इससे यह अर्थ निकालना चाहिये कि जो हमसे द्वेष करते हैं, ईष्र्या करते हैं, उन्नति देखकर हमें अपमानित करते हैं-दु:ख देते हैं उन्हें दोष न देकर अपने पाप कर्म का उदय समझकर ऐसा कार्य करना चाहिये, इतना अधिक पुण्य संचय करना चाहिये कि जिससे वे शत्रु भी विद्वेषी, ईष्र्यालु भी हमारे मित्र बन जाएं, हमसे प्रेम करने लग जाएं अन्यथा यदि हम उनके दोष ही देखते रहेंगे, उन्हें यद्वा-तद्वा ही कहते रहेंगे तो केवल आगे अनंत संसार तक वैर परंपरा ही बढ़ती चली जायेगी, न हमें शांति मिलेगी और न उन्हें, इसलिये हे आत्मन्! अब तुम मेरी बात मानो, जिनेन्द्रदेव की बात मानो और उन सबसे सब कुछ कहना, सुनना छोड़ कर मौन का अवलंबन लेकर केवल जिनेन्द्रदेव के भक्ति स्तोत्र पढ़ो, महामंत्र का जप करो और शास्त्रों का चिंतन-मनन करते हुए आत्मतत्त्व का खूब चिंतवन करो। हर वक्त एकांत में बैठकर यही सोचो कि मेरी आत्मा इन सब संकल्प-विकल्पों से भिन्न है, कर्मों से भिन्न है, कर्म फलों से भिन्न है, संसार के नाना सुख- दु:खों से भिन्न है, एक अकेला है, अकेला जन्मता है, अकेला ही मरता है, अकेला ही अपने द्वारा किये हुये शुभ-अशुभ फल को भोगता है और जब यह सम्यग्दृष्टि बन जाता है तब अकेला ही कर्मों से छूटकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
इसलिये हे आत्मन्! तुम सतत ऐसी भावना भाओ-
‘‘सत्त्वेषु मैत्री’’ हे भगवन् ! मेरा सब जीवों से मैत्री भाव हो, वैर भाव किसी से भी न हो और न किसी से बदला लेने के भाव ही मन में आवें क्योंकि इससे कमठ के समान वैर परंपरा बढ़ती चली जाती है।
पुन: –
‘‘गुणिषु प्रमोदं’’ गुणीजनों को देखकर मेरे मन में प्रमोद भाव-हर्ष भाव उत्पन्न हो जावे । उनका अपमान, उनका तिरस्कार , उनके प्रति दुर्भाव मैं कभी भी न करूं क्योंकि बड़े जनों के, गुरुजनों के अपमान से-निंदा से दुर्गति में जाना पड़ता है। पुनश्च‘क्लिष्टेषु जीवेषु कृपा परत्वं’’ दु:खी जीवों पर मैं करुणा भाव धरूं। कोई दु:खी के प्रति दया करता है कि नहीं यह मैं न देखूं क्योंकि जो जैसा करेगा वो वैसा भरेगा अत: दूसरों की ओर न देखकर मैं दु:खियों पर करुणा भाव करूं। पुनरपि-‘माध्यस्थभावं विपरीतवृत्तौ’’ जो मेरे से विपरीत हैं-मेरे प्रति द्वेष, ईष्र्या, क्रोध, तिरस्कार आदि करने वाले हैं उनके प्रति मेरा मध्यस्थ भाव रहे। न उनके प्रति मुझे द्वेष हो और न राग हो विंâतु समताभाव बना रहे।
ऐसी प्रार्थना किनके पास करना कि जिससे सफलता मिले ? देवाधिदेव जिनेंद्रदेव के पास करना-
‘‘सदा ममात्मा विदधातु देव’ हे देव ! हे भगवान् ! मेरी आत्मा सदा-सदा ऐसी प्रवृत्ति धारण करे क्योंकि अन्य के सामने की गई प्रार्थना सफल न भी हो किन्तु जिनेन्द्रदेव के सामने की गई प्रार्थना नियम से सफल ही होती है, इसमें रंचमात्र भी संदेह नहीं है।
अहो! इस जगत् में जिसे मैंने शत्रु समझ लिया है, पता नहीं वह भव-भव में कितने बार मेरे माता, पिता व मित्र के रूप में मुझे मिल चुके हैं। इसी प्रकार जिसे मैंने मित्र समझा है वे भी कभी मेरे शत्रु, मेरे द्वेषी, मेरे अपकारी हो चुके हैं अत: अब किससे राग-द्वेष करना ? किसी से नहीं प्रत्युत अपने आत्मतत्त्व की भावना करते रहना चाहिये। क्योंकि-
‘‘मैं सुखी दुखी मैं रंक राव, मेरे धन गृह गोधन प्रभाव ।’’
इत्यादि भावना से राग-द्वेष होगा ही होगा और इससे मेरी आत्मा दु:खी ही होगी, आकुल-व्याकुल ही होगी, विक्षिप्त ही होगी। अत: क्या सोचना ? देखो, शुद्ध निश्चयनय से मैं कैसा हूँ ?१. अनंतज्ञान स्वरुपोऽहं मैं अनंतज्ञान स्वरूप हूँ
२. अनंतदर्शन स्वरूपोऽहं मैं अनंतदर्शन स्वरूप हूँ
३. अनंतसुख स्वरूपोऽहं मैं अनंतसुख स्वरूप हूँ
४. अनंतवीर्य स्वरूपोऽहं मैं अनंतशक्ति स्वरूप हूँ
५. अनंतगुण स्वरूपोऽहं मैं अनंत गुण स्वरूप हूँ
६. परमानंद स्वरूपोऽहं मैं अनंत आनंद स्वरूप हूँ
७. परमाल्हाद स्वरूपोऽहं मैं परम आल्हाद स्वरूप हूँ
८. परमज्योति: स्वरूपोऽहं मैं परम ज्योति स्वरूप हूँ
९. परम केवलज्ञान स्वरूपोऽहं मैं परम केवलज्ञान स्वरूप हूँ
१०. चिन्मयचिंतामणि स्वरूपोऽहं मैं चित्चैतन्य चिंतामणि स्वरूप हूँ
११. चैतन्य कल्पवृक्ष स्वरूपोऽहं मैं चैतन्य कल्पवृक्ष स्वरूप हूँ
१२. चिन्मय ज्योति:स्वरूपोऽहंं मैं चिन्मय ज्योति स्वरूप हूँ
१३. क्रोध भाव रहितोऽहं मैं क्रोध भाव से रहित हूँ
१४. उत्तम क्षमा स्वरूपोऽहं मैं उत्तम क्षमा स्वरूप हूँ
१५. मान भाव रहितोऽहं मैं मान भाव से रहित हूँ
१६. माया भाव रहितोऽहं मैं माया भाव से रहित हूँ
१७. लोभ भाव रहितोऽहं मैं लोभ भाव से रहित हूँ
१८. मोह रहितोऽहं मैं मोह से रहित हूँ
१९. राग रहितोऽहं मैं राग से रहित हूँ
२०. द्वेष रहितोऽहं मैं द्वेष से रहित हूँ
२१. ख्यातिलाभपूजादि भावना रहितोऽहं मैं ख्याति,लाभ,पूजा आदि भावना से रहित हूँ
२२. सिद्धोऽहं, बुद्धोऽहं, निरजनोऽहं मैं सिद्ध हूँ, मैं बुद्ध हूँ, मैं निरंजन हूँ
२३. निराकारोऽहं, परमात्मस्वरूपोऽहं मैं निराकार हूँ, मैं परमात्मा स्वरूप हूँ
२४. सर्वदु:ख शोक पीड़ा रहितोऽहं मैं सर्व दु:ख, शोक, पीड़ा से रहित हूँ

