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तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक में कर्मास्रव की दार्शनिक मीमांसा!

July 20, 2017कर्म सिद्धांतHarsh Jain

कर्म सिद्धान्त

संस्कृत तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक में कर्मास्रव की दार्शनिक मीमांसा


पुद्गल में विपाक करने वाले शरीर और अंगोपाङ्ग नामकर्म की प्रकृति का उदय होने पर मन, वचन और काय से युक्त हो रहे जीव की जो कर्म और नोकर्मों के आगमन की कारण हो रही शक्ति योग है, यह भाव योग कहा जा सकता है। इस भावयोग रूप पुरुषार्थ से आत्मा के प्रदेशों का परिस्पन्द हो जाना स्वरूप द्रव्ययोग उपजता है। ग्रहण की जा चुकी या ग्रहण करने योग्य हो रही मन, वचन, कार्यों की वर्गणाओं का अवलम्ब पाकर आत्मा के वह कर्म रूप योग उत्पन्न हुआ अनादिकाल से तेरहवें गुणस्थान तक सदा कर्मनोकर्मों का आकर्षण करता रहता है। भावयोग अपरिस्पन्दात्मक है और द्रव्ययोग परिस्पन्दात्मक है।तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक ६/१ पं. माणिकचन्द्र कौन्देय, न्यायाचार्य की व्याख्या, पृ. ४३१ योग आत्मा के निकट ज्ञानावरणादि कर्मों के आस्रव का हेतु हैं।
स च कार्यवीङ् मन: कर्म तेनैवात्मनि ज्ञानावरणादिकर्मभिबन्धिस्य करणात् तस्य बन्धहेतुत्वोपपत्ते।
त.श्लोक ६/१ पृष्ट ४३२
योग ही जीव को कर्म से बन्ध होने जाने का प्रधान कारण है। योग नहीं होता तो सभी जीव शुद्ध सिद्धपरमेष्ठी भगवान् हो जाते। सांख्य मत मीमांसा सांख्य मतानुयायी कहते हैं कि योग तो प्रधान यानी सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुणों की समता स्वरूप प्रकृति का परिणाम है। अत: वह बन्ध का हेतु नहीं हो सकता हैं। जैनाचार्यों का कहना है कि सांख्यों का यह कहना युक्ति रहित है; क्योंकि यह बात सिद्ध है कि बन्ध उभय पदार्थों में स्थित होता है। प्रश्न – तब तो जीव द्रव्य और अजीव द्रव्य इन दोनों का परिणाम बन्ध मान लिया जाय । उत्तर – (किसी तटस्थ विद्वान् का) यह कहना कठिन है; क्योंकि जीव और कर्म के बन्ध हो जाने के कारण उन जीव और कर्म दोनों के परिणाम विशेष कहे हैं।
प्रधान परिमाणो यो इत्युक्त, तस्यात्मबन्धहेतुयोगात् ।
प्रधानस्यैव बन्धहेतुरसाविति चायुक्त, बन्धस्योमयस्थत्व सिद्धे:।
तर्हि जीवाजीव परिणामो बन्ध इति चेत् ,
सत्यं जीवकर्मणोबन्धिस्य तदुमयपरिणामहेतु कत्ववचनात् ।
त.श्लो. ६/१/ पृ. ४३३
गोम्मटसार ग्रन्थ में कहा गया है–
जोगा पयडि पदेसा ठिदि अणुभागा कसअदो होंति ।।
योग से प्रकृति और प्रदेश बन्ध तथा कषाय से स्थित और अनुभाग बन्ध होते हैंं। आचार्य कुन्दकुन्द ने समयसार के कर्तृकर्ममहाधिकार में जीव और पुद्गल के सम्बन्ध के विषय में निश्चय और व्यवहार दोनों दृष्टियों में वर्णन किया है –
जीव परिणाम हेदुं म्मत्तं पुग्गला परणमंति । मुग्गलकम्मणिमित्तं तहेव जीवो वि परिणमदि ।।
ण विकुच्चउि कम्मगुणे जीवो कम्मं तहेव जीवगुणे । अण्णोण्ण णिमित्तेण दुपरिणामं जाण दोण्हंपि ।।
एदेण कारणेण दुकत्ता आदा सएण भावेण । पुग्गलकम्मकदाणं ण दु कत्ता सव्वभावाणं ।।
