परस्पर सैकड़ों उत्सव मनाते हुए वे देव बड़ी विभूति के साथ उत्तुंग सुमेरु पर्वत पर जा पहुँचे। उस सुमेरु पर्वत की ऊँचाई एक लाख योजन की है। पर्वत के आरम्भ में ही ‘भद्रशाल वन’ है। उस वन में परकोटा एवं ध्वजाओं से सुशोभित कल्याणकारक चार जैन-मन्दिर सुशोभित हैं। उस वन से 500 योजन ऊपर ‘नंदनवन’ है, यह पाँच सौ योजन प्रमाण कटनीरूप है। इसकी भी चारों दिशाओं में चार चैत्यालय हैं। इसके बाद साढ़े बासठ हजार योजन की ऊँचाई पर महा रमणीक ‘सौमनस वन’ है, जहाँ पर सभी ऋतुओं में फल देनेवाले एक सौ आठ वृक्ष हैं एवं जिन-चैत्यालयों की संख्या चार है। उस सौमनस वन से छत्तीस हजार योजन की ऊँचाई पर चैथा एवं अन्तिम ‘पाण्डुक वन’ है। वहाँ जिन-चैत्यालयों के ऊँचे-ऊँचे समूह हैं। उस वन की सुन्दरता अपूर्व है। वन के बीच में एक चूलिका है। वह चालीस योजन ऊँची है। उसी चूलिका के ऊपर स्वर्ग है। मेरु की ईशान दिशा में सौ योजन लम्बी, पचास योजन चैड़ी, आठ योजन ऊँची एक ‘पाण्डुक’ नाम की शिला है। वह सिद्ध शिला चन्द्रमा के समान सुशोभित है। छत्र, चमर, स्वस्तिक, दर्पण, कलश, ध्वजा, ठोना, पंखा ये अष्ट मंगल द्रव्य उस शिला पर रक्खे हुए थे।
शिला के मध्य भाग में वैडूर्य मणि के सदृश रंगीन एक सिंहासन है। उसकी लम्बाई-चैड़ाई एवं ऊँचाई आधा योजन प्रमाण है। जिनेन्द्र भगवान के स्नान-जल से पवित्र हुए रत्नों के तेज से वह सिंहासन ऐसा प्रतीत होता था कि मानो सुमेरु का दूसरा शिखर ही हो। उसके ठीक दक्षिण की ओर दूसरा सिंहासन सौधर्म इन्द्र का है एवं उत्तर दिशा की ओर ईशान इन्द्र के बैठने का आसन है। सौधर्म स्वर्ग के इन्द्र ने अन्य देवों के साथ महोत्सव सम्पन्न करते हुए, स्नान कराने के उद्देश्य से भगवान को उसी शिला पर विराजमान किया। देवराज ने सर्वप्रथम उस पर्वतराज की परिक्रमा की।
इस प्रकार देवेन्द्र ने पुण्योदय से बड़ी विभूति के साथ वर्तमान कालखण्ड के अन्तिम तीर्थंकर (शिशु) को शिला पर विराजमान किया अतः भव्यजन यदि ऐसी अतुलनीय सम्पदा एवं अपरम्पार सुख की आकांक्षा रखते हैं, तो उन्हें सोलहकारण भावनाओं के चिन्तवन से निर्मल पुण्य का उपार्जन करना चाहिए। ‘तीर्थंकर’ सदृश अक्षुण्ण सम्पदा प्राप्त कराने में पुण्य ही सहायक होता है। पुण्य से इस जगत् में पवित्रता की वृद्धि होती है। पुण्य के अतिरिक्त इस जगत् में दूसरी कोई वस्तु सुख प्रदान करनेवाली नहीं है। इस पुण्य का मूल कारण व्रत है। प्राणियों को पुण्य के बल से ही अनेक गुणों की प्राप्ति हुआ करती है।
श्री जिनेन्द्र भगवान के महान अभिषेक उत्सव को देखने की इच्छा रखनेवाले धार्मिक देव उस पर्वतराज को घेर कर बैठ गये। दिक्पाल देव अपनी-अपनी मण्डली को साथ लेकर अपनी दिशा की ओर बैठे। उस स्थान पर देव शिल्पियों ने एक ऐसे मण्डप का निर्माण किया था, जिसमें सभी देव सुखपूर्वक बैठ सकते थे। मण्डप में यत्र-तत्र कल्पवृक्ष की मालायें लटक रही थीं। उन मालाओं पर बैठे हुए भौंरे इस प्रकार गूँज रहे थे, मानो वे प्रभु का गुण-गान ही कर रहे हों।