इन भावनाओं से मेरी आत्मा नियम से एक न एक दिन इसी रूप बन जायेगी और मैं पूर्ण सुखी हो जाऊँगा। जैसे लोहे से लोह पात्र और सोने से सोने के पात्र बनते हैं वैसे ही आत्मा को सदा दु:खी, संसारी, रोगी, शोकी, हीन, दीन, समझते रहने से आत्मा वैसे ही बनती रहती है और जब यह सम्यग्दृष्टी शुद्धनय से आत्मा को अनंतसुखी समझ लेता है तब पुन:-पुन: उसकी भावना भाते हुए सुखी बन जाता है इसलिये दु:ख, शोक, राग, द्वेष, क्रोध, मान आदि छोड़कर सतत आत्मचिंतवन करते रहना चाहिये। मेरी आत्मा तभी शांति को धारण कर मोक्ष को प्राप्त कर सकेगी अन्यथा अनादिकाल से तो यह जीव पर को अपना समझकर उसी में रच-पच कर उसी में रागी, द्वेषी, मोही होता हुआ दु:ख उठा ही रहा है और आगे भी ऐसे ही जन्म-मरण के नाना व्याधियों के दु:ख उठाता ही रहेगा इसलिये अब मुझे सुखी होने की इच्छा है तो यही उपाय है कि पर के ऊपर दोषारोपण न करके ऐसा कार्य करूँ कि जिससे मुझे आगे दु:ख का लेश भी न हो सके। राग-द्वेष, मोह को हटाने के लिये या जब तक नहीं हट सकते तब तक घटाने के लिये आज हमें स्वाध्याय और जिनभक्ति ही शरण है अन्य कोई शरण नहीं है।
यदि तुम्हें शांति प्राप्त करनी है तो-

सर्वं निराकृत्य विकल्प जालं, संसार कांतार निपात हेतुं।
विविक्तमात्मान मवेक्ष्यमाणो, निलीयसे त्वं परमात्म तत्त्वे।।

हे आत्मन् ! तुम संपूर्ण विकल्पों को छोड़ो क्योंकि ये तुम्हें संसार रूपी वन में घुमाने के कारण हैं और इन सर्व विकल्पों को छोड़कर शरीर से, सर्व पर द्रव्य से भिन्न ऐसी शुद्ध आत्मा का अवलोकन करते हुये तुम उसी परमात्म तत्त्व में लीन हो जाओ-तन्मय हो जाओ, इसी से तुम्हें सुख, शांति और निराकुल स्थानस्वरूप ऐसी उच्च गति मिलेगी ।