उस अविनाभाव के दो भेद हैं-सहभाव और क्रमभाव।
सहचारी रूप और रस तथा व्यापक वृक्षत्व और शिंशिपात्व साध्य-साधन में सह अविनाभाव होता है।
पूर्वचर-उत्तरचररूप रोहिणी के उदय और कृत्तिका के उदय में तथा कार्य-कारणरूप धूम और अग्नि में क्रम अविनाभाव है।
भावार्थ-यहाँ पर आचार्य ने अनुमान का लक्षण बतलाते हुए साध्य एवं साधन का लक्षण भी बतलाया है। जो इष्ट, अबाधित और असिद्ध है वह साध्य है क्योंकि अनिष्ट और बाधित को कोई सिद्ध करना नहीं चाहेगा और असिद्ध विशेषण परवादी की अपेक्षा है क्योंकि स्वयं को तो सिद्ध है किन्तु अन्य को असिद्ध है, तभी तो उसे साध्य की कोटि में रखकर सिद्ध करते हैं। साधन-हेतु का अन्यथानुपपत्ति रूप किया है क्योंकि हेतु में तीनरूप या पाँचरूप होने पर भी यदि अन्य प्रकार से नहीं होने रूप ऐसा साध्य के साथ-अविनाभाव नहीं है तो वह साध्य को सिद्ध नहीं कर सकता और यदि यह एक लक्षण मौजूद है तो भले ही अन्य रूप नहीं भी होवे तो भी वह हेतु साध्य को सिद्ध कर देता है।
अनंतर अविनाभाव के सहभावी और क्रमभावी ऐसे दो भेद करके उनके उदाहरण दिये हैं। जो व्याप्य और व्यापक में साथ ही रहे वह सहभावी है। जैसे-‘अयं वृक्ष: शिंशिपात्वात्’ यह वृक्ष है क्योंकि सीसम है। जो क्रम से हो, वह क्रमभावी हैै। जैसे-‘अयं पर्वतोऽग्निमान धूमवत्त्वात्’ यह पर्वत अग्नि वाला है क्योंकि धूम वाला है। ऐसे ही रूप और रस में सहभाव नियम और पूर्वचर-उत्तरचर में क्रमभाव नियम अविनाभाव पाया जाता है।
उत्थानिका-तादात्म्य और तदुत्पत्ति से अविनाभाव होता है इसलिए व्यापक का व्याप्य ही लिंग है और कारण का कार्य ही लिंग है। इस प्रकार विधि हेतु दो प्रकार के ही हैं। इस तरह सौगत के विसंवाद का निराकरण करते हुए कारण को भी लिंगत्व हेतुपना सिद्ध करते हैं-
अन्वयार्थ-(तथा) उसी प्रकार (चंद्रादे:) चंद्र आदि से (जलचंद्रादिप्रतिपत्ति:) जल में चंद्र आदि का ज्ञान होना भी (अनुमा) अनुमान ज्ञान है।।४।।
अर्थ-उसी प्रकार चंद्र आदि से (कारण से) जल में चंद्र आदि का ज्ञान होता है। वह भी अनुमान ज्ञान है।।४।।
तात्पर्यवृत्ति-चंद्रादि में आदि शब्द से सूर्य आदि को लेना चाहिए। इन चंद्र, सूर्य आदि कारण हेतु से स्वच्छ जल में चंद्र, सूर्य आदि के प्रतिबिंब का ज्ञान अनुमान ज्ञान है ऐसा स्वीकार करना चाहिए क्योंकि व्यभिचार दोष नहीं है। जैसे कि कार्यहेतु से कारण का ज्ञान होना अनुमान होता है। अविनाभाव गम्य और गमक भाव का कारण है, वह कार्यरूप अथवा अन्यरूप नहीं है क्योंकि अविकल सामर्थ्य वाले कारण कार्य को उत्पन्न करने के प्रति अव्यभिचारी हैं।
वृक्ष में आतप और छाया का व्यभिचार नहीं है अथवा मणि, मंत्र आदि से जिसकी शक्ति रोकी नहीं गई है, ऐसी अग्नि में स्फोट आदि का व्यभिचार नहीं है। अन्यथा-यदि ऐसा नहीं मानोगे तो कभी भी कार्य की उत्पत्ति नहीं हो सकेगी। पुन: इस तरह तो अर्थक्रिया के अभाव से वस्तु का अभाव ही हो जायेगा।