समयसार ८६-८८
जीव के (रागी द्वेष) परिणामों का निमित्त पाकर पुद्गल द्रव्य कर्मत्व रूप परिणमन करता है। वैसे ही पौद्गलिक कर्मों के उदय का निर्मित्त पाकर जीव रागादि रूप परिणमन करता है। तथापि जीव कर्म के गुण रूपादिक को स्वीकार नहीं करता, उसी भांति कर्म भी जीव के चेतनादि गुणों को स्वीकार नहीं करता, किन्तु मात्र इन दोनों का परस्पर एक दूसरे के निमित्त से उपर्युक्त विकारी परिणमन होता है। इस कारण वास्तव में आत्मा अपने भावों से ही अपने भावों का कत्र्ता होता है, किन्तु पुद्गल कर्मो के द्वारा किए गए सर्व भावों का कत्र्ता नहीं है। सांख्यकारिका में कहा गया है –
तस्मान्न बध्यते अद्धा न मुच्यते नाऽपि संसरति कश्चित् । संसरति बध्यते मुच्यते च नानाश्रया प्रकृति: ।। सां. का. ६२।।
इसलिए वस्तुत: किसी पुरुष का न तो बन्धन और न संसरण ही होता है और न मोक्ष ही। अनेक पुरुषों के आश्रय से रहने वाली प्रकृति का ही संसरण, बन्धन और मोक्ष होता है। सांख्य की इस मान्यत का जैनाचार्यों ने खण्डन किया है। तत्त्वार्थसूत्र में आचार्य गृद्धपिच्छ ने कहा है कि कषाय सहित जीव के साम्परायिक और कषाय रहित जीवों के ईर्यापथ आस्रवसकषायाकषाययो: संपरायिकेर्यापथयो: । तत्त्वार्थसू. ६/४ होता है। इस पक्ष की असिद्धि को दिखलाते हुए सांख्य विद्वान् कहते हैं कि जीव सर्वदा शुद्धस्वभाव है। शुद्ध, उदासीन, भोक्ता, चेतयिता तथा द्रष्टा आत्मा हमारे यहाँ माना गया है। अत: जीव का कर्मों से परतन्त्रपना सिद्ध नहीं है। इस कारण जैनों का हेतु आश्रयसिद्ध है। आचार्य विद्यानन्दि के अनुसार यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि नित्य ही शुद्ध आत्मा मानने पर जीव के संसार का अभाव होने का प्रसंग आएगा। यदि सांख्य कहता है कि प्रकृति का ही संसार है तो यह बात ठीक नहीं है, क्योंकि आत्मा की कल्पना व्यर्थ होने का प्रसंग आने पर मोक्ष भी उस प्रकृति का होगा। सभी पुरुषार्थों को प्रकृति करेगी तो आत्मतत्त्व की कल्पना व्यर्थ है। आप यह नहीं समझना कि प्रकृति ही संसार और मोक्ष को करने वाली है; क्योंकि वह अचेतन है, घट के समान।
पुरुषोऽस्ति भोत्तृक्भावत् कैवल्यार्थ प्रवृतेश्च ।।  सांख्य कारिका-१७?
तरमाच्च वपर्यासात्सिद्धं साक्षित्वमस्य पुरुषस्य कैवल्यं माध्यस्थ्यं दृष्ट्रत्वमकर्तृभावश्च ।। सां.का. १९
प्रश्न – चेतन पुरुष का संसर्ग हो जाने से वह प्रकृति ही उस संसार अवस्था को धार लेती है।तस्मात्तत्संयोगदचेतनं चेतनवदिव लिंङ्ग । गुणकर्तृत्वे च तथा कर्तेव भवत्युदासीन: ।। सा.का. २०
उत्तर – जिस प्रकार चेतन का संसर्ग हो जाने पर प्रकृति का आतमा के परन्तत्र हो जाना स्वरूप संसार होना माना गया है, उसी प्रकार प्रकृति का संसर्ग हो जाने से चेतन आत्मा का भी उस प्रकृति के पराधीन हो जाना स्वरूप संसार सिद्ध हो जाता है; क्योंकि संसर्ग में अवश्य ठहरता है। जैसा कि कहा है – ‘नित्यशुद्धस्वभाव-त्त्वाज्जीवस्यकर्मपारतन्त्र्यमसिद्धमिति चेन्न, तस्य संसाराभावप्रसंगात् । प्रकृते: संसार इति चेन्न, पुरुषकल्पना वैयथ्र्यप्रसंगात् तस्या एव मोक्षस्यापि घटनात्। न च प्रकृतिरेव संसारमोक्ष भागचेतनत्वात् घटवत् । चेतन संसर्ग विवेकाभ्यां सा तद्भागेवेति चेत् । तर्हि यथाप्रकृतेश्चेतनसंर्गात्पारतन्त्र्यलक्षण: संसारस्तथा चेतनस्यापि प्रकृति संसार्गात् तत्पारतन्त्र्यं सिद्धं, संसर्गस्य द्विष्ठत्वात् ।।’’ सांख्य– संसार अवस्था में प्रकृति परतन्त्र हो रही है, किन्तु वह परतन्त्रता कषायों को हेतु मानकर नहीं उपजी है। कषायें तो जीव के हो सकती हैं, जड़ प्रकृति के नहीं। जैन– ऐसा नहीं मानना चाहिए। आपके यहाँ क्रोध, रण, द्वेष, मोह आदि कषायों को प्रकृति का परिणाम कहा है। प्रसन्नता, लाघव, राग, द्वेष, मोह, दीनता, शोक ये सब सातोगुण, रजोगुण, तमोगुण वाली प्रकृति के परिणाम माने गए हैं, अत: उस प्रकृति के परतन्त्रपन का कषाय नामक हेतुओं से उपजना सिद्ध हो जाता है। तत्र यह सुखहेतु: तत् सुखात्मकं सत्त्वम् , यत् दु:खहेतुस्तद्ध दु:खात्मकं रज:, यन्मोहहेतु स्तन्मोहात्मकं तम:। वाचस्पति मिश्र: सांख्य तत्त्व कौमुदी-१३वीं कारिका की व्याख्या सत्त्वं लघुप्रकाशकमिष्टमुपष्टम्मकं चलं च रज:। गुरुवरणकमेव तम: प्रदीपवच्चार्थतो वृति:।। सांख्यकारिका-१३ जैनों के यहाँ क्रोध आदि को आत्मा का विभाव परिणाम कहा है। समयसार – गाथा, १८८ निश्चय नय की अपेक्षा क्रोध आदि को पुद्गल का विकार कह दिया है। समयसार, गाथा-२२ एवं समयसार, गाथा-४९ यह स्याद्वाद की अपेक्षा घटित होता है। सांख्य के नित्यैकान्त में दु:ख, शोक आदि में कर्तापन, करणपन संगत नहीं है – सांख्यमत में शक्तियाँ, स्वभाव, परिणति स्वरूप अतिशयों से रहित हो रहे आत्मा का कत्र्तापन स्वीकार नहीं किया गया है। क्रिया में स्वतन्त्र होकर व्यापार कर रहा पदार्थ कत्र्ता कहा जाता है। अतिशयों से रहित कूटस्थ पदार्थ कत्र्ता नहीं हो सकता है। किसी एक सहकारी कारण से उस कत्र्ता में अतिशय किया माना जाएगा तो प्रश्न उठता है कि वह अतिशय कत्र्ता से भिन्न किया गया है या अभिन्न किया गया है। प्रथम पक्ष के अनुसार सहकारी कारण कर यदि कर्ता से भिन्न अतिशय का किया माना जाएगा तो उस कत्र्ता की पूर्ववर्तिनी अकत्र्तापन अवस्था से प्रक्ष्युति नहीं होने के कारण कत्र्तापन का विरोध है। द्वितीय पक्ष के अनुसारी सहकारी कारणों का उस आत्मा से अभिन्न अतिशय किया जाना जाएगा तो उस आत्मा का ही किया जाना होने से आत्मा का अनित्यपना ही हो जाएगा। कथंचित् नित्यपना इष्ट करोगे तो दूसरे स्याद्वादियों के मत का आश्रय लेना दुर्निवार है। इस कथन से प्रधान के परिणाम महत् आदि के कारणत्व का निराकरण कर दिया। स्याद्वाद का आश्रय लिए बिना किसी परिणाम की प्राप्ति नहीं होती है। इस प्रकार महत्तत्त्व आदि का अधिकरणपना अथवा कर्मपना सिद्ध नहीं हो सकता है। बौद्धमत मीमांसा— बौद्धों के यहाँ चक्षुरादिकरण तथा शरीरादि अधिकरण श्रेय नहीं है; क्योंकि उनकी दु:ख आदि काल में स्थिति नहीं है। यदि बौद्धों का यह मन्तव्य हो कि दु:ख आदि चित्त ही अपने कार्य करने में कत्र्ता हैं और उस कत्र्ता के उसी समान समय में वर्त रहे चक्षु आदि कारण हैं तथा तत्कालीन क्षणिक शरीर अधिकरण