तर्ज-आवाज देकर……………
क्षमा धर्म से अपनी बगिया सजाओ।
गुणों की सुरभि अपने जीवन में लाओ।।
न क्रोधी प्रकृति आत्मा की कही है।
वहाँ तो सदा शान्ति सरिता बही है।।
नहीं क्रोध कर अपनी गरिमा घटाओ।
गुणों की सुरभि………………..।।१।।
हो यदि कोई दुश्मन तुम्हारा जगत में।
उसे जीत सकते हो तुम प्रेम बल से।।
सहनशीलता धैर्य शक्ती बढ़ाओ।
गुणों की सुरभि………………..।।२।।
प्रभु पार्श्व ने ही क्षमा धर्म पाला।
इसे धार ऋषियों ने उपसर्ग टाला।।
उन्हीं सबके चरणों में मस्तक झुकाओ।
गुणों की सुरभि………………..।।३।।
करूँ प्रार्थना प्रभु मुझे भी क्षमा दो।
प्रभो! मेरे मन को भी चन्दन बना दो।।
यही भावना ‘‘चन्दनामति’’ बनाओ।
गुणों की सुरभि………………..।।४।।