भावार्थ-बौद्ध विधि साधक हेतु के दो भेद मानता है-स्वभाव हेतु और कार्य हेतु। यहाँ आचार्य ने जलचंद्र का दृष्टांत देकर कारण हेतु का समर्थन किया है। कुमारिलभट्ट की ऐसी मान्यता है कि जलादि वस्तुओं में जो मुख आदि के प्रतिबिंब दिखाई देते हैं, वे प्रतिबिंब नहीं हैं किन्तु हमारी नयनरश्मियां जल से टकरा कर लौटती हुई हमारे ही मुख को देखती हैं, उसे हम भ्रांतिवश जलगत बिंब का देखना समझ लेते हैं। न्यायकुमुदचंद्र में इसका ऊहापोह विशेष किया है और सिद्ध किया है कि वस्तुओं में दूसरी वस्तुओं का प्रतिबिंब पड़ सकता है।
उत्थानिका-अब पूर्वचर को भी हेतुपना सिद्ध करते हुए कहते हैं-
अन्वयार्थ-(कृत्तिकोदयात्) कृत्तिकोदय हेतु से (भविष्यत् शकटं) भविष्य में होने वाला रोहिणी नक्षत्र (प्रतिपद्येत) जाना जाता है। (श्व: आदित्य: उदेता) आगे कल सूर्य उदित होगा (वा) अथवा (ग्रहणं) सूर्य का ग्रहण (भविष्यति) होवेगा (इति) इस प्रकार ज्ञान होता है।।५।।
अर्थ-कृत्तिकोदय हेतु से भविष्य में रोहिणी नक्षत्र का उदय जाना जाता है। कल सूर्य उदित होगा अथवा सूर्य का ग्रहण होगा, यह भी जाना जाता है अर्थात् कृत्तिकोदय हेतु पूर्वचर है वह एक मुहूर्त बाद उदय होने वाले रोहिणी नक्षत्र को बता देता है। आज सूर्योदय को देखकर कल सूर्योदय होगा तथा निमित्तज्ञ की गणित से भविष्य के ग्रहण का ज्ञान भी होता है यह पूर्वचर हेतु से होता है।।५।।
तात्पर्यवृत्ति-सूत्र उपस्कार सहित ही होते हैं। उसी का व्याख्यान करते हैं। ‘शकट-रोहिणीनक्षत्र’ धर्मी हैं, ‘मुहूर्त के अंत में होना’ यह साध्य धर्म है, क्यों ? क्योंकि कृत्तिका का उदय हो रहा है यह हेतु है अर्थात् ‘मुहूर्तांते शकटं उदेष्यति कृत्तिकोदयात्१’’ एक मुहूर्त के बाद रोहिणी नक्षत्र का उदय होगा, क्योंकि अभी कृत्तिका का उदय हो रहा है, यह पूर्वचर हेतु है।
यहाँ कृत्तिकोदय हेतु रोहिणी के उदय का कार्य अथवा स्वभाव नहीं है। केवल अविनाभाव के बल से अपने उत्तरचर का ज्ञान कराता ही है, इस प्रकार से सभी लोग मानते हैं। उसी प्रकार ‘कल प्रात: आदित्य-सूर्य उदित होगा क्योंकि आज सूर्य का उदय हो रहा है’ यह जाना है। अथवा ‘कल ग्रहण-राहु स्पर्श होगा, क्योंकि ज्योतिर्विद के गणित के नियम से जाना जाता है’ ऐसा ज्ञान होता है। इन सभी में व्यभिचार दोष नहीं है। क्रमभावी नियम अविनाभाव कार्य कारण के समान पूर्वचर और उत्तरचर में भी अविरुद्ध है इसलिए पक्षधर्मत्व आदि के बिना भी हेतु अन्यथानुपपत्ति की सामर्थ्य से साध्य का ज्ञान करा देता है।इस कथन से ‘कार्य, कारण और स्वभाव के भेद से हेतु के तीन ही भेद हैं’ इस सौगत की मान्यता का भी निराकरण कर दिया गया है और इसी से ही ‘कारण, कार्य, संयोगी, समवायी और विरोधी ये पाँच प्रकार के हेतु हैं’ इस नैयायिक मत का भी खंडन हो गया है क्योंकि उपर्युक्त कहे हुए हेतु (पूर्वचर आदि) इनमें अंतर्भूत नहीं हो सकते हैं। मात्रा मात्रिक, कार्य, विरोध, सहचारी, स्वामी, बध्य-घातक और संयोगी के भेद से सात प्रकार का हेतु है। इस प्रकार सांख्य द्वारा कल्पित हेतु की संख्या का नियम भी संभव नहीं है, ऐसा समझना चाहिए।