गन्धर्व देव एवं किन्नरियों ने बड़े ही सुमधुर स्वरों में जिनदेव के कल्याणकारी गुणों का गान आरम्भ किया। अनेक देवियाँ हाव-भावपूर्वक नृत्य करने लगीं। देवों के विविध प्रकार के वाद्य बजने आरम्भ हो गये। कुछ देव पुण्यादि की अभिलाषा से पुष्पों की वर्षा करने लगे। इसके पश्चात् इन्द्र ने अभिषेक करने के लिए प्रस्ताव रख कलशों की रचना की। कलश-निर्माण-मंत्र जाननेवाले सौधर्म इन्द्र ने मोतियों की माला एवं चन्दन से युक्त कलश को हाथ में लिया एवं सब कल्पवासी देव ‘जय-जय’ शब्द करते हुए कल्याणक संबंधी कार्य करने लगे। इन्द्राणी एवं देवियाँ भी कार्य करने में संलग्न हो गईं। उनके हर्ष का पारावार नहीं था। ‘स्वयम्भू’ भगवान का शरीर स्वभाव से ही पवित्र है। उनके रक्त का रंग दुग्ध के सदृश श्वेत है। अतएव उनके लिए क्षीर-समुद्र के जल के अतिरिक्त अन्य कोई जल स्पर्श करना उचित नहीं है, ऐसा सोच कर वे देवगण पर्वत से लेकर समुद्र तक कतारें बाँध कर खड़े हो गये। उस समय इन्द्र ने श्रीजिनेन्द्र को स्नान कराने के लिए मोतियों के हार से सुशोभित आठ योजन गहरे एवं एक योजन मुखवाले सुवर्णमय कलश को पकड़ने के उद्देश्य से दिव्य आभूषणों से युक्त हजार भुजायें बना ली। उस समय इन्द्र की शोभा देखने ही योग्य थी। एक सहस्र हाथों से एक हजार कलशों को पकड़े हुए इन्द्र ऐसा प्रतीत होता था, मानो वह ‘भाजनांग’ जाति का कल्पवृक्ष ही हो। सौधर्म इन्द्र ने ‘जय-जय’ शब्द का गम्भीर उच्चारण करते हुए भगवान के मस्तक पर पहली जलधारा छोड़ी। अन्य देव भी उस समय ‘जय हो, हमारी रक्षा करो’ आदि जयघोष करने लगे। उनके गम्भीर निनाद से पर्वतराज पर बड़ा कोलाहल मचा। दूसरे देवेन्द्र भी सौधर्म इन्द्र के साथ भगवान के मस्तक पर गंगा की तीव्र धारा के सदृश जलधारा डालने लगे।
वह जलधारा बड़ी तीव्र गति से भगवान के मस्तक पर पड़ने लगी। वह धारा यदि दूसरे किसी पहाड़ पर पड़ती, तो उसके खण्ड-खण्ड हो जाते पर अतुलित बलशाली होने के कारण भगवान के शरीर पर वह पुष्प जैसी सुकोमल अनुभूत हुई। जल के छींटे आकाश में बहुत ऊँचे उछलते हुए ऐसे प्रतीत होते थे, मानो वे भगवान के शरीर का स्पर्श करने से पापों से मुक्त होकर ऊध्र्व गति को जा रहे हैं। स्नान-जल के कितने ही छींटे मोतियों जैसे मालूम पड़ते थे। स्नान-जल का ऊँचा प्रवाह उस पर्वतराज के वनों में ऐसे वेग से बढ़ा कि देखने से मालूम होने लगा कि पर्वतराज को खण्ड-खण्ड कर देगा।
भगवान के स्नान किये हुए जल से डूबी हुई वनस्थली ऐसी दीखने लगी, मानो वह दूसरा क्षीरसमुद्र ही हो। महान उत्सवों से सम्पन्न, नृत्य-गीतादि से युक्त उस समय का उत्सव देखकर देवों के आनन्द की सीमा न रही। इन्द्र ने आत्म-शुद्धि के लिए भगवान को शुद्ध स्नान कराया।स्नान की जलधारा भगवान के शरीर का स्पर्श कर अत्यन्त पवित्र हो गई। अपार पुण्य प्राप्त करानेवाली एवं संसार की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करने वाली वह जलधारा हमें एवं भव्य जीवों को मोक्ष-लक्ष्मी प्रदान करे। जो जलधारा पुण्यास्त्र जलधारा के समान मनवांछित पदार्थों को प्रदान करनेवाली है, वह समस्त भव्य जीवों को इच्छित वस्तुयें प्रदान करे।वह जलधारा तीक्ष्ण खड्ग के सदृश सत्पुरुषों के विघ्नों का नाश कर देती है। वह दुःख एवं असह्य वेदना का नाश करनेवाली है। जो जलधारा भगवान के शरीर से लगकर पवित्र हो चुकी है, वह हमारे दुःख (कर्मरूपी मैल) को हटा कर हमें पवित्र करे। इस प्रकार देवों के अधिपति ने भगवान का अभिषेक कर के ‘भव्यों को शान्ति हो’ ऐसा कहा। उस सुगन्धित जल (गन्धोदक) को देवों ने शुद्धि के लिए मस्तक पर लगाया।
