सम्यग्दर्शनसंशुद्धां, श्रमणीं श्रुतशालिनीं।
श्रीब्राह्मीमार्यिकां वंदे, गणिनीं गुणशालिनीं।।५।।
संसारदु:खतो भीत्वा, श्रीपुरुदेवमाश्रिता।
दीक्षां स्वीकृत्य मुक्त्यर्थं, ध्यानाध्ययनयो:रता।।६।।
रत्नत्रयपवित्रांगा, सन्महाव्रतधारिणीं।
समित्याचारसंसक्ता, मनोनिग्रहकारिणी।।७।।
पंचेन्द्रियजितावश्य — षट्क्रियादिषु तत्परा।
क्रोधाद्यरीन् तनूकर्त्री, मोहमायाविदूरगा।।८।।
पाणिपात्रपुटाहारा—मेकशाटकधारिणीं ।
कायक्लेशतपोरक्तां, ब्राह्मीं च सुंदरीं स्तुवे।।९।।
उपवासावमौदर्य—रसत्यागतपांसि या।
कर्मारातीन् कृशीकर्तुं, व्यधत्त परया मुदा।।१०।।
सद्धर्मामृतसंप्रीत्या, ब्रह्व्य आर्या: अपालयत्।
जगन्माता हितंकर्त्री, संस्तौमि तामहं मुदा।।११।।
परीषहमहाक्लेशा — दभीरु: कर्मसंगरे।
वीरांगनाऽप्यसौ पायात्, भवक्लेशभयाच्च मां।।१२।।
वंदेऽहं संततं भक्त्या, श्रीब्राह्मीं सुंदरीमपि।
तीर्थकृत्कन्यकां धर्म—कन्यामिव जगन्नुतां।।१३।।
रत्नत्रयस्य सिद्ध्यर्थं, त्वां महामातरं स्तुवे।
सम्यग्ज्ञानमतिर्मह्यं, भूयात् वैâवल्यसौख्यदा।।१४।।
—दोहा—
तीर्थंकर के समवसरण, में हैं गणिनी अम्ब।
पचास लक्ष छप्पन सहस, दो सौ आर्यिका वंद्य।।१५।।
अथ जिनयज्ञप्रतिज्ञापनाय मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्।