हो जाता है। केवल व्यवहार से कत्र्ता, करण, अधिकरण भाव हैं, पारमार्थिक रूप से न कोई कत्र्ता है, न कोई करण, अधिकरण आदि हैं। बौद्धों का यह मत ठीक नहीं है; क्योंकि दु:ख आदि चित्त स्वरूप कर्ता के चक्षु आदिक करण और अधिकारण नहीं हो सकते। इसका कारण यह है कि बौद्धों के यहाँ विज्ञान से बाहर हो रहे रूप आदि के ज्ञान की उत्पत्ति में उन चक्षुरादि के करणपन का कथन किया गया है तथा मन भी करण नहीं हो सकता; क्योंकि दु:खादि चित्त के उसी समान काल में उस अनन्तर अतीत विज्ञान स्वरूप मन संभव नहीं है। बौद्ध— रूपादि स्कन्धपञ्चक की युगपत् उत्पत्ति होती रहती है, जब कि पांच विज्ञानों की धारायें चल रही हैं तो दु:ख, शोक आदि के अनुभव स्वरूप पूर्व समयवर्ती वेदना स्कन्ध को उत्तर समयवर्ती दु:ख आदि की उत्पत्ति में कत्र्तापन है और उसी वेदना स्कन्ध को दु:ख आदि की उत्पत्ति में अधिकरणपना है। सबको स्व में अपना अधिकरणपना प्राप्त है। दु:ख आदि के हेतु हो रहे बहिरंग अर्थ विज्ञान स्वरूप वेदना स्कन्ध को करणपना समुचित है, जो कि वेदना स्कन्ध उत्तर समयवर्ती उस कार्य से पूर्व समय में वर्त रहा होकर मन इस नाम निर्देश के योग्य हो रहा है। जैन— यह नहीं कहना चाहिए; क्योंकि अन्वयरहित होकर नष्ट हो चुके वेदना स्कन्ध के कत्र्तापन और करणपन का विरोध है। उत्तर समयवर्ती अपने कार्य के काल में पूर्व समयवर्ती उस वेदना स्कन्ध स्वरूप कत्र्ता या करण का नाश नहीं माना जायेगा, तब तो बौद्धों के यहाँ पदार्थों के क्षण में नष्ट हो जाने रूप स्वभाव का भंग हो जायेगा, जो कि बौद्धों को कथमपि सहन नहीं है। तत्त्वार्थश्लोक वार्तिक ६/११ पृ. ५००-५०१ ब्रह्माद्वैत मीमांसा— तत्त्वार्थसूत्र में कहा गया है कि ज्ञान और दर्शन में किए गए प्रदोष, निह्नव, मात्सर्य, अन्तराय, आसादन और उपघात ये ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्मों के आस्रव हैं। तत्त्वार्थश्लोक वार्तिक ६/११ पृ. ४९९८-४९९ इस पर ब्रह्मद्वैतवादी शंका करते हैं –
शंका— जिस जीव के जिस विषय में हो रहे प्रदोष, निन्हव आदि दोष हैं, उसके उन विषयों का आवरण कर रही अविद्या ही है, फिर उन गुणों का आवरण करने वाला कोई कार्मण स्कन्ध स्वरूप पुद्गल सिद्ध नहीं हो पायेगा, जिस कारण उस ज्ञान या दर्शन में हुए प्रदोष आदिकों से ज्ञान और दर्शन का आवरण करने वाले ज्ञानावरण पुद्गलों की प्रसिद्धि नहीं हो सकती। अमूर्त हो रहे ज्ञान, दर्शन आदि आवरण करने वाला मूर्त कर्म किस प्रकार हो सकता है? मूर्त सूर्य के ही मूर्त बादल आवरक हो सकते हैं। घर की दीवालें या छतों मूर्त शरीर, भूषणों, वस्त्रों को छिपा लेती हैं, आकाश के नहीं।