अभिषेक का उत्सव सम्पन्न होने के पश्चात् तीर्थंकर, इन्द्र एवं देवताओं द्वारा पूजे गये उन भगवान श्री महावीर की दिव्य गन्ध, मोतियों के अक्षत, कल्पवृक्ष के पुष्प, अमृत के पिण्डरूपी नैवेद्य, रत्नों के दीप, अष्टांग धूप, कल्पवृक्ष के फल, अर्घ, पुष्पांजलि आदि के साथ पूजा की गई। इस प्रकार इन्द्र ने बड़ी भक्ति के साथ भगवान की प्रार्थना करते हुए अभिषेक उत्सव सम्पन्न किया पुनः इन्द्र ने इन्द्राणी एवं अन्य देवों के साथ भगवान को प्रणाम किया।उस समय का प्राकृतिक दृश्य बड़ा ही मनोरम था। आकाश से सुगन्धित जल के साथ पुष्पों की वर्षा होने लगी। देवों ने मन्द सुगन्ध एवं शीतल वायु प्रवाहित की। वस्तुतः जिन (प्रभु) के जन्माभिषेक का सिंहासन सुमेरु पर्वत है एवं स्नान करानेवाला इन्द्र है, मेघ के समान दुग्ध से भरे हुए कलश हैं, स्वयं देवियाँ नृत्य प्रस्तुत करने वाली हैं, स्नान के लिए क्षीर-समुद्र है एवं जिस जगह देवगण सेवक हैं, भला ऐसे जन्माभिषेक की महिमा का कोई कैसे वर्णन कर सकता है? अर्थात् कोई नहीं कर सकता।
अभिषेक किये हुए भगवान (शिशु) के सर्वांग को इन्द्राणी ने उज्ज्वल वस्त्र से पोंछा। इसके बाद उसने भक्तिपूर्वक सुगन्धित द्रव्यों से उनका लेपन किया। यद्यपि वे प्रभु तीनों जगत् के तिलक थे, फिर भी भक्तिवश उसने उनके मस्तक पर तिलक लगाया। जगत् के चूड़ामणि भगवान के मस्तक में चूड़ामणि रत्न बाँधा गया। यद्यपि भगवान के नेत्र स्वभाव से ही काले थे, फिर भी लोक-व्यवहार दिखलाने के लिए उनके नेत्रों में इन्द्राणी ने अंजन लगाया।भगवान के कानों में इन्द्राणी ने रत्नों के कुण्डल पहिनाये। प्रभु के कण्ठ में रत्नों का हार, बाहों में बाजूबन्द, हाथों में कड़े एवं अँगुलियों में अँगूठी पहिनाई। कमर में छोटी घण्टियोंवाली मणियों की करधनी पहिनाई, जिसके तेज से सारी दिशायें व्याप्त हो गयीं। प्रभु के पैरों में मणिमय गोमुखी कड़े पहिनाये गये। इस प्रकार असाधारण दिव्य मण्डनों (गहनों) की कान्ति एवं स्वाभाविक गुणों से प्रदीप्त वे प्रभु ऐसे प्रतीत होने लगे, मानो लक्ष्मी के पंुज ही हों।
भगवान का दिव्य शरीर आभूषणों से द्विगुणित शोभायमान हो गया। आभूषणों से सजे हुए इन्द्र की गोद में विराजमान श्री महावीर प्रभु को देखकर इन्द्राणी को परम आश्चर्य हुआ। इन्द्र को भी कम आश्चर्य नहीं हुआ दोनों नेत्रों से उन्हें देखने से जब इन्द्र को तृप्ति नहीं हुई, तब उसने अपने हजार नेत्र कर लिये। अन्य देव-देवियाँ भी भगवान की रूप-सुधा का पान कर अत्यन्त हर्षित हुईं।तत्पश्चात् सौधर्म स्वर्ग का इन्द्र प्रभु की स्तुति करने के लिए प्रस्तुत हुआ। वह तीर्थंकर के पुण्योदय से उत्पन्न उनके गुणों की प्रशंसा करने लगा। उसने कहाµ‘हे देव! बिना स्नान के ही आप का सर्वांग पवित्र है, पर मैंने अपने पापों की शान्ति के लिये आज भक्तिपूर्वक आप को स्नान कराया है। आप तीनों जगत् के आभूषण हैं, पर मैंने अपने सुखों की प्राप्ति के लिए आपको आभूषणों से विभूषित किया है। हे प्रभो! आपकी महान सत्ता आज सारे संसार पर अपने प्रभाव का विस्तार कर रही है।’