-प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका चन्दनामती
तर्ज—ले के पहला प्यार…………..
जय जय केवलि भगवान, जो अनुबद्ध हुए हैं महान,
इनकी आरति से पाएंगे हम श्री श्रुतज्ञान।।टेक.।।
ऋषभदेव प्रभु से लेकर महावीर जिनवर तक।
चौबीसों तीर्थंकर के समवसरण होते सुखप्रद।।
उनमें बारह सभा महान, बैठे गणधर मुनी प्रधान,
इनकी आरति से पाएंगे हम श्री श्रुतज्ञान।।१।।
निर्वाण तीर्थंकर का होता है जिस दिन।
केवलि भी बन जाते हैं कोई मुनि उस दिन।।
यही शृंखला चले महान, है अनुबद्ध केवली नाम,
इनकी आरति से पाएंगे हम श्री श्रुतज्ञान।।२।।
अनुबद्ध केवलियों की, आरती सजाई है।
पूजा विधान करके, खुशियाँ मनाई है।।
करे ‘‘चन्दनामति’’ गुणमान, प्रभु भक्ती का पुण्य महान,
इनकी आरति से पाएंगे हम श्री श्रुतज्ञान।।३।।