इसको अप्रमाण मानने पर प्रत्यक्ष ज्ञान को भी प्रमाणता नहीं बन सकेगी क्योंकि अगौणत्व आदि हेतु के प्रयोग नहीं बन सकते हैं। कहीं अभ्यस्त विषय में स्वत: प्रमाणता की सिद्धि होने पर भी उसकी (प्रत्यक्ष की) अनभ्यस्त विषय में अनुमान से ही प्रमाणता की सिद्धि होती है। परलोक आदि का निषेध भी अनुपलब्धि हेतु से साध्य होने से अनुमान का अभाव करना उचित नहीं है अर्थात् चार्वाक एक प्रत्यक्ष प्रमाण मानता है और परलोक आदि का निषेध करता है उसमें यह निषेध अनुपलब्धि हेतु से ही तो करता है।अथवा पर के चैतन्य के ज्ञान में व्यवहार आदि लिंग से उत्पन्न हुआ अनुमान प्रमाण है इसलिए अनुमान को अप्रमाण नहीं कहना चाहिए क्योंकि युक्ति से विरोध आता है।