कूटस्थ नित्य में क्रम से कार्य करना बन नहीं सकता है। एक कार्य के उत्पादन काल में ही सभी कार्यों का उत्पादन कर देने की सामर्थ्य नित्य में पायी जाती है। उसमें सहकारी कारणों का मिलना भी अकिंचित्कर है। सहकारी कारण के बिना कार्यों को करने की सामर्थ्य का अभाव होने पर तो नित्यपने की हानि का प्रसंग आ जाता है क्योंकि असमर्थ स्वभाव का परित्याग और समर्थ स्वभाव को ग्रहण करके परिणमन करने वाले को ही तो अनित्य कहते हैं।भावार्थ-जैसