नीरूप-स्वरूपरहित अभाव तो प्रमाण का विषय नहीं हो सकता है अन्यथा केश में मच्छर के ज्ञान आदि विषयशून्य ज्ञान भी प्रमाणीक हो जायेंगे।
वैशेषिक-अभाव प्रमाणभाव विषय है।
जैन-यदि ऐसा कहो तो केश में मच्छर के ज्ञान में भी केश में मच्छर का ज्ञान है। उसे भी प्रमाण का विषय मानो, क्योंकि दोनों जगह कोई अंतर नहीं है।
वैशेषिक-वहाँ केश में मच्छर की तो कल्पना मात्र है, इसलिए वह ज्ञान मिथ्यारूप है।
जैन-यदि आप ऐसा कहते हैं तब तो अभाव भी नि:स्वभाव होने से वह मिथ्यारूप क्यों न हो जावे ? इसलिए दुराग्रह का ग्रहण छोड़कर कथंचित् भावाभावात्मक ही प्रमाण का विषय स्वीकार करना चाहिए अत: आप वैशेषिक का मत सुमत नहीं है क्योंकि उसमें प्रत्यक्ष और अनुमान से विरोध आता है।