हे देव! कल्याण की कामना रखने वाले लोगों का कल्याण आपके ही द्वारा होगा। आप मोह के सागर में गिरे हुए व्यक्तियों के लिए सहारा हो। आप की अमृतमयी वाणी मोह-शत्रु का विनाश करेगी। आप धर्म- तीर्थरूपी जलपोत के द्वारा भव्य जीवों को संसार-समुद्र से पार उतारोगे। हे नाथ! आपकी वचनरूपी किरणें जीवों के मिथ्याज्ञानरूपी अन्धकार का सर्वथा विनाश करेंगी, इसमें सन्देह नहीं। हे स्वामिन्! आप केवल मोक्ष-प्राप्ति के उद्देश्य से ही नहीं उत्पन्न हुए हैं, आप का उद्देश्य मोक्ष की आकांक्षा रखने वाले जीवों को मार्ग दिखलाना भी है। आप सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रय की वर्षा करते हुए सत्पुरुषों को निर्मल बनायेंगे। आपका जन्मधारण करना सर्वथा स्तुत्य है।
हे महाभाग! मोक्षरूपी स्त्री आप में आसक्त हो रही है। भव्य जीव तो आपकी प्रतीक्षा करते ही हैं। वे बड़े प्रेम एवं भक्ति के साथ आप की चरण-सेवा के लिए सन्नद्ध हैं। वे आप को मोहरूपी महायुद्ध के विजेता, शरण में आये हुए के रक्षक, कर्मरूपी शत्रुओं के विनाशक एवं मोक्ष-मार्ग प्रशस्त करनेवाला मानते हैं। हे प्रभो! वस्तुतः आज हम आपका जन्माभिषेक कर अत्यन्त कृतार्थ हो गये हैं एवं आप का गुणानुवाद करने से हमारा मन अत्यन्त निर्मल हो गया है।हे गुणों के अपार सागर! आपकी स्तुति करने से हमारा जन्म सफल हो गया एवं आपकी देह-सेवा से हमारा शरीर भी सफल हुआ। जिस प्रकार खान से निकलने वाले रत्न का संशोधन करने पर उसमें और अधिक चमक आने लगती है, ठीक उसी प्रकार आप स्नान आदि से बहुत सुशोभित हो रहे हैं। हे नाथ! आप समस्त संसार के नाथ हैं एवं आप बिना किसी कारण के ही लोक-हित-चिन्तक हैं। परमानंद प्रदान करने वाले हे विभो! आप को शत शत प्रणाम है। तीनों ज्ञानरूपी नेत्रों के धारक आप को बारम्बार प्रणाम है।
धर्म-तीर्थ के प्रवर्तक हे भगवन्! उत्तम गुणों के सागर एवं मल-स्वेद आदि से रहित शरीर धारण करने वाले आपको प्रणाम है। हे देव! निर्वाण का मार्ग दिखलाने वाले, कर्मरूपी शत्रुओं के संहारक, पंचेन्द्रियों के मोह को परास्त करनेवाले, पंच-कल्याणकों के भागी, स्वभाव से निर्मल, स्वर्ग-मोक्ष प्रदान करनेवाले, अनन्त महिमा से मण्डित, बिना स्वार्थ के समस्त संसारी जीवों का हित करनेवाले, मोक्षरूपी भार्या के स्वामी, संसार का अन्धकार नष्ट करनेवाले, तीनों जगत् के स्वामी एवं सत्पुरुषों के गुरु, आप को करबद्ध प्रणाम है।
हे देव, मैं आपकी स्तुति इसलिये नहीं करता कि मुझे तीनों जगत् की सम्पदा प्राप्त हो, बल्कि मुझे ऐसी सम्पदा प्रदान करो, जिससे मोक्ष का मार्ग सुलभ हो। वस्तुतः इस संसार में आप के सदृश अन्य कोई दाता नहीं है।’ इस प्रकार श्री महावीर स्वामी की स्तुति कर सौधर्म स्वर्ग के इन्द्र ने व्यवहार की प्रसिद्धि के लिए उनके दो नाम रख दियेदृ कर्म-शत्रु पर विजय प्राप्त करने के कारण ‘‘श्रीमहावीर’ एवं सद्गुणों की वृद्धि होने से ‘वर्द्धमान’। इस प्रकार भगवान का नामकरण कर इन्द्र ने देवों के साथ उनको ऐरावत गजराज पर बिठा कर कुण्डलपुर की ओर प्रस्थान किया।