शंका-बाह्य पदार्थों के अवलंबन लेने से ही ज्ञान के ये भेद संभव हैं। अत: ज्ञान स्वव्यवसायात्मक-स्व को जानने वाला वैâसे होगा ?
समाधान-ऐसी बात नहीं है। ये भेद स्वसंवेदन के होते हैं। कारिका में ‘स्वसंविदाम्’ पद है। पुन: यहाँ पर ‘अपि’ शब्द का अध्याहार करना चाहिए। तब ऐसा अर्थ निकलता है कि ये भेद केवल अर्थ संवेदन के ही नहीं है किन्तु स्वसंवेदन के भी अवग्रह आदि होते हैं। स्व-ज्ञानस्वरूप का, संविद-वेदन, भिन्न ज्ञानों की अपेक्षा न करके अनुभव होना जिनमें है वे ज्ञान स्वसंवेदन कहलाते हैं। यहाँ ऐसा व्याख्यान है।ज्ञान अस्वसंवेदी नहीं है अन्यथा अर्थ के संवेदन का भी विरोध हो जावेगा। यदि आप ऐसा कहें कि ज्ञान अपने स्वरूप को दूसरे ज्ञान से जानता है, तब तो अनवस्था का प्रसंग आ जावेगा। इस कथन से ‘ज्ञान परोक्ष है’ ऐसा कहने वाले मीमांसक, ‘ज्ञान ज्ञानांतर से प्रत्यक्ष है’ ऐसा कहने वाले यौग, ‘ज्ञान अचेतन है’ ऐसा कहने वाले सांख्य और ज्ञान पृथ्वी आदि भूतचतुष्टय का परिणाम है ऐसा कहने वाले चार्वाक इन सभी का खंडन कर दिया गया है क्योंकि इन सबके मत प्रत्यक्षादि प्रमाणों से बाधित हैं।
भावार्थ-प्रश्न यह उठा था कि ये मतिज्ञान के बहु आदि की अपेक्षा करके अवग्रह आदि ज्ञान के ३३६ भेद हुए हैं। ये सब भेद बहु आदि बाह्य पदार्थों की अपेक्षा से ही तो हुए हैं अत: ज्ञानत्व को जानने वाला नहीं है मात्र पर पदार्थों को ही जानने वाला है। इसका उत्तर देते हुए आचार्य ने कहा कि ये भेद पदार्थों को ग्रहण करने वाले ज्ञान के ही नहीं हैं किन्तु स्व को अनुभव करने वाले स्वसंवेदी ज्ञान के भी ये सभी भेद होते हैं क्योंकि ज्ञान स्व-पर प्रकाशी है। यदि ज्ञान अपने स्वरूप को नहीं जानता है तो वह परपदार्थों को भी नहीं जान सकेगा। इस पर नैयायिक ने कहा कि ज्ञान अपने स्वरूप को दूसरे ज्ञान से जानता है। तब आचार्य ने कहा कि ऐसी मान्यता में पुन: उस दूसरे ज्ञान के स्वरूप को तीसरे ज्ञान से जानेगा आदि। ऐसी व्यवस्था में तो अनवस्था आ जावेगी अत: ज्ञान को स्व परवेदी मानना उचित है।
मीमांसक परोक्ष ही है वह पदार्थ को जानता है किन्तु वह स्वयं किसी से नहीं जाना जाता है। यौग ज्ञान को दूसरे ज्ञान से वेद्य मानता है। सांख्य कहता है कि ज्ञान अचेतन है, वह प्रकृति-जड़ का परिणाम है। चार्वाक कहता है कि पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु इन भूतचतुष्टय से आत्मा बनती है और ज्ञान भी इन्हीं का परिणाम है। यहाँ पर ज्ञान को स्व पर को जानने वाला सिद्ध कर देने से इन सभी की मान्यता का निराकरण हो जाता है।