विशेषार्थ-कारण से कार्य का अनुमान होना। जैसे-जलते हुए ईंधन को देखकर भस्म होवेगा ऐसा समझना, यह कारण हेतु है।
कार्य से कारण का अनुमान, जैसे-नदी पूर (प्रवाह) के देखने से वृष्टि का ज्ञान होना, यह कार्य हेतु है। संयोगी के देखने से संयोगी का अनुमान, जैसे-धूम के देखने से अग्नि का ज्ञान, यह संयोगी हेतु है। समवायी के देखने से समवायी का अनुमान, जैसे-शब्द से आकाश का अनुमान, यह समवायी हेतु है।
विरोधी के देखने से दूसरे विरोधी का अनुमान जैसे विस्फूर्जित (उत्तेजित) नकुल के देखने से निकट के सर्प का ज्ञान, यह विरोधी हेतु है। इन पाँचों हेतुओं में पूर्वचर आदि हेतु गर्भित नहीं हो सकते हैं अत: यह संख्या ठीक नहीं है।
इनमें यदि अविनाभाव नियम नहीं है तो ये हेत्वाभास हैं, अव्याप्ति आदि दोषों से दूषित हैं तथा संयोगी और समवायी हेतु तो सिद्ध ही नहीं है।
सांख्य ने सात हेतु माने हैं। उनका लक्षण-(१) मात्रामात्रिकानुमान, जैसे-चक्षु के ज्ञान का अनुमान। (२) कार्य से कारण का अनुमान, जैसे-विद्युत् देखने से कारण का ज्ञान। (३) प्रकृतिविरोधी देखने से भिन्न विरोधी का अनुमान, जैसे-मेघ नहीं बरसेगा क्योंकि उल्टी हवा चल रही है।
(४) सहचरानुमान, जैसे-दो चकवे पक्षी में से एक को देखने से दूसरे का ज्ञान। (५) स्व (धन) देखने से स्वामी का अनुमान, जैसे-छत्र विशेष से राजा का अनुमान। (६) बध्य-घातानुमान, जैसे-प्रसन्न नकुल को देखने से ‘इसने सर्प को मारा है’ ऐसा ज्ञान। (७) संयोगी अनुमान, जैसे-समुदाय के मध्य पारिव्राजक होने पर ‘पारिव्राजक कौन है’ ऐसा संशय होने पर त्रिदण्ड के देखने से ‘यह पारिव्राजक है’ ऐसा ज्ञान। इन सात हेतु से अनुमान ज्ञान होता है।
यह मान्यता भी गलत है क्योंकि कृतिकोदयादि हेतुओं का इनमें अंतर्भाव न होने से संख्या ठीक नहीं है तथा यदि अविनाभाव संबंध इनमें नहीं है तो ये अहेतु ही हैं, ऐसा समझना।
उत्थानिका-अब दृश्यानुपलब्धि ही निषेध साधन है, अदृश्यानुपलब्धि नहीं है, इस एकांत का निराकरण करते हुए कहते हैं-
अन्वयार्थ-(अदृश्य पर चित्तादे:) नहीं दिखने योग्य ऐसे अन्य के चैतन्य आदि के (अभावं) अभाव को (लौकिका: विदु:) लौकिकजन भी जानते हैं (तदाकारविकारादे:) क्योंकि उसके आकार (उष्णस्पर्श, उच्छ्वास) आदि के विकार (अन्यथानुपपत्तित:) अन्य प्रकार से नहीं हो सकता है।।६।।
अर्थ-अदृश्य नहीं दिखने योग्य ऐसे पर के चैतन्य आदि का अभाव लौकिक जन भी जानते हैं क्योंकि उसके आकार (उष्णस्पर्श, उच्छ्वास आदि) के विकार की अन्यथानुपपत्ति है।।६।।