उत्थनिका-अब प्रमाण के विषय के विसंवाद को दूर करने के लिए आगे कहते हैं-
अन्वयार्थ-(तत्त्वत:) परमार्थ से (तद्-द्रव्यपर्यायात्मा) उस प्रमाण का द्रव्य पर्यायात्मक (बहि: अंत: च) बहिरंग और अंतरंग पदार्थ (अर्थ:) विषय है।।७।।
अर्थ-परमार्थ से उस प्रमाण का द्रव्य पर्यायात्मक बहिरंग और अंतरंग पदार्थ विषय है।।७।।
भावार्थ-प्रमाण और फलभूत अवग्रह आदि क्रम से होते हैं फिर भी उनमें तादात्म्य है और उसका विषय भी अभिन्न है इस बात को पहले कहा जा सकता है अब यहाँ उसी विषय को बतलाते हुए कहते हैं कि अंतरंग और बहिरंग रूप चेतन-अचेतन पदार्थ ही जिस प्रकार से वास्तव में प्रमाण के विषय हैं अथवा विज्ञानाद्वैतवादी बौद्ध ने अंतस्तत्व को प्रमाण का विषय माना है वेैसे ही बाह्य वस्तु भी प्रमाण का विषय है यहाँ चकार को टीकाकार ने इव अर्थ में लिया है।
तात्पर्यवृत्ति-‘प्रमाणं’ यह अनुवृत्ति में चला आ रहा है। यहाँ पर तद् शब्द से वह ग्रहण किया जाता है उसमें षष्ठी विभक्ती का संबंध होता है तब ‘तस्य प्रमाणस्य’ ऐसा हो जाता है। जो ‘अर्यते गम्यते ज्ञायते’- जाना है उसे अर्थ कहते हैं, यह धातु से बना है। इस प्रकार से विषय को अर्थ कहते हैं। अचेतन घट, पटादि बाह्य पदार्थ और चेतन रूप अंतरंग उस प्रमाण के विषय हैं क्योंकि प्रमाण स्व और पर अर्थ को जानने वाला है ऐसा प्रतिपादित किया गया है।