तात्पर्यवृत्ति-पर-आतुर के जनों के चित्त-चैतन्य आदि शब्द से भूत, ग्रह, व्याधि आदि ग्रहण किये जाते हैं। ये अदृश्य-हम, आपको दिखने योग्य नहीं हैं क्योंकि इनका स्वभाव सूक्ष्म है। ऐसे अदृश्यपने के चैतन्यभूत, ग्रह व्याधि आदि के अभाव को लौकिकजन, आबाल, गोपाल आदि भी जानते हैं पुन: परीक्षकजनों की तो बात ही क्या ? यहाँ ‘अपि’ को ग्रहण ले लेना चाहिए।
वैâसे जानते हैं ? उन पर के चैतन्य आदि के कार्यभूत अविनाभावी उष्ण स्पर्शादि लक्षण को ‘आकार’ कहते हैं। उस आकार का विकार-अन्य प्रकार होना आदि शब्द से वचन विशेष आरोग्य श्वासोच्छ्वास आदि होने रूप हेतु से जान लेते हैं। अन्यथा-पर चैतन्यादि के अभाव बिना वैâसे जानते हैं ? अर्थात् किसी रोगी आदि के शरीर को निश्चेष्ट, उच्छ्वासरहित और ठंडा देखकर जान लेते हैं कि इसमें चैतन्य का अभाव हो गया है तथा किसी रोगी के वचन विशेष और आरोग्य को देखकर यह भी जान लेते हैं कि इसमें भूत या पिशाच का प्रकोप नहीं है अथवा रोग का अभाव हो गया है। इन बातों को आबाल-गोपाल भी जान लेते हैं फिर परीक्षकजनों की तो बात ही क्या है ?
पर जीवों के भूत व्याधि आदि दिखते तो हैं नहीं क्योंकि वे सूक्ष्म हैं। अदृश्य का अभाव सिद्ध करना भी अशक्य नहीं है अन्यथा संस्कार करने वाले-जलाने वालों की पातकी कहना पड़ेगा तथा चैतन्य आदि होने पर भी विश्वास नहीं हो सकेगा। जिस प्रकार उष्ण, स्पर्श आदि आकार की उपलब्धि होने से पर के चैतन्य आदि का भाव (होना) सिद्ध किया जाता है। उसी प्रकार उष्ण, स्पर्शादि आकार विशेष की उपलब्धि न होने से पर के चैतन्य आदि का अभाव भी सिद्ध किया जाता है।
शंका-कार्य की उपलब्धि से कारण का अस्तित्व सिद्ध करना सुघटित है किन्तु कार्य की उपलब्धि न होने से कारण का अभाव सिद्ध करना शक्य नहीं है, क्योंकि कारण का कार्य के साथ अविनाभाव नहीं है।
समाधान-नहीं, इस प्रकार के निर्बंध का अभाव है। कार्य को उत्पन्न करने में समर्थ जो कारण है, उसका कार्य के साथ अविनाभाव सुघटित है। समर्थ कारण के होने पर कार्य अवश्य ही होता है। अन्यथा- यदि ऐसा न मानोगे तो कभी भी कार्य की उत्पत्ति नहीं हो सकेगी। इस प्रकार तो सभी में अर्थक्रिया को करने का अभाव होने से शून्यता का प्रसंग आ जावेगा।