वीर भगवान को वैराग्य उत्पन्न होने के पश्चात् आठों लौकान्तिक देवों ने अपने अवधिज्ञान से यह निश्चय कर लिया कि भगवान के तप-कल्याणक का उत्सव मनाना चाहिये। तत्पश्चात् वे भगवान श्रीमहावीर के पास आये। उन देवों ने अपने पूर्व जन्म में द्वादशांग श्रुत का अभ्यास किया था तथा वैराग्य भावनाओं का चिन्तवन किया था। चैदह श्रुत के जाननेवाले, देवों में श्रेष्ठ वे देवर्षि कहलाते थे।कर्मरूपी बैरियों को नाश करने में जो प्रयत्नशील हैं, ऐसे वीर भगवान को प्रणाम कर तथा स्वर्ग से लाये हुए पवित्र द्रव्यों से भगवान की पूजन कर वैराग्यमय परिणाम हो जाय, ऐसी वैराग्यमयी स्तुति के द्वारा वे विद्वान लौकान्तिक देव भगवान का गुणगान करने लगे।
हे वीर प्रभु! आप जगत् के स्वामी हैं, गुरुओं के श्रेष्ठ महान गुरु हैं, ज्ञानियों में श्रेष्ठ ज्ञानी हैं, समझदारों में आप सर्वश्रेष्ठ समझदार हैं। आपको हम विशेष क्या समझा सकते हैं? इसलिये स्वयंबुद्ध तथा सर्व पदार्थों के ज्ञाता आपको हम क्या समझावें? क्योंकि आप स्वयं हमको सद्बुद्धि देनेवाले हैं। जिस प्रकार प्रकाशमान दीपक समस्त पदार्थों को प्रकाशित करता है, उसी तरह आप भी संसार के समस्त पदार्थों को प्रकाशित करेंगे। परन्तु हे भगवन्! हमें सन्तोष होता है कि हम आपको समझाने के बहाने से आपके दर्शन एवं आपकी भक्ति करने को यहाँ आने का सौभाग्य प्राप्त कर लेते हैं। आप तो तीन ज्ञान के धारी हैं, आपको भला शिक्षा कौन दे सकता है? क्या सूर्य का दर्शन करने के लिए दीपक की आवश्यकता होती है? कदापि नहीं। हे देव! बलवान मोहरूपी शत्रु को जीतने के लिए आपने जो उद्यम किया है, उसे देख कर संसार-समुद्र पार होने की इच्छा रखने वाले अनेक भव्य आत्माओं का महान हित होगा। आप जैसे दुर्लभ जलपोत को पाकर असंख्यात भव्य जीव विकट संसार-सागर से पार हो सकेंगे। कितने ही भव्य जीव आपके पवित्र उपदेश से रत्नत्रय को अंगीकार कर उसके द्वारा ‘सर्वार्थसिðि’ जैसे स्थान में गमन करेंगे। कितने ही प्राणी आपकी वाणी को सुनकर मिथ्याज्ञानरूपी अन्धकार का निवारण कर सब पदार्थों के साथ-ही-साथ मोक्ष-लक्ष्मी को भी देखेंगे। हे प्रभु! आप से बुद्धिमानों को मनचाहे इष्ट पदार्थों की सिद्धि होगी। हे देव! आपके प्रसाद से ही स्वर्ग एवं मोक्ष की प्राप्ति हो सकेगी।
