उसी समय सौधर्म इन्द्र का आदेश पाकर पद्म आदि सरोवरों में निवास करने वाली श्री, आदि छः देवियाँ राजमहल में आ गयीं। उन्होंने तीर्थंकर के गर्भाधान के लिए स्वर्ग से लाई हुई पवित्र वस्तुओं से माता के गर्भ का शोधन किया, जिससे उन्हें पुण्य की प्राप्ति हो पुनः वे अपने-अपने शुभ गुणों को माता में स्थापित कर उनकी सेवा में संलग्न हो गयीं।श्री देवी ने शोभा, देवी ने लज्जा, धृति देवी ने धैर्य, कीर्ति देवी ने स्तुति, बुद्धि देवी ने श्रेष्ठ बुद्धि तथा लक्ष्मी देवी ने भाग्य ऐसे इन गुणों की वृद्धि की। वे जिनमाता बड़ी गुणवती हुईं। यों तो महारानी पूर्व में ही स्वभाव से पवित्र थीं, पर जब देवियों ने शुद्ध वस्तुओं से उन्हें शुद्ध किया, तब तो वे मानों स्फटिक मणि से ही बनाई गई हों ऐसी शोभायमान प्रतीत होने लगीं। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की शुद्ध तिथि षष्ठी को आषाढ़ नक्षत्र में एवं शुभ लग्न में वह देव (अच्युतेन्द्र) स्वर्ग से चय कर माता के शुद्ध गर्भ में आया। महावीर प्रभु के गर्भ में आते ही स्वर्ग के कल्पवासी देवों के विमानों में घण्टे की ध्वनि होने लगी एवं इन्द्र का आसन काँप उठा।
ज्योतिषी देवों के यहाँ स्वयं सिंहनाद होने लगा। भवनवासी देवों के यहाँ शंख की प्रचण्ड ध्वनि हुई। साथ ही व्यन्तर देवों के महलों में भेरी की विशेष ध्वनि हुई। केवल यही नहीं अन्य भी अनेक आश्चर्यजनक घटनायें घटीं। उक्त आश्चर्यजनक घटनाओं को घटते देखकर चारों निकायों के देवों को यह ज्ञात हो गया कि महावीर प्रभु का गर्भावतरण हो गया है। तत्पश्चात् वे देवगण भगवान् का गर्भ-कल्याणक उत्सव मनाने के उद्देश्य से नगर में पधारे। उस समय देवों के समूह को देखते ही बनता था। वे सर्वोत्तम सम्पदाओं से सुशोभित थे, अपनी-अपनी सवारियों पर आरूढ़ थे, उत्तम धर्म का पालन करने वाले उद्यमी थे। वे अपने अंग के आभूषणों एवं तेज से दशों दिशाओं को प्रकाशित करने वाले थे। उन्होंने अपने ध्वजा-छत्र-विमानादिकों से आकाश को मानो ढँक दिया था। वे देव अपनी देवियों के साथ ‘जय-जय’ शब्द कर रहे थे।
उस समय नगर का वातावरण देखने योग्य ही था। विमानों, अप्सराओं एवं देवों की सेनाओं से घिरा हुआ वह नगर स्वर्ग जैसा सर्वोत्तम प्रतीत होने लगा। देवों के साथ इन्द्र ने भगवान के माता-पिता को सिंहासन पर बिठाकर सोने के कलशों से स्नान कराया तथा उन्हें दिव्य आभूषण-वस्त्र पहिनाये। माता के गर्भस्थ शिशु (भगवान) की सभी ने तीन प्रदक्षिणा देकर उन्हें प्रणाम किया अर्थात् माता की तीन प्रदक्षिणा देकर उन्हें प्रणाम किया।
इस प्रकार सौधर्म इन्द्र भगवान का गर्भकल्याणक सम्पन्न कर जिनमाता की सेवा में उपयुक्त देवियों को नियुक्त कर देवों के साथ पुण्य उपार्जन कर बड़ी प्रसन्नता के साथ पुनः स्वर्ग को वापस चले गये।स्वर्ग से आई हुई देवियों में से कोई तो जिन-माता के समक्ष मंगल द्रव्य रखती थीं, कई देवियों ने महादेवी की शय्या को सुसज्जित करने का भार अपने ऊपर लिया, किसी ने दिव्य आभूषण पहिनाने का भार लिया तथा किसी नेे माला तथा रत्नों के गहने देने का। कई देवियाँ माता की अंग-रक्षा के लिए खुले खड्गों से सज्जित होकर पहरा देती थीं एवं कई उनके लिए भोग्य सामग्रियों को एकत्रित करने में संलग्न थीं। कई एक देवियाँ पुष्प-रज से आच्छादित राज्य-प्रांगण की सफाई में लगी थीं एवं चन्दन-जल का छिड़काव करती जाती थीं।