समाधान— ऐसा कहने पर हम जैन भी प्रश्न उठायेंगे कि आपके यहाँ वे अविद्या, भेद विज्ञान मोह आदिक अमूर्त होते हुये किस प्रकार एकत्व ज्ञान, प्रतिभासाद्वैत आदि का आवरण कर देते हैं? अमूर्त अविद्या आदि का सद्भाव होने पर ज्ञान आदिकों का आवरण होना मानोगे तो अमूर्त आकाश को भी उन ज्ञान आदिकों के आवरकपन का चारों ओर से प्रसंग आ जावेगा अथवा अमूर्त ज्ञान का दूसरा अमूर्त ज्ञान आवारक बन बैठेगा। अद्वैतवादी— गगन आदिक तो उन ज्ञान आदिकों के विरुद्ध नहीं है, अत: वे उनके आवरण नहीं हो सकते है। जैन— तिस कारण से यानी ज्ञानादिक का विरोधी नहीं होने से मूर्त शरीर भी ज्ञान आदि का आवारक नहीं है। जो उन ज्ञान आदि से विरुद्ध पदार्थ होगा, उसी को उन ज्ञान आदिकों के आवारकपन की सिद्धि है। मदिरा, भाँग आदि द्रव्यों के समानतत्प्रदोषनिन्हवमात्सयन्ति रायासादनोपघाताज्ञानदर्शनावरणयो: – त.वा. ६/१० उन पौद्गलिक कर्मों को भी उन ज्ञान आदिकों के विरोधीपन की प्रतीति हो रही है। सभी पुद्गल न तो ज्ञान के सहायक हैं और न विरोधी। अनेक पुद्गलों से सम्यग्दर्शन ज्ञान, चारित्रों को सहायता होती है और कितने पौद्गलिक पदार्थों से मिथ्यादर्शन, ज्ञान, चारित्रों को सहायता मिलती है, कोई एकान्त नहीं है। ज्ञानावरण आदि पौद्गलिक कर्म अवश्य ही ज्ञानादि गुणों के आवारक हैं यह निर्णित विषय है। न्यायवैशेषिक मीमांसा — जैनों के अनुसार जीव का सब ओर से परतन्त्रपना (पक्ष) कषायों को हेतु मानकर उपजा है (साध्य), अन्य प्राणियों की अपेक्षा नहीं रखता हुआ परतन्त्रपना होने से (हेतु)। जैसे कि यहाँ लोक में कमल के मध्य में प्राप्त हुआ चक्षुरिन्द्रिय विषय लोलुपी भ्रमर अपनी लोभ कषायों के अनुसार परतन्त्र हो रहा है (अन्वय दृष्टान्त)। कषायों के उदय रूप से विशेषतया निवृति हो जाने पर परतन्त्रता निवृत्त हो जाती है, जैसे कि यहाँ जगत् में किसी एक जीव के कषायों की शान्त अवस्था में समय में परतन्त्रता नहीं पायी जाती हैतत्त्वार्थश्लोक वार्तिक ६/१० व्याख्या पृ. ४९०-४९२ (व्यतिरेक दृष्टान्त)। इस प्रकार अन्वय व्यतिरेक द्वारा जीवों की पराधीनता का कारण कषायों का उदय सिद्ध है। वैशेषिक या नैयायिक — संसारी जीव की परतन्त्रता तो महेश्वर की सृजन करने की अच्छा की उपेक्षा रखने वाली है, अत: अन्य जीवों की अपेक्षा नहीं रखनापन हेतु का विशेषण पक्ष में नहीं रहा, अत: असिद्ध दोष हुआ। जैन— संसारी जीवों के महेश्वर या ईश्वर की सिसृक्षा के अपेक्षी होने का खण्डन किया गया है; क्योकि कार्यत्व, अचेतनोपादानत्व, सन्निवेशाविशिष्टत्व आदि सभी हेतुतत्त्वार्थश्लोक वार्तिक ६/३ की व्याख्या पृ. ४४८ दूषित हैं। आप्त परीक्षा में कर्तृवाद का निराकरण किया गया है। जैनों का कहना है कि जिस प्रकार नील द्रव्य का नील गुण उस पट में भी नील बुद्धि को करता हुआ नीला बना देता है, इस कारण उस पट को उस नील का अधिकरणपना प्राप्त है, उसी प्रकार संरम्भ आदिकों में जो आस्रव हो रहा है, वह जीवों में ही आस्रव हैं, इस कारण जीव के परिणाम के संरम्भ आदिक ही आस्रव के अधिकरण हैं यों कहने पर भी वे जीव आस्रव के अधिकारण हो जाते हैं। ‘‘अधिकरणं जीवाजीवा:’’ इस सूत्र में जीव पद का ग्रहण करने से जीव के परिणामों का ग्रहण हो जाता है। जीव और जीव परिणामों के कथंचित अभेद है। अत: जीव भी आस्रवों के अधिकरण हैं, यह युक्तियों से सिद्ध हो जाता है। वैशेषिक— नील और नीलवान् का सर्वथा भेद मानने पर भी नील रंग से धुले हुए पानी में डुबा दिए गये वस्त्र में संयुक्त हो गए नीली द्रव्य में नील गुण