हे दीनानाथ! मोहरूपी फन्दे में फंसे हुए भव्य प्राणियों को आप ही लगातार सहारा देंगे, क्योंकि आप ही तीर्थ को चलानेवाले धर्म-प्रवर्तक हैं। आपके वचनरूपी मेघ से वैराग्यरूपी अपूर्व वज्र को पाकर असंख्यात बुद्धिमान बहुत ऊँचे मोहरूपी शिखर को बात-की-बात में खण्ड-खण्ड कर देंगे। आपके उपदेश से पापी प्राणी अपने पापों को एवं कामी व्यक्ति काम-शत्रु को शीघ्र ही परास्त कर डालेंगे, इसमें रंचमात्र भी सन्देह नहीं है। हे स्वामी! यह भी निश्चय है कि बहुत से प्राणी आपके चरण-कमलों के सेवन से दर्शन-विशुद्ध्यादि सोलह भावनाओं को स्वीकार करके आप ही के समान महान हो जायेंगे।हे प्रभो! संसार से बैर करनेवाले, वैराग्यरूपी अस्त्र को रखने वाले आपके अवलोकनमात्र से मोह एवं इन्द्रियरूपी शत्रु अपनी जीवन-लीला समाप्त होने के भय से कांप रहे हैं क्योंकि हे दीनबन्धु! आप बलवान सुभट हैं, दुर्जय परीषहरूपी वीरों को क्षण-मात्र में जीतने की सामथ्र्य रखते हैं। इसलिये हे वीर प्रभो! आप मोह एवं इन्द्रियरूपी बैरियों को जीतने में तथा भव्यात्माओं का उपकार करने के लिए चारों घातिया कर्मरूपी शत्रुओं के नाश करने का शीघ्र उपाय करें, क्योंकि अब यह उत्तम समय तपस्या करने के लिए एवं भव्यों को मोक्ष में ले जाने के लिए आपके हाथ में आया है।
हे वीर प्रभु! आपको प्रणाम है, आप जगत्-हितैषी हैं, आप ही मोक्षरूपी रमणी की प्राप्ति के लिए उद्योगी हैं, इसलिये आपको हम पुनः प्रणाम करते हैं। अपने ही शरीर के भोगों के सुख में इच्छारहित हैं, इसलिये भी आपको प्रणाम है। मोक्षरूपी स्त्री के साथ रमण करने की इच्छा रखते हैं, इसलिये आपको प्रणाम है। महान पराक्रमी, बाल ब्रह्मचारी, राज्यलक्ष्मी के त्यागी, अविनाशी लक्ष्मी में लीन आपको प्रणाम है। योगियों के भी आप महान गुरु हैं, इसलिये आपको प्रणाम है। सब जीवों के परम बन्धु हैं, सर्वज्ञ हैं, इसलिये पुनः आपको प्रणाम है।
‘‘हे महान प्रभु! इस स्तुति द्वारा हम यही प्रार्थना करते हैं कि परलोक में चारित्र की सिद्धि के लिए आप हमें पूरी शक्ति दें। हे वीर प्रभु! वह शक्ति मोहरूपी शत्रु का नाश करनेवाली है।’’ इस प्रकार जगत्पूज्य श्रीवीर भगवान की स्तुति एवं अनेक प्रार्थनाएँ करके वे लौकान्तिक देव अपने-अपने स्थान को चले गये।उसी समय समस्त देवादि सहित चारों जाति के इन्द्रों ने घण्टादि के स्वतः बजने से भगवान का संयमोत्सव समझकर भक्तिभाव से अपनी इन्द्राणियों के साथ महान विभूति से विभूषित होकर अपनी-अपनी सवारियों पर आरूढ़ होकर नगरी में प्रवेश किया। देवों की सेना ने अपनी पत्नियों सहित, सवारियों पर चढ़े हुए नगर एवं वन को चारों ओर से घेर लिया। तत्पश्चात् इन्द्र ने भगवान महावीर स्वामी को एक सिंहासन पर बैठाकर अत्यन्त प्रसन्नता प्रदर्शित करते हुए गीत, नृत्य, ‘जय-जयकार’ शब्दों का उच्चारण करते हुए क्षीर-सागर से भरे हुए एक हजार आठ स्वर्ण के कलशों से उनका अभिषेक किया। इन्द्र ने उन त्रिलोकीनाथ को दिव्य आभूषणों एवं वस्त्रों से अलंकृत किया, सुगन्धित दिव्य मालायें पहिनाईं। इस तरह