उक्त देवियों ने रत्नों के चूर्ण से स्वस्तिक आदि की रचना की एवं महल को कल्पवृक्ष के पुष्पों से सजाया। किसी ने महलों के ऊँचे शिखरों पर रत्नों के दीप जलाये, जो अन्धकार को विनष्ट करनेवाले थे। वस्त्र पहिनाना, आसन बिछाना आदि समस्त कार्य देवियाँ ही करती थीं। महादेवी की वन-क्रीड़ा के समय मधुर गीत, सुन्दर नृत्य एवं धार्मिक कथायें सुनाकर वे माता को सुख पहुँचाया करती थीं। इस प्रकार जिनदेव की माता महादेवी त्रिशला की सेवा देवियों द्वारा होती रही एवं उनकी शोभा अनुपम थी।
जब नवम मास निकट आया, तो गर्भवती महादेवी की बुद्धि अति प्रखर होती गई। उन्हें प्रसन्न रखने के उद्देश्य से देवियाँ मनोहर प्रहसन किया करतीं एवं तरह-तरह की कवितायें सुनाया करती थीं। देवियाँ कुछ गूढ़ अर्थपूर्ण पहेलियाँ महादेवी से पूछा करती थीं एवं महादेवी उनका समुचित उत्तर दे दिया करती थीं। उदाहरण के रूप में निम्न पहेली एवं उसका उत्तर मनन करने योग्य है-
विरक्ता नित्यकामिन्या, कामुकोऽकामुको महान्।
सस्पृहो निःस्पृहो लोके, परात्मान्यश्च यः स कः।।1।।
अर्थात् जो वैरागी होने पर भी सर्वदा कामिनी की इच्छा रखता है एवं निस्पृही होने पर भी इच्छा किया करता है, वह विलक्षण पुरुष इस संसार में कौन है? यह तो हुई पहेली। महादेवी ने पहेली का श्लोक में ही उत्तर दिया। महादेवी का उत्तर थादृ ‘परमात्मा’। कारण, ‘परमात्मा’ का एक अर्थ तो विलक्षण पुरुष होता है एवं दूसरा अर्थ परमात्मा भी होता है। परमात्मा नित्य-कामिनी अर्थात् अविनाशी मोक्षरूपी स्त्री में अनुरागी है एवं उसी की इच्छा रखनेवाला होता है। दूसरी एक पहेली भी सुनिये
दृश्योऽदृश्योऽस्ति चिद्भूषः, प्रकृत्या निर्मलोऽव्ययः।
हन्ता देहविधेर्देवो, नाऽयं को वर्ततेऽद्य सः ।।2।।
अर्थात् जो अदृश्य है, फिर भी देखने योग्य है; स्वभाव से निर्मल होने पर भी देह की रचना का नाशक है, पर महादेव नहीं है, ऐसा वह कौन है? इस श्लोक का महादेवी ने ‘देवोना’ शब्द से उत्तर दिया। ‘देवोना’ का अर्थ हैदृ देवरूपी मनुष्य श्री अर्हन्त देव।इस प्रकार उन देवियों ने प्रश्नोत्तर के रूप में महादेवी से अनेक पहेलियाँ पूछीं। वे भिन्न प्रकार की हैंदृ ‘हे सुन्दरी! असंख्यात मनुष्य एवं देवों द्वारा पूज्य तीनों जगत् का गुरु तेरा पुत्र अनेक उत्तम गुणों से युक्त तथा विजयी होे। जिसने दूसरी स्त्रियों से प्रेम करना त्याग दिया है, पर फिर भी अविनाशी मोक्ष-सुख में अनुरागी है, ऐसा गुणों का समुद्र तेरा पुत्र हमारी रक्षा करे। हे जगत् का कल्याण करनेवाली, तीन लोकों के स्वामी को गर्भ में धारण करनेवाली! हरिहरादि के मन की रक्षा कर।जगत् केे कल्याण के लिए अपने गर्भ में तीर्थंकर को धारण करनेवाली, हे महादेवी! धर्म-तीर्थ स्थापित करनेवाले की उत्पत्ति में देव- विद्याधर-भूमिगोचरी जीवों का तीर्थ-स्थान बन। (इसमें ‘अठ’ क्रिया गुप्त है)
देवी का प्रश्न– हे देवी महारानी! इहलोक एवं परलोक में कल्याण करने वाला कौन है?