का समवाय हो रहा है। अत: कपड़ा नीला ही है, यह प्रत्यय संयुक्त समवाय सम्बन्ध से सुघटित हो जाता है। नील गुण नील में रहा और वस्त्र में नील संयुक्त हो रहा है। जैन — इस प्रकार तो आत्मा, आकाश आदि में भी नीलेपने के ज्ञान हो जाने का प्रसंग आएगा। नील द्रव्य उन आकाश आदि के साथ संयुक्त हो रहा है, अत: संयुक्त समवाय सम्बन्ध से वस्त्र के समान आत्मा आदि भी नीले हो जायेंगे, जो कि इष्ट नहीं है। वैशषिक — उन आत्मा, आकाश आदि के साथ नील द्रव्य का विशेष जाति के संयोग नहीं है, केवल प्राप्ति हो जाना मात्र सामान्य संयोग है। पट के साथ नील द्रव्य का विशेष संयोग है जो कि हर्र, फिटकरी, पानी और पट की स्वच्छता, आकर्षकता आदि कारणों से विशेष जाति का हो जाता है। अत: आत्मा नील है, यह प्रसंग नहीं आने पाता है। जैन— वह संयोग की विशेषता तिस परिणमन हो जाने के अतिरिक्त दूसरी क्या हो सकती है ? अर्थात् पट की नीलस्वरूप परिणति है और आत्मा या आकाश की नील परिणति नहीं है। संयोग हो जाने पर पुन: बन्ध परिणति अनुसार पट में भी नील का समवाय हो जाता है, किन्तु आत्मा के साथ नील द्रव्य की बन्ध परिणतितत्त्वार्थश्लोक वार्तिक ६/३ की व्याख्या पु. ४४९ नहीं हो पाती है। बैशेषिक के यहाँ कत्र्तापन, कारणपन नहीं बन सकता है — वैशेषिक के यहाँ सर्वथा नित्य आत्मा के बुद्धि आदि चौदह गुण सर्वथा भिन्न माने गए हैं। जब तक आत्मा पूर्व अतिशयों का त्याग कर उत्तर स्वभावों का ग्रहण नहीं करेगा, तब तक उसके कत्र्तापन, कारणपन नहीं बन सकते हैं। परिणामी जल में तो अग्नि का सन्निधान हो जाने पर शीत अतिशय की निवृत्ति और उष्ण अतिशय का प्रादुर्भाव हो जाता है। नैयायिक या वैशेषिक के यहां आत्मा को परिणामी नहीं माना गया है तिस ही कारण से दु:ख, शोक आदि की उत्पत्ति में मन भी करण नहीं हो सकता है; क्योंकि करण मानने पर मन को सभी प्रकार के अनित्यपने का प्रसंग आयेगा। कत्र्तापन या कारणपन के समान आत्मा के आत्मा के आत्मा के दु:खों का अधिकरणपना भी नहीं बन पाता है; क्योंकि जब तक पहिले के उस दु:ख के अधिकरणपना स्वाभाव का त्याग नहीं किया जायेगा, तब तक उस दु:ख के अधिकरणपन स्वभाव का विरोध है। यदि पहिले के अकर्तापन, अकरणपन, अनधिकरणपन स्वभावों का त्याग माना जाएगा तब तो वैशेषिकों के यहां सर्वथा नित्यपन के नष्ट होने की आपत्ति आ जाएगी। इस प्रकार सिद्ध हुआ कि नित्यानित्यात्मक आत्मा में दु:ख आदि परिणतियाँ संसार अवस्था में हो रही हैं। प्रकृति, बुद्धि या अपरिणामी आत्मा, नित्यातमा अथवा अन्य जड़ पदार्थों में दु:ख, शोक आदि परिणाम सम्भवतत्त्वार्थश्लोक वार्तिक ६/८ की व्याख्या पु. ४५६ नहीं है। इस प्रकार तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक में विभिन्न दर्शनों के परिपेक्ष्य में कर्मास्रव की मीमांसा कर जैनदर्शन को परिपुष्ट किया गया है।तत्त्वार्थश्लोक वार्तिक ६/११ की व्याख्या पु.५०१
डॉ. रमेश चन्द्र जैन मुहल्ला- कुंवर बालगोविन्द्र,
बिजनोर-२४६७०१ (उ.प्र.) अनेकान्त जुलाई -सित्म. २०१३ 
 
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