इन्द्र ने भगवान को खूब सजाया। तत्पश्चात्, भगवान ने जन्म देनेवाली अपनी माता को ज्ञानामृत से सिंचित प्रभावशाली, सरल एवं मीठे शब्दों में सान्त्वना प्रदान कर, वैराग्य को उत्पन्न करनेवाले उपदेशों के सैकड़ों वाक्यों से अपनी दीक्षा की बात समझा दी। संयमरूपी लक्ष्मी के सहवास-सुख में उद्यमी वे वीर प्रभु हर्ष के साथ समस्त राज-पाट, माता-पिता एवं बन्धुओं को त्याग कर इन्द्र द्वारा लाई हुई दैदीप्यमान ‘चन्द्रप्रभा’ नाम की पालकी पर आरूढ़ होकर दीक्षा के लिए वन की ओर चले गये। उस समय वे जगत् के स्वामी समस्त देवों से घिरे हुए, दिव्य आभूषणों से युक्त, अत्यन्त मनोज्ञ प्रतीत होते थे।
सबसे पहिले भूमिगोचरी मनुष्यों ने पालकी को उठाया एवं सात पैंड आगे ले जाकर रख दिया। तत्पश्चात् विद्याधर आकाश-मार्ग से सात पैंड ले गये, उसके बाद धर्म से प्रेम रखनेवाले समस्त देवों ने अपना-अपना कन्धा लगाया एवं आकाश-मार्ग से चलने लगे। इस समय की शोभा का वर्णन करना इसलिये असम्भव है कि जिस पालकी को ले जानेवाले स्वयं इन्द्र एवं स्वर्ग के देवता लोग हों, उसकी अनुपम छटा का वर्णन क्या सामान्य लेखनी द्वारा हो सकता है? उस समय हर्ष से पुलकित समस्त देव पुष्पों की वर्षा कर रहे थे, वायुकुमार देव गंगाजल के कणों से युक्त मधुर पवन चला रहे थे, कुछ देव भेरी बजा रहे थे। इन्द्र की आज्ञा से उन देवों ने यह घोषणा की कि भगवान का यह समय मोहादि शत्रुओं को जीतने का है। यह सुन समस्त देवों ने हर्षित होकर प्रभु के सामने खूब उत्सव मनायादृ ‘जयवन्त हो’, ‘आनन्दयुक्त’ हो, ‘वृद्धि पाओ’दृ आदि शब्द होने लगे। दुन्दुभी वाद्यों के शब्द होने लगे, अप्सरायें नृत्य करने लगीं, किन्नरी देवियाँ मधुर शब्द में मोहरूपी शत्रु को जीतने का यश गान करने लगीं। प्रभु के आगे दिक्कुमारी देवियाँ मंगल-अर्घ लेकर चलने लगीं।
महापुराण में लिखा है-
अग्रेसरीषु लक्ष्मीषु पंकजव्यग्रपाणिषु।
संय मंबगलार्धाभि-र्दिक्कुमारीभिरादरात्।।
हाथों में कमल धारण किए हुए लक्ष्मी आदि देवियां आगे-आगे जा रही थीं और बड़े आदर से मंगलद्रव्य तथा अघ्र्य लेकर दिक्कुमारी देवियां उनके साथ-साथ जा रही थीं।
इस प्रकार भगवान महावीर नगर से वन को चले गये। नगरवासियों ने प्रभु की भूरि-भूरि प्रशंसा की। कितने ही लोग यह भी कहते थे कि अभी जिनराज कुमार ही हैं, फिर भी थोड़ी-सी उम्र में इन्होंने कामरूपी शत्रु को पराजित कर बड़ा भारी उच्च कोटि का काम किया है एवं आज मोक्ष-लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए तपोवन को चले जा रहे हैं।