माता का उत्तर-जो धर्म-तीर्थ के प्रवर्तक हैं, वे ही श्री अर्हन्त देव तीनों जगत् का कल्याण करने वाले हैं।
देवी का प्रश्न– गुरुओं में सबसे महान कौन है?
माता का उत्तर– जो तीन जगत् का गुरु एवं सब अतिशयों से तथा दिव्य अनन्त गुणों से सुशोभित है, ऐसे श्री जिनेन्द्र देव ही महान् गुरु हैं।
देवी का प्रश्न– इस जगत् में किसके वचन श्रेष्ठ एवं प्रामाणिक हैं?
माता का उत्तर– जो सबको जानने वाले, दुनिया का हित करने वाले, अठारह दोषरहित एवं वीतरागी हंै, ऐसे श्री अर्हन्त भगवान के वचन ही श्रेष्ठ एवं मानने योग्य हैं। इसके सिवा दूसरे मिथ्यामतियों के नहीं।
देवी का प्रश्न– जन्म-मरणरूपी विष को दूर करनेवाला अमृत के समान क्या पीना चाहिये?
माता का उत्तर-श्री जिनेन्द्र के मुख-कमल से निकला हुआ ‘ज्ञानामृत’ पीना चाहिये। दूसरे मिथ्या-ज्ञानियों के विषरूपी वचन नहीं मानने चाहिये।
देवी का प्रश्न— इहलोक में बुद्धिमानों को किसका ध्यान करना चाहिये?
माता का उत्तर– पंच-परमेष्ठी का, जैन शास्त्र का एवं आत्म-तत्त्व का ध्यान करना चाहिये, दूसरा आर्त-रौद्र रूप खोटा ध्यान कभी नहीं करना चाहिये।
देवी का प्रश्न– शीघ्र कौन-सा काम करना चाहिए?
माता का उत्तर– जिससे संसार के भोगों का नाश हो, ऐसे अनन्त ज्ञान-चारित्र का पालन करना चाहिए, मिथ्यात्वादिकों का नहीं।
देवी का प्रश्न– इस संसार में सज्जनों के साथ में जानेवाला कौन है?
माता का उत्तर– दयामय धर्म ही सहायता करनेवाला बन्धु है, जो सब दुःखों से रक्षा करनेवाला है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई सहगामी नहीं है।
देवी का प्रश्न– धर्म के क्या-क्या लक्षण हैं एवं कार्य क्या हैं?
माता का उत्तर– बारह तप, रत्नत्रय, महाव्रत, अणुव्रत, शील एवं उत्तम क्षमा आदि दश लक्षण धर्मदृ ये सब धर्म के कार्य एवं लक्षण हैं।
देवी का प्रश्न– इहलोक में धर्म का फल क्या है?
माता का उत्तर-तीन लोक के स्वामियों की इन्द्र-धरणेन्द्र-चक्रवर्ती पद-रूप सम्पदायें, श्री जिनेन्द्र का अनन्त सुख, ये सब धर्म के ही उत्तम फल हैं।
देवी का प्रश्न– धर्मात्माओं के चिन्ह क्या हैं?
