द्रव्य सामान्य होता है, वह एक और अन्वय को अनुसरण करता है अर्थात् व्याप्त करता है। उसमें- अर्थता सामान्य पूर्वापर पर्याय में व्यापक है वह एकनुग-एक का अनुसरण करने वाला है और सदृश परिणाम लक्षण जो तिर्यक् सामान्य है वह अन्वयानुंग-अन्वय का अनुसरण करता है पुन: वह द्रव्य निश्चयात्मक है-निकल गया है पर्यायांतर का संकर जिससे, ऐसा जो निश्चय-पर्याय, वह जिसके स्वरूप हैं वैसा है अर्थात् पर्यायांतर के मिश्रण से रहित पर्याय स्वरूप है।और पुन: अन्य पर्याय को विशेष कहते हैं, वह पर्याय व्यतिरेक और पृथक्त्व का अनुसरण करने वाला है, व्यतिरेक और पृथक्त्व को जो प्राप्त करता है, तादात्म्य रूप से परिणत होता है वह वैसा कहलाता है। उसमें एक द्रव्य में क्रम से होने वाली पर्याय को व्यतिरेक कहते हैं और अर्थांतरगत विसदृश परिणाम पृथक्त्व का अनुसरण करने वाला है।
प्रश्न-अन्य शास्त्रों में निश्चय और व्यवहार नयों को प्रतिपादन किया गया है, उनका क्या आलंबन-विषय है ?
उत्तर-वे निश्चय और व्यवहार मूलनय हैं, वे द्रव्य और पर्याय का आलंबन लेते हैं अर्थात् निश्चयनय द्रव्य को विषय करता है और व्यवहारनय पर्याय को विषय करता है। द्रव्य का आश्रय लेने वाला निश्चयनय द्रव्यार्थिक कहलाता है तथा पर्यायाश्रित व्यवहारनय पर्यायार्थिक कहलाता है ऐसा अर्थ हुआ है। यहाँ कारिका में द्रव्यपर्यायं ऐसा पद है ‘उसमें’ ‘द्रव्यं च पर्यायश्च तयो: समाहार:’ ऐसा समाहार द्वंद्व समास करने पर नपुंसकलिंग और एकवचन हो जाता है। ऐसा व्याकरण शास्त्र का नियम है।
उत्थानिका-अब पहले कहे गये भी नैगम आदि नयों को मंदमति वाले शिष्यों के अनुग्रह के लिए पुन: कहने की इच्छा रखते हुए पहले नैगम और नैगमाभास का निरूपण करते हैं-
अन्वयार्थ-(धर्मयो:) एकत्व-अनेकत्वरूप दो धर्मों को (गुण प्रधान भावेन) गौण तथा प्रधानभाव से (एकधर्मिणि) एक धर्मी में (विवक्षा) कहने की इच्छा (नैगम:) नैगमनय है और (अत्यंतभेदोक्ति:) दोनों धर्मों में अत्यंत भेद का कथन करना (तदाकृति: स्यात्) नैगमाभास होता है।।१८।।
अर्थ-एकत्व अनेकत्व रूप दो धर्मों को गौण, प्रधान भाव से एकधर्मी में कहने की इच्छा नैगमनय है और दोनों धर्मोें में अत्यंंत भेद का कथन करना तदाभास कहलाता है।।१८।।
तात्पर्यवृत्ति-एकत्व और अनेकत्व ऐसे दो धर्मों को गौण और प्रधान भाव से अर्थात् मुख्य और अमुख्य भाव से एक-अभिन्न, धर्मी-द्रव्य में। कहने का जो अभिप्राय है वह नैगमनय है और अत्यंत रूप से भेद का कथन करना, अत्यंत-निरपेक्षरूप से नानात्व का जो कथन है, ऐसा जो नैयायिक आदि जनों का अभिप्राय नैगमाभास कहलाता है, यहाँ वह अर्थ हुआ है।
उत्थानिका-अब संग्रहनय और संग्रहाभास को कहते हैं-
अन्वयार्थ-(सद्भेदात्) सत् सामान्य के अभेद से (समस्तैक्यसंग्रहात्) समस्त को एकरूप से संग्रह करने से (संग्रह: नय:) संग्रह नय होता है और (ब्रह्मवाद: दुर्नय:) ब्रह्माद्वैतवाद दुर्नय-संग्रहाभास (स्यात्) है (तत्स्वरूपानवाप्तित:) क्योंकि वह ब्रह्म के स्वरूप को प्राप्त करने वाला नहीं है।।१९।।
अर्थ-सत्सामान्य के अभेद से समस्त को ऐक्यरूप से संग्रह करने वाला संग्रहनय है और उसके ब्रह्म के स्वरूप को नहीं प्राप्त करने से जो ब्रह्मवाद है वह दुर्नय कहलाता है।।१९।।
तात्पर्यवृत्ति-समस्त-जीव-अजीव विशेष को एकरूप से संग्रह करने वाला-संक्षिप्तरूप से ग्रहण करने से संग्रहनय होता है।
प्रश्न-अनेक को संक्षेप से वैâसे ग्रहण करता है ?
उत्तर-सत् अभेद से अर्थात् सत् सामान्यरूप जो अभेद है उसका आश्रय करके ग्रहण करता है। ‘सत्त्व से भिन्न किंचित् भी वस्तु है’ ऐसा कहना शक्य नहीं है क्योंकि विरोध आता है अर्थात् जिसका अस्तित्व ही नहीं है उसको ‘यह है’ ऐसा वैâसे कह सकते हैं ?
दुर्नय संग्रहाभास है, वह कौन है ? वह ब्रह्मवाद अर्थात् सत्ताद्वैत है। क्यों ? उसके स्वरूप को नहीं प्राप्त करने से अर्थात् उस पर परिकल्पित ब्रह्म का स्वरूप भेद के प्रपंचों से शून्य है और सत्तामात्र है उसकी अप्राप्ति होने से, प्रमाण से प्राप्ति न होने से वह दुर्नय है। वह वास्तव में प्रत्यक्षादि प्रमाण से प्राप्त नहीं किया जाता है क्योंकि वैसी प्रतीति नहीं होती है।
उत्थानिका-अब व्यवहारनय का निरूपण करते हैं-
अन्वयार्थ-(व्यवहारानुकूल्यात्तु) व्यवहार की अनुकूलता से ही (प्रमाणानां) ज्ञानों की (प्रमाणता) प्रमाणता है (अन्यथा न) अन्य प्रकार से नहीं है, (बाध्यमानानां) अन्यथा बाधित होने वाले (ज्ञानानां) ज्ञानों में भी (तत्प्रसंगत:) प्रमाणता का प्रसंग हो जावेगा।।२०।।
अर्थ-व्यवहार की अनुकूलता से प्रमाणों की प्रमाणता होती है अन्यथा नहीं, नहीं तो बाधित होने वाले संशय आदि ज्ञानों में भी प्रमाणता का प्रसंग आ जावेगा अर्थात् व्यवहार में विसंवाद न होने से प्रमाणता और व्यवहार में विसंवाद होने से अप्रमाणता होती है।।२०।।
तात्पर्यवृत्ति-प्रमाणपने से स्वीकृत प्रमाणों की प्रमाणता-अविसंवादकता होती है। वैâसे ? व्यवहार की अनुकूलता से अर्थात् संग्रह के विषय में भेद करने वाला व्यवहार है, उसकी अनुकूलता-अविसंवाद है उससे ही प्रमाणता है अन्यथा उसमें विसंवाद होने से प्रमाणता नहीं हो सकेगी। नहीं तो बाध्यमान-बाधित होने वाले संशय आदि विसंवादी ज्ञानों में भी प्रमाणता का प्रसंग आ जावेगा अर्थात् प्रमाण और अप्रमाण की व्यवस्था का कारण होने से व्यवहारनय कहलाता है अन्यथा वह तदाभास कहलाता है, ऐसा अर्थ है।
उत्थानिका-अब ऋजुसूत्रनय और तदाभास का प्ररूप्ाण करते हैं-
अन्वयार्थ-(प्राधान्यत:) प्रधानता से (भेदं) भेद को (अन्विच्छन्) स्वीकार करते हुए (ऋजुसूत्रनय: मत:) ऋजुसूत्रनय माना गया है और (सर्वथा) सब प्रकार से (एकत्वविक्षेपी) एकत्व का निषेध करने वाला (तु अलौकिक: तदाभास:) तो लोकव्यवहार से विरुद्ध तदाभास होता है।।२१।।
अर्थ-प्रधानता से भेद को स्वीकार करते हुए ऋजुसूत्र नय माना गया है और सर्वथा एकत्वविक्षेपी-द्रव्य का निषेधक तदाभास है, वह अलौकिक है-लोक व्यवहार से विरुद्ध है।।२१।।
तात्पर्यवृत्ति-प्रधानता से-मुख्यता से भेद को-पर्याय को विषय करते हुए ऋजुसूत्र नय कहलाता है, यह गौणरूप से द्रव्य की भी अपेक्षा रखता है, ऐसा यहाँ अर्थ है। पुन: एकत्व-द्रव्य का निराकरण करने वाला तदाभास है क्योंकि यह सर्वथा प्रधानरूप से और अप्रधानरूप से द्रव्य को ग्रहण करता है और यह अलौकिक है अर्थात् लोकव्यवहार वह प्रयोजन जिसका है वह लौकिक है, उससे विपरीत अलौकिक कहा जाता है। यह तदाभास व्यवहार का विरोधी है, ऐसा अर्थ है। परस्पर में सजातीय-विजातीय से व्यावृत्त प्रतिक्षण विसरारू-जीर्ण होने वाले परमाणु परीक्षकजनों के द्वारा व्यवहार को नहीं प्राप्त होते हैं कि जिससे उसका विषय नयाभास न हो जावे अर्थात् बौद्धों द्वारा मान्य क्षणिक परमाणु व्यवहार में नहीं दिखते हैं इसीलिए उनका ग्राहक नय ऋजुसूत्र नयाभास है।
उत्थानिका-अब उक्त नयों के विशेषण और विशेष नय स्वरूप को प्रतिपादित करते हैं-
अन्वयार्थ-(ऐते ही चत्वार: अर्थनया:) निश्चितरूप से ये चार ही अर्थ नय हैं (जीवाद्यर्थव्यपाश्रयात्) क्योंकि जीवादि पदार्थों का आश्रय लेते हैं (त्रय: शब्दनया:) शेष तीन शब्दनय हैं, (सत्यपदविद्यां समाश्रिता:) क्योंकि ये व्याकरण शास्त्र का आश्रय लेने वाले हैं।।२२।।
अर्थ-ये चार नय अर्थ नय हैं क्योंकि ये जीवादि पदार्थों का आश्रय लेते हैं तथा शेष तीन नय शब्दनय हैं क्योंकि ये सत्यपद विद्या-व्याकरण शास्त्र का आश्रय लेने वाले हैं।।२२।।
तात्पर्यवृत्ति-पहले कहे गये जो नैगम आदि नय हैं, उनमें से चार नय अर्थ प्रधान होने से अर्थनय कहलाते हैं क्योंकि ये जीवादि पदार्थों का आश्रय लेते हैं। शेष शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत ये तीन नय शब्द प्रधान होने से शब्दनय हैं। ये सत्यपद की विद्या के आश्रित हैं अर्थात् प्रमाणांतर से अबाधित, काल, कारक आदि भेद के वाची पद सत्यपद कहलाते हैं, उन सत्यपदों की विद्या-व्याकरण शास्त्र, उसको आश्रित करने वाले हैं वे व्याकरणशास्त्र के आश्रित हैं ऐसा अर्थ है। उनमें काल, कारक, लिंग आदि के भेद से अर्थ में भेद को करने वाला शब्दनय है। पर्यायवाची शब्दों के भेद से अर्थ में भेद को करने वाला समभिरूढ़नय है और क्रियावाची शब्द के भेद से अर्थ में भेद को करने वाला एवंभूत नय हैं।
भावार्थ-यहाँ पर सात नयों में से चार नयों का लक्षण तो कारिकाओं में कह ही दिया है अत: श्री अभयचंद्रसूरि ने शब्दादि तीन नयों का लक्षण संक्षेप से कह दिया है क्योंकि कारिका में भी श्री अकलंकदेव ने इन तीन नयों को सत्यपद की विद्यारूप शब्द शास्त्र के आश्रित कहा है।
श्लोकार्थ-अकलंक-निर्दोष प्रभा के भार से प्रकाशित श्रुत-आगम को जो कि अर्थ से प्रमाणनय और उपयोगस्वरूप है इसको सौरीवृत्ति-श्रीअभयचंद्रसूरि की वृत्ति प्रबोधित करती है।।१।।
भावार्थ-श्रीमान् भट्टाकलंकदेव ने कारिकाओं के द्वारा जिनके स्वरूप को कहा है और श्री प्रभाचंद्राचार्य ने न्यायकुमुद टीका के द्वारा उनका विशद विवेचन किया है पुन: उन दोनों के अभिप्राय को ज्ञातकर श्री अभयचंद्रसूरि ने संक्षेप से सारभूत इस आगम के परिच्छेद में प्रमाण, नय तथा उपयोग के स्वरूप का स्पष्टीकरण किया है, ऐसा अर्थ है।
इस प्रकार श्री अभयचंद्रसूरि कृत लघीयस्त्रय की स्याद्वादभूषण
नामक तात्पर्यवृत्ति में श्रुतोपयोग नाम का
छठा परिच्छेद पूर्ण हुआ।