इस तरह के वाक्य सुन कर अन्य लोग भी इसी तरह कहने लगे कि मोह को तथा कामदेव-रूपी शत्रु को प्रभु ने ही जीत पाया है, दूसरे में यह सामथ्र्य नहीं है। उसके पश्चात् सूक्ष्म विचारवाले इस तरह कहने लगे कि यह सब वैराग्य का ही माहात्म्य है, जो अन्तरंग शत्रुओं का नाश करनेवाला है। वैराग्य के प्रभाव से पंचेन्द्रियरूपी चोरों को मारने के लिए स्वर्ग के भोग, तीन लोक की सम्पदायें त्याग दी जाती हैं, क्योंकि जिसके हृदय में पूर्ण वैराग्य का स्रोत बहता हो, वही चक्रवर्ती की विभूति को क्षण-भर में त्याग सकता है। दरिद्र मनुष्य अपनी कच्ची झोपड़ी को भी छोड़ने में समर्थ नहीं है। कुछ मनुष्य यह भी कहते सुने गये कि यह बात सत्य है कि वैराग्य के बिना मन पवित्र नहीं हो सकता। इस तरह की बातचीत करते हुए बहुत-से नगर-निवासी इस कौतुक को देखने के लिए वन में जा पहुँचे। किन्तु भगवान के दर्शन होते ही उनका मस्तक स्वयं झुक गया। इस प्रकार वे त्रिलोकीनाथ नगर के बाहर जा पहुँचे।
जब माता ने भगवान के वन-गमन का संवाद सुना, तो पुत्र-वियोग में वे मूच्र्छित होकर कोमल बेल के समान मुरझा गईं। तत्पश्चात् इस शोक को क्रमशः सहन करती हुई अनेक पुरजनों एवं बंधुओं के साथ उनके पीछे-पीछे चली गईं। जाती हुई माता विलाप करती थींµ ‘हे पुत्र! तू तो मुक्ति से प्रेम लगा कर तपस्या करने चला, पर मुझे तेरे बिना कैसे चैन मिलेगा? किस तरह जीवन व्यतीत करूँगी? इस छोटी-सी अवस्था में तू तपस्या के महान उपसर्गों को किस प्रकार सहन करेगा? हे पुत्र! शीत-काल की कँपकँपाती पवन में जब तू दिगम्बर भेष में वन में विचरेगा, तब कैसे उस शीत को सहन करेगा? ग्रीष्म-काल की ज्वालाओं से समस्त वन जल जाता है, उस ज्वाला को कैसे सहेगा? श्रावण-भादों की काली घटाओं को देखकर अच्छे-अच्छे साहसियों के भी छक्के छूट जाते हैंµ‘हे बेटा! इन सब कष्टों को क्या तू सहन कर सकेगा? बस, ज्यों-ज्यों मेरा हृदय इन सब बातों को विचारता है, त्यों-त्यों मुझे अत्यधिक कष्ट होता है। हे पुत्र! अति दुर्निवार इन्द्रिय-समूहों को, त्रैलोक्य-विजयी कामदेव को एवं कषायरूपी महा शत्रुओं को धैर्यपूर्वक तू अपने वश में कैसे कर सकेगा? हे बेटा! तू बालक है तथा अकेला है; फिर इस भयंकर वन की गुफाओं में किस प्रकार रह सकेगा? क्योंकि उन गुफाओं में नाना प्रकार के हिंसक जंगली जीव रहा करते हैं।’
इस तरह जिन-माता अत्यन्त करुण स्वर में विलाप करती हुई मार्ग में अति कष्ट से पैरों को बढ़ाती हुई चली जा रही थीं कि इतने में उनके पास प्रमुख-प्रमुख देव आये। उन्होंने सान्त्वना देते हुए कहाµ ‘हे महादेवी! क्या आप इन्हें नहीं पहिचानतीं? ये आपके पुत्र संसार के स्वामी एवं अनुपम शक्तिशाली जगद्गुरु हैं। आत्मवेशी संसाररूपी समुद्र में अपने-आपको विलीन कर लेने के पहिले ही ये अपना उद्धार तो कर ही लेंगे, साथ ही अन्य कितने ही भव्य जीवों का भी उद्धार कर देंगेµयह ध्रुव सत्य है। जिस तरह कि भयानक सिंह भी मजबूत रस्सी से जकड़े जाने पर सहज ही में वशवर्ती हो जाता है, उसी तरह आपके ये महान पुत्र भी मोहादि पराक्रमी शत्रुओं को तपरूपी रस्सियों से बांधकर उन्हें अपने वश में कर लेंगे। जिनके लिए संसाररूपी समुद्र का दूसरा किनारा पा लेना कतई दुर्लभ नहीं है, ऐसे सामथ्र्यशाली आपके ये पुत्र भला दीनतापूर्वक कल्याणहीन घर में कैसे रह सकेंगे? इनके ज्ञानरूपी तीन नेत्र हैं। संसार को इन्होंने सम्यक्रूपेण जान लिया है। फिर भला, वैराग्य उत्पन्न हो जाने पर कोई अन्धकूप में क्यों गिरेगा? इसलिये हे महादेवी! आप इस पापरूपी शोक को त्याग दो। त्रैलोक्य को अनित्य समझकर अपने घर जाओ एवं वहीं पर धर्म-साधना में अपने मन को लगाओ। अपनी प्रिय एवं इच्छित वस्तु के वियोग-काल में ज्ञानहीन पुरुष ही शोक किया करते हैं। जो ज्ञानी एवं बुद्धिमान होते हैं, वे सदैव संसार से डरा करते हैं एवं कल्याणकारी धर्म की ही उपासना किया करते हैं।’ महत्तर देव की इन बातों को सुनकर जिन-माता कुछ शान्त हो गयीं। उनके हृदय में विवेकरूपी प्रकाशमयी किरणों का प्रादुर्भाव हुआ एवं हृदय का शोकान्धकार दूर हो गया। वे अपने विशाल हृदय में पवित्र धर्म को धारण कर अपने कुटुम्बियों एवं भृत्यजनों को साथ लेकर राजमहल को वापस लौट गयीं।
इसके बाद जिनेन्द्र महावीर प्रभु पाश्र्ववर्ती देवों के साथ मानव समाज का मंगल-गान आरम्भ करने के पूर्व ज्ञातृषंडवन नाम के विशाल वन में संयम धारण करने के लिए जा पहुँचे। वह वन अत्यन्त रमणीक था। वहाँ फल-पुष्पों से युक्त शीतल छायावाले सुन्दर-सुन्दर वृक्ष थे, जो अध्ययन एवं ध्यान के लिए नितान्त उपयुक्त थे। महावीर स्वामी अपनी पालकी से उतर कर ‘चन्द्रकान्तमयी’ एक स्वच्छ शिला पर बैठ गये। उस सुन्दर शिला की शोभा विचित्र थी। महावीर स्वामी के आने के पहिले ही देवों ने आकर उस शिला को सुरम्य बना दिया था। वह शिला गोलाकार थी। उस शिला पर विशाल वृक्षों की शीतल एवं घनी छाया पड़ रही थी। चन्द्रकिरणों से भीगी सुरभित जल की बूदें उस शिला पर छिड़की हुई थीं। बहुमूल्य रत्नों के चूर्ण द्वारा स्वयं इन्द्राणी के हाथ से उस शिला पर साथिये बनाये हुए थे। ऊपर वस्त्र का मण्डप बना हुआ था। उसमें ध्वजा एवं रंग-बिरंगी सुन्दर मालाएँ टँगी हुई थीं। चारों ओर धूप का सुगन्धित धुँआ फैल रहा था एवं पास में अनेक मंगल द्रव्य सजाये हुए थे।
