चार्वाक-हमारे यहाँ पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु ये चार तत्त्व ही प्रमेय हैं और ये परस्पर में अत्यंत भिन्न हैं।
जैन-ऐसा नहीं है क्योंकि पाँचवे जीवतत्त्व का सद्भाव देखा जाता है और उन चार तत्त्वों में परस्पर में अत्यंत भेद असंभव है। अत: तत्त्व दो ही व्यवस्थित होते हैं अर्थात् जीव और पृथ्वी आदि अजीव ऐसे दो ही तत्त्व हैं।
चार्वाक-पृथ्वी आदि का विकार ही चैतन्य है किन्तु भिन्न तत्त्व नहीं है।
जैन-यह तो महान आश्चर्य है कि जो आप अत्यंत विलक्षणभूत चेतन में अभेद मान रहे हैं और सदृश लक्षण वाले पृथ्वी आदि में भेद कहते हैं। देखो! ज्ञान लक्षण वाला चैतन्य है। स्पर्श आदि लक्षण वाले भूतचतुष्टय हैं तथा चारों में भेद है फिर भी स्पर्शादि वाले होने से उन चारों में अभेद प्रतीत हो रहा है।
भावार्थ-चार्वाक पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु इनको भूतचतुष्टय कहता है और इन चारों से ही आत्मा की उत्पत्ति मानता है तथा इन चारों में परस्पर में अत्यंत भेद स्वीकार करता है किन्तु जैनाचार्यों का कहना है कि मुख्यरूप से जीव और अजीव रूप से दो ही तत्त्व हैं। पृथ्वी, जलादि चारों ही अजीव तत्त्व हैं और चेतन आत्मा जीव तत्त्व है। चेतन का अचेतन से सर्वथा भेद है क्योंकि इनके लक्षण जुदे-जुदे हैं। चेतन का लक्षण है ज्ञान और अचेतन का लक्षण है स्पर्श, रस आदि और वैसा ही अनुभव आ रहा है इसलिए चार्वाक का मान्य भेदैकांत गलत है।