माता का उत्तर– शान्त स्वभाव, अभिमान का न होना एवं रात-दिन शुद्ध आचरणों का पालन-ये ही धर्मात्माओं की पहिचान है।
देवी का प्रश्न– पाप के चिन्ह क्या-क्या हैं?
माता का उत्तर– मिथ्यात्वादि, क्रोधादि कषाय, खोटी संगति एवं छः तरह के अनायतनµये पाप के चिन्ह हैं।
देवी का प्रश्न- पाप का फल क्या है?
माता का उत्तर– जो अपने को अप्रिय है, दुःख का कारण एवं दुर्गति करानेवाला, अन्य रोग-क्लेशादि देने वाला हैदृ ऐसे सभी निन्दनीय कार्य पाप के फल हैं।
देवी का प्रश्न– पापी जीवों की पहिचान क्या है?
माता का उत्तर– क्रोध आदि कषायों का बहुत होना, दूसरों की निन्दा, अपनी प्रशंसा एवं रौद्रादि खोटे ध्यान का होनादृ ये सब पापियों के चिन्ह हैं।
देवी का प्रश्न-असली लोभी कौन है?
माता का उत्तर– बुद्धिमान, मोक्ष का चाहनेवाला भव्य जीव निर्मल आचरण से तथा कठिन तप से केवल धर्म का सेवन करनेवाला ही असली लोभी है।
देवी का प्रश्न– इहलोक में विचारशील कौन है?
माता का उत्तर– जो मन में निर्दोष देव-शास्त्र-गुरु का एवं उत्तम धर्म का विचार करता है, दूसरे का नहीं।
देवी का प्रश्न– धर्मात्मा कौन है?
माता का उत्तर– जो श्रेष्ठ उत्तम क्षमा आदि दशलक्षण युक्त धर्म का पालन करता है। श्री जिनेन्द्र देव की आज्ञा का पालन करनेवाला ही बुद्धिमान, ज्ञानी एवं व्रती हैदृ वही धर्मात्मा है, दूसरा कोई नहीं।
देवी का प्रश्न– परलोक जाते समय मार्ग का भोजन क्या है?
माता का उत्तर– दान, पूजा, उपवास, व्रत, शील एवं संयमादि से उपार्जन किया गया जो निर्मल पुण्य है, वही परलोक के मार्ग का उत्तम भोजन है।
देवी का प्रश्न– इहलोक में किसका जन्म सफल है?
माता का उत्तर– जिसने मोक्ष-लक्ष्मी के सुख के प्रदाता उत्तम भेद-विज्ञान को पा लिया, उसी का जन्म सफल है, दूसरे का नहीं।
देवी का प्रश्न– संसार में सुखी कौन है?
माता का उत्तर– जो सब परिग्रह की उपाधियों से रहित एवं ध्यानरूपी अमृत का पान करनेवाला वन में रहता है अर्थात् योगी है, वही सुखी है, अन्य कोई नहीं।
देवी का प्रश्न– इस संसार में चिन्ता किस वस्तु की करनी चाहिए?
माता का उत्तर– कर्मरूपी शत्रुओं के नाश करने की एवं मोक्ष-लक्ष्मी पाने की चिन्ता करनी चाहिये, दूसरे इन्द्रियादिक विषय-सुखों की नहीं।
देवी का प्रश्न– महान उद्योग किस कार्य में करना चाहिये?
माता का उत्तर-मोक्ष देनेवाले रत्नत्रय, तप, शुभ योग, सुज्ञानादिकों के पालने में महान यत्न करना चाहिये, धन एकत्रित करने में नहीं। कारण, धन तो धर्म से प्राप्त होगा ही।
देवी का प्रश्न- मनुष्यों का परम मित्र कौन है?
माता का उत्तर– जो तप-दान-व्रतादिरूप धर्म को आग्रहपूर्वक समझा कर पालन करावे एवं पाप कर्मों को छुड़ावे।
देवी का प्रश्न– इस संसार में जीवों का शत्रु कौन है?
माता का उत्तर– जो हित करनेवाले तप-दीक्षा-व्रतादिकों का नहीं पालन करने दे, वह दुर्बुद्धि अपना एवं दूसरे कादृ दोनों का शत्रु है।
देवी का प्रश्न– प्रशंसा करने योग्य क्या है?
माता का उत्तर– थोड़ा धन होने पर भी सुपात्र को दान देना, निर्बल शरीर होने पर भी निष्पाप तप करना, यही प्रशंसनीय है।
देवी का प्रश्न– हे महादेवी! आप के समान महारानी कौन है?
माता का उत्तर– जो धर्म के प्रवर्तक, जगत् के गुरु, ऐसे तीर्थंकर देवाधिदेव को उत्पन्न करे, वही मेरे समान है, दूसरी कोई नहीं।
देवी का प्रश्न– पण्डिताई क्या है?
माता का उत्तर– शास्त्रों को जानकर खोटा आचरण, खोटा अभिमान जरा भी नहीं करना एवं अन्य पाप की क्रियायें भी नहीं करना, यही पण्डिताई है।
देवी का प्रश्न– मूर्खता किसे कहते हैं?
माता का उत्तर-ज्ञान के हित का कारण, निर्दोष तप, धर्म की क्रिया को जानकर आचरण नहीं करना।
देवी का प्रश्न– बड़े भारी चोर कौन हैं?
माता का उत्तर– जो मनुष्यों के धर्मरत्न को चुरानेवाले, पाप के कर्ता एवं अनर्थ करनेवाले हैं। ऐसे पाँच इन्द्रियरूपी चोर हैं।
देवी का प्रश्न– इस संसार में शूरवीर कौन हैं?
माता का उत्तर– जो धैर्यरूपी खड्ग से परिषहरूपी महायोद्धाओं को, कषायरूपी शत्रुओं को तथा काम-मोह आदि शत्रुओं को जीतनेवाले हों।
देवी का प्रश्न– देव कौन हैं?
माता का उत्तर-जो सबको जाननेवाल, क्षुधादि अठारह दोषों से रहित, अनन्त गुणों के समुद्र, धर्म के प्रवर्तक हों, ऐसे अर्हन्त प्रभु ही देव हैं।
देवी का प्रश्न- महान गुरु कौन हैं?
माता का उत्तर– जो इस संसार में बाह्य-आभ्यन्तर दोनों प्रकार के परिग्रहों से रहित हों। जगत् के भव्य जीवों के हित- साधन में उद्यत हों एवं स्वयं भी मोक्ष के लिए इच्छुक हों, वही महान गुरु हैं। दूसरा मिथ्यामती धर्मगुरु नहीं हो सकता।
इस प्रकार देवियों द्वारा किये गए प्रश्नों का उत्तर माता ने गर्भस्थ तीर्थंकर शिशु के प्रभाव से दिया। प्रथम तो महारानी की बुद्धि स्वभाव से ही निर्मल थी पुनः अपने उदर में तीन ज्ञान के धारक प्रकाशमान तीर्थंकर देव को धारण करने से वे अत्यधिक पवित्र हो गई थीं। महारानी के गर्भ में स्थित तीर्थंकर बालक को कोई कष्ट नहीं हुआ, क्योंकि सीप में रहनेवाली जल-बिन्दु में कभी विकार उत्पन्न नहीं हो सकता है। उस महादेवी के उदर की त्रिवली भी भंग नहीं हुई। उदर पूर्व जैसा ही रहा, पर गर्भ की क्रमशः वृद्धि होती गईदृ यह सब प्रभु का ही प्रभाव था।गर्भ में स्थित प्रभु के प्रभाव से महारानी की मुखाकृति बड़ी ही शोभायमान हो गई। उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता था कि मानो वे असंख्य रत्नों को धारण करनेवाली पृथ्वी ही हों। अप्सराओं के साथ इन्द्र के द्वारा भेजी गई इन्द्राणी ही जिनकी सेवा कर रही हो, उनकी कान्ति एवं उनके मुख का वर्णन नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार लगातार नौ महीने तक महान उत्सव सम्पन्न होते रहे।