महावीर स्वामी उस सुन्दर स्वच्छ शिला पर उत्तराभिमुख होकर बैठ गये एवं मनुष्यों का कोलाहल शांत हो जाने पर देह इत्यादि की इच्छा से विरक्त एवं मुक्ति-साधन में तत्पर हो कर शत्रु-मित्रादि के प्रति उत्तम समान भाव का चिंतवन करने लगे। सर्वप्रथम उन्होंने पल्यंकासन लगा कर मोह-बन्धन में फँसानेवाले केशों का लोंच किया (केश उखाड़ डाले)। उन्होंने क्षेत्र इत्यादि चेतन एवं अचेतन रूप बाह्य दस परिग्रहों का, मिथ्यात्व इत्यादि चैदह अन्तरंग परिग्रहों का तथा वस्त्र, अलंकार एवं माला इत्यादि वस्तुओं का परित्याग कर दिया तथा मनसा-वाचा-कर्मणा पवित्र होकर शरीरादि में निस्पृहतापूर्वक आत्म-सुख की प्राप्ति में लग गये। बाद में जिनेश्वर महावीर स्वामी सम्पूर्ण पाप-क्रियाओं से निर्मुक्त होकर अट्ठाईस मूल-गुणों के पालन करने में तत्पर हो गये। आतापनादि योग से उत्पन्न उत्तर गुणों को एवं महाव्रत, समिति तथा गुप्ति आदि को उन्होंने धारण किया। वे सबके प्रति समता भाव को धारण करने लगे तथा सम्पूर्ण दोषों से हीन एवं सर्वश्रेष्ठ सामायिक संयम को उन्होंने स्वीकार किया। इस प्रकार उन्होंने मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी तिथि के सायंकाल, हस्त-उत्तरा नक्षत्र के मध्यवाले शुभ समय में दुष्प्राप्य जिन-दीक्षा को ग्रहण किया। यह जिन-दीक्षा मुक्तिरूपी कामिनी की सहचरी (सखी) के समान थी।
महावीर स्वामी के मस्तक में चिरकाल रहने के कारण परम पवित्र उनके केशों को स्वयं इन्द्र ने रत्न-जड़ित मंजूषा (पिटारी) में अपने हाथों से संवार कर रक्खा। फिर इन्द्र ने केशों की पूजा की, उन्हें उत्तम बहुमूल्य वस्त्रों से ढांका एवं समारोहपूर्वक क्षीर-सागर के नैसर्गिक शुद्ध जल में डाल दिया। जब केश जैसी हीन वस्तु का भी, जिनेश्वर के संसर्ग में रहने के कारण, इतना अधिक सम्मान किया जा सकता है; तब जो पुरुष साक्षात् जिनेश्वर भगवान की निरन्तर सेवा-पूजा में लगे रहते हैं, उन्हें संसार में कौन-सी ऐसी अलभ्य वस्तु है, जो नहीं मिल सकती? उनकी सेवा से सभी कुछ प्राप्त हो जाता है। इस संसार में जिन भगवान के चरण कमलों के आश्रय में आ जाने से जिस प्रकार यक्षों को सम्मान प्राप्त हो जाता है, उसी प्रकार अरहन्त प्रभु का जो लोग सहारा लेते हैं, वे चाहे नीच पुरुष ही क्यों न हों, उनकी पूजा होती है एवं उन्हें अत्यन्त आदर की दृष्टि से देखा जाता है। इस प्रकार महावीर स्वामी ने दिगम्बर रूप को धारण किया। जब वे दिगम्बर हो गये, तब उनका शरीर तपाये हुए स्वर्ण जैसा प्रकाशमान एवं तेजस्वी दीखने लगा मानो वह कान्ति एवं दीप्ति का स्वाभाविक तेजोमय समूह ही हो। इसके बाद परम आल्हादित इन्द्र स्वयं परमेष्ठी प्रभु (महावीर) का गुण-गौरव-गान (स्तुति) करने लगे
हे देव! इस संसार में सर्वश्रेष्ठ परमात्मा आप हो। इस चराचर जगत् के स्वामी आप हो। आप जगद्गुरु हो, गुण-सागर हो, शत्रु-विजेता हो एवं अत्यन्त निर्मल स्वयं हो। हे प्रभो! जब आपके असंख्य एवं अनन्त गुणों का वर्णन स्वयं गणधरादि देव नहीं कर सकते, तब मैं मन्दमति कहाँ तक आपके महान गुण एवं ऐश्वर्यों का वर्णन कर सकूँगा? ऐसा सोच कर यद्यपि मेरी बुद्धि जड़ हो जाती है तथापि आपके प्रति हमारी अचल भक्ति ही आपकी स्तुति करने के लिए मुझे निरन्तर प्रोत्साहित कर रही है। हे योगीन्द्र! जिस प्रकार कि मेघ का आवरण हट जाने पर सूर्य-किरणों की स्वाभाविक छटा बिखर पड़ती है, उसी तरह आज आपके बाह्य एवं आभ्यन्तर मलों के एकदम नष्ट हो जाने के कारण, आपके निर्मल गुण समूह प्रकाशमान हो रहे हैं।ं हे स्वामिन्! यद्यपि आपने इन्द्रिय-विषयजन्य चंचल सुखों को क्षणस्थायी जान कर त्याग दिया है तथापि आपकी इच्छा अत्यन्त उत्कृष्ट आत्म-सुख की प्राप्ति के लिए लालायित है। अतः आपको ‘निस्पृह’ (इच्छाहीन) कैसे कहा जा सकता है? यद्यपि आपने स्त्री के शरीर को नितान्त हेय, घृणित एवं अस्पृश्य समझकर उस पर से अपना अनुराग (प्रेम) हटा लिया है तथापि मुक्ति-रूपी स्त्री में तो आपका अनन्य अनुराग बना हुआ है फिर आपको हम ‘वीतराग’ (प्रीति-रहित) भी कैसे कह सकते हैं? जिन्हें लोग ‘रत्न’ कहा करते हैं, यद्यपि उन पत्थरों को आपने त्याग दिया है तथापि सम्यक्दर्शन आदि रत्नत्रय को आपने धारण कर लिया है। फिर आपको त्यागी भी कैसे कहा जाये? यद्यपि आपने क्षणभंगुर राज्य-सत्ता को पाप का आश्रय जान कर छोड़ दिया है तथापि नित्य, अविनाशी एवं अनुपमेय त्रैलोक्य के विशाल साम्राज्य पर एकाधिपत्य तो आप ही स्थापित करने जा रहे हैं। फिर भला आप निस्पृह कैसे रहे? (यह निन्दा-स्तुति है।) हे जगत् के स्वामी! आपने इस संसार की चंचला लक्ष्मी का परित्याग करके लोकोत्तर सम्पत्ति (मोक्ष-लक्ष्मी) को प्राप्त करने की इच्छा की है, फिर आपको इच्छा-रहित कैसे समझा जाय? हे देव! यद्यपि आपने अपने ब्रह्मचर्यरूपी तीक्ष्ण बाण से अपने शत्रु कामदेव को परास्त कर दिया है तथापि कामदेव की स्त्री रति को आपने विधवा भी बना दिया है। फिर आप कृपालु कहाँ रहे? हे नाथ! आपने अपने ध्यान-रूपी अस्त्र से मोह-नृपति के साथ-ही-साथ अन्य सब कर्म-रूपी शत्रुओं का नाश कर डाला है। फिर आपके हृदय में दयालुता कहाँ रही? हे प्रभो! यद्यपि आपने अपने गिने-गिनाये अल्पसंख्यक बन्धुओं का परित्याग कर दिया है तथापि अब तो स्वयं अपने गुणों के प्रभाव से सम्पूर्ण जगत् को ही अपना बन्धु बनाने जा रहे हैं, फिर आपको कैसे कोई बान्धवहीन कह सकता है? हे चतुर शिरोमणि! आपने सांसारिक भोगों को सर्प की काँचुली के समान त्याग कर शुक्लध्यानरूपी अमृत को पी लिया है फिर आपका ‘प्रोषधव्रत’ कैसे पूर्ण होगा।
