(अंतिम अनुबद्धकेवली स्तुति)
—मालिनी छंद—
विहित—विमल—सम्यक््खड्गधाराव्रत: प्राक्।
भव इह न हि कांतासक्तचेता निकाम:।।
इह भरतधरायामंतिम: केवली तम्।
त्रिभुवननुतजम्बूस्वामिनं स्तौमि भक्त्या।।१।।
सम्यक््â निर्मल असिधाराव्रत, पहले भव में किया मुनीश।
इस भव में रामा में रति नहिं, किया काम से रहित यतीश।।
भरत धरा में जो अंतिम, केवलि हैं उनको भक्ती से।
त्रिभुवननुत श्रीजंबूस्वामी, का स्तवन करूँ रुचि से।।१।।
रतिपतिविजयी त्वं प्रोल्लसज्ज्ञानतेजा:।
त्रिभुवनततमिथ्यात्वांधकारांशुमाली।।
जिनवरमतवार्धे—वर्धनायेन्दुपूर्ण: ।
भविकुमुदविकासी च श्रये त्वां मुनीन्द्र!।।२।।
रतिपतिविजयी विलसत ज्ञान, पुंजमय तेजस्वी तुम हो।
त्रिभुवन के मिथ्यांधकार को, हरने में तुम भास्कर हो।।
जिनवर मत वारिधि वर्धन को, पूर्ण चन्द्रमा तुम ही हो।
भविजन कुमुद विकासी मुनिवर, सब जन आश्रय तुम ही हो।।२।।
धवलशुभयशोवत्शुक्लयोगेन जात:।
परमविशदकेवलविस्फुरज्ज्ञानरश्मि: ।।
विलसितसितकीर्तिर्भानुतेजोऽतिक्रान्त: ।
निरुपमसुखधाम प्राप्तवान् तं नमामि।।३।।
धवल कीर्तिसम शुक्ल ध्यान से, घातिकर्म का घात किया।
परम विशद प्रस्फुरित ज्ञानमय, किरण सूर्य को प्राप्त किया।।
विलसत शुभ्र कीर्ति भानु का, तेज तिरस्कृत करते हो।
निरुपम धाम मुक्ति पद पाया, नितप्रतिवंदन तुमको हो।।३।।
प्रविगतभवमिथ्यामोहमायाविषाद: ।
कुगतिविविधदु:खक्षारनीराब्धिपार:।।
जनममरणशून्यश्च स्तुवे संततं तं।
भवभयहरजम्बूस्वामिनं स्वात्मसिद्ध्यै।।४।।
भव से रहित मोह मिथ्या, माया विषाद से रहित मुनीश।
कुगतिगमन के विविध दु:खमय, क्षीर जलधि के पार यतीश।।
जन्ममरण से रहित सदा हो, भवभयहर जंबूस्वामी।
स्वात्मसिद्धि के लिये नमूं मैं, मेरा भव हरिये स्वामी।।४।।
स्वयमपि निजसम्यग्ज्ञानचर्या—बलेन।
हृदयसरसिजे स्वं स्वेन त्वं िंचतयित्वा।।
मुनिगणनुत! स्वस्मिन् स्वस्य हेतोश्च तिष्ठन्।
निजकृतिवशतोऽभूस्त्वं स्वयंभू: स्तुवे त्वाम्।।५।।
स्वयं आप निज सम्यग्दर्शन, ज्ञान चरित रत्नत्रय से।
हृदय कमल में निज के द्वारा, निज में निज को तुम ध्याके।।
मुनिगण नुत! निज हेतू निज में, स्थित हो तुम निजकृति से।
हुये स्वयंभू स्वयं क्रिया से, तव संस्तवन करूँ मुद से।।५।।
प्रविलसदचलार्चिर्भानुमाली चिदात्मा।
विगतकुमतरात्रिर्ध्वस्तकुज्ञानदोष: ।।
अयमतुलविवस्वान् रक्तिमास्त्री—विरक्त:।
उदयति हृदयाद्रेस्त्वां श्रितानां स्तुवेऽत:।।६।।
विलसत अचल किरणमय भास्कर, चिच्यैतन्य चिदानंद हो।
कुमत निशा से रहित महा—कुज्ञान दोष से शून्य अहो।।
अतुल सूर्य हो आप लालिमा, भार्या से विरक्त मन हो।
वंदूं तुमको आश्रित जन के, हृदयाचल पर उगते हो।।६।।
त्रितयजगति मोहस्त्वेकसाम्राज्यकर्ता।
विधृतकुनयगर्व: कुत्सितन्यायकारी।।
त्रिभुवनजनता: संत्रास्यमाना: सदैव।
तमपि विजितवान् यो मोहजयिनं स्तुवे तम्।।७।।
त्रिभुवन में यह मोह अकेला, सार्वभौम साम्राज्य करे।
कुनयगर्व को धारे कुत्सित—न्याय महाअन्याय करे।।
त्रिभुवन जनता त्रासित करके, सदा अनंतों दु:ख देता।
उसको जीत मोहविजयी तुम, हुये नमूं तुमको त्रेधा।।७।।
अनुपमनिजतत्त्वं चिच्चमत्कारमात्रम्।
स्वरसविसरभारै: स्वोत्थसौख्यामृतं तत्।।
गणधरनुतवीराल्लब्धसम्यक््âस्वभाव:।
अमृतमयपदं त्वं संश्रितोऽहं श्रये त्वाम्।।८।।
अनुपम स्वात्मतत्त्व है चिच्चैतन्य चमत्कारी जग में।
स्वरससुधा भार से निज उत्पन्न सुखामृत सुंदर है।।
गणधर से नुत वीर प्रभू से, प्राप्त किया निज सम्यग्ज्ञान।
अमृतमय शिवपद को पाया, तव आश्रय लेऊँ सुखदान।।८।।
जंबूवने शिवं प्राप्तो, जम्बूस्वामी मुनीश्वर:।
मया प्रणम्यते भक्त्या, ज्ञानमूर्ति: स्वसंपदे।।९।।
जंबूवन से मोक्ष गये हैं, श्री जंबूस्वामी मुनिनाथ।
भक्ती से निजसंपति हेतुु, प्रणमूं ‘‘ज्ञानमूर्ति’ शिवनाथ।।९।।
।।अथ मंडलस्योपरि पुष्पांजिंल क्षिपेत्।।