तात्पर्यवृत्ति-लिंग-अविनाभाव संबंध जिसका हो वह लिंगी-साध्य कहलाता है। अनुमान साध्य के साथ अविनाभाव नियमरूप प्रधान लक्षण वाले साधन से उस साध्य का ज्ञान उत्पन्न होता है। उसी का नाम अनुमान है। वह अनुमान प्रमाण होता है।
इष्ट, अबाधित और असिद्ध को साध्य कहते हैं। अन्य प्रकार से न होने रूप नियम को अविनाभाव कहते हैं। उसके अभि-अभित: भिन्न देशकाल की व्याप्ति के निबोध-निर्णय को अभिनिबोध कहते हैं। वह है एक-प्रधान लक्षण-स्वरूप जिसका उसे अभिनिबोध एक लक्षण कहते हैं। ऐसे साध्य के साथ अविनाभाव नियमरूप प्रधान लक्षण वाले साधन से जो साध्य का ज्ञान होता है वही अनुमान है।
प्रश्न-यह अनुमान तो तर्क का फल है, पुन: प्रमाण वैâसे होगा ?
उत्तर-उस अनुमान का फल हानादि बुद्धि है। परिहार को हान कहते हैं और ‘आदि’ शब्द से उपादान-ग्रहण और उपेक्षा को ग्रहण करना है। जो उन हानादि का विकल्प है वही उस अनुमान का फल होता है इसलिए फल का हेतु होने से वह अनुमान प्रमाण है, प्रत्यक्ष के समान। यहाँ यह अभिप्राय हुआ है।