हे स्वामिन्! आपकी इस दीक्षा को बुद्धिमानों ने आदर की दृष्टि से देखा है एवं इसने संसार के दाह को एकदम शान्त कर दिया है। आप की यह परम पवित्र महादीक्षा पुण्य-धारा के समान सदैव हम भव्य-जीवों की रक्षा करे। हे देव! मन-वचन-काय की विशुद्धतापूर्वक सम्पूर्ण जगत को पवित्र कर देने वाली दीक्षा को आपने ग्रहण किया है। इसी महादीक्षा के बल पर मोक्ष चाहने वाले आपको प्रणाम है। आप शरीर आदि के सुख से मुख मोड़ चुके हैं, मोक्ष-मार्ग में निरन्तर अग्रसर हो रहे हैं, तप-रूपी लक्ष्मी से प्रीति करनेवाले हैं, अन्तरंग-बहिरंग परिग्रहों को त्यागनेवाले हैं। आपको प्रणाम है।हे ईश! सम्यक्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप तीन बहुमूल्य आभूषणों से अलंकृत, किन्तु अन्य पार्थिव आभूषणों से हीन आपको प्रणाम है। आपने सम्पूर्ण वस्त्रों का परित्याग कर दिशा-रूपी शून्य वस्त्रों को धारण किया है, ईश्वरत्व प्राप्ति की साधना में सोत्साह प्रवृत्त हैं, अतः आपको प्रणाम है। हे जिनेश्वर! आप सकल परिग्रहों से हीन एवं गुणरूपी सम्पत्तियों से युक्त हैं, आपको मुक्ति अत्यन्त प्यारी है, इसलिये आपको प्रणाम है। हे नाथ! आप इन्द्रियातीत अक्षय सुख में चित्त को लगानेवाले विरक्त पुरुष हैं, उपवास करके शुक्लध्यानरूपी अमृत के भोक्ता हैं, आपको प्रणाम है। हे देव! आप दीक्षित होकर ज्ञान-रूपी चार नेत्रों के धारक हैं बाल- ब्रह्मचारी हैं, तीर्थेश हैं एवं स्वयंबुद्ध हैं, आपको प्रणाम है। आप कर्मरूपी शत्रुओं की सन्तति के नाशकत्र्ता हैं, गुणसागर हैं एवं उत्तम क्षमा इत्यादि शुभ-लक्षणों से युक्त हैं, आपको प्रणाम है। हे देव! आप इस संसार की सम्पूर्ण आशाओं को पूर्ण करनेवाले हैं, परन्तु हम जो आपकी स्तुति कर रहे हैं, वह संसार की उत्तम सम्पदाओं को पाने के लिए नहीं है, किन्तु जिस शक्ति के प्रभाव से बाल्यावस्था में ही आपने तप-दीक्षा ग्रहण की है, वही अतुलनीय शक्ति हमें भी प्राप्त हो। इस तरह देवों के इन्द्र ने भगवान महावीर की पूजा-स्तुति की एवं फिर करबद्ध प्रणाम करके अपार पुण्य का उपार्जन किया।इसके बाद महावीर स्वामी ने निश्चेष्ट होकर अपने सम्पूर्ण अंग-प्रत्यंगांे का अवरोध किया एवं कर्म-रूपी शत्रुओं की नाशक योग-क्रिया का अवलम्बन लिया। उस समय वे चेष्टाशून्य, सुन्दर पत्थर की मूर्ति के समान जान पड़ते थे। उस परमोत्तम ध्यान के प्रभाव से उन्हें चतुर्थ मनःपर्यय ज्ञान प्रादुर्भूत हुआ, जो कि महावीर प्रभु के लिए केवलज्ञान प्राप्त होने का निर्देशन था। उन अनुपमेय महान गुणशाली वीरनाथ की मैं स्तुति करता हूँ एवं उन्हें करबद्ध प्रणाम करता हूँ।