वे नय दो प्रकार के हैं-द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक। द्रव्य, सामान्य, अभेद, अव्यय और उत्सर्ग ये पर्यायवाची नाम हैं। यह द्रव्य जिसका अर्थ-विषय है, वे द्रव्यार्थिक नय हैं। पर्याय विशेष, भेद, व्यतिरेक, अपवाद ये पर्यायवाची नाम हैं। ये पर्याय अर्थ-विषय है जिसका वे पर्यायार्थिक नय हैं, ऐसा निरुक्ति अर्थ है।
द्रव्य के दो भेद हैं-शुद्ध द्रव्य और अशुद्ध द्रव्य। उसमें सत्सामान्य को शुद्ध द्रव्य कहते हैं और जीव तत्त्वादि पुन: अशुद्ध द्रव्य कहलाते हैं।
भावार्थ-प्रत्येक वस्तु में अनेक अंत अर्थात् धर्म पाये जाते हैं इसलिए वस्तु अनेकांतात्मक है। प्रमाण अनेकांत को विषय करता है। अनेकांतात्मक वस्तु के एक धर्म अर्थात् एक अंश को एकांत कहते हैं। नय एकांत को विषय करता है। यह नय अपने से विपरीत अंश के ग्राहक नय की अपेक्षा रखता है तभी तक सुनय है। जब दूसरे की अपेक्षा न करके आग्रहपूर्वक एक अंश को ही ग्रहण करता है तब वह दुर्नय या नयाभास कहलाता है।द्रव्य मात्र को जानने वाला द्रव्यार्थिक नय है और पर्याय मात्र को जानने वाला पर्यायार्थिक नय है। द्रव्य में भी सत्सामान्य को शुद्ध द्रव्य कहते हैं और जीवादि तत्त्व को अशुद्ध द्रव्य कहते हैं।उत्थानिका-देश, काल और आकार के भेद से अत्यंत भिन्न ही भाव परमार्थसत् हैं किन्तु सत् सामान्य नहीं हैं। इस प्रकार की बौद्ध की मान्यता का निराकरण करते हुए कहते हैं-
अन्वयार्थ-(जीवाजीवप्रभेदा:) जीव और अजीव के प्रभेद (यत् अंतर्लीना:) जिसके अंतर्लीन हैं (तत् सत् अस्ति) वह सत् है। (यथा) जैसे (स्वनिर्भासि) स्वनिर्भासी (एकं ज्ञानं) एक ज्ञान और (स्वपर्ययै:) अपनी पर्यायों से (जीव:) जीव एक है।।२।।
अर्थ-जीव और अजीव के प्रभेद जिसके अंतर्लीन हैं वह सत् है। जैसे स्वनिर्भासी एक ज्ञान और स्वपर्यायों से एक जीव है अर्थात् जिसमें जीव-अजीव और उनके सभी भेद-प्रभेदरूप यह ब्रह्मांड अंतर्गर्भित है-समा जाता है वह ‘सत्’ है। जैसे-चित्र के सभी रंगों-अंशों में व्यापी एक ज्ञान अथवा अनेकों पर्यायों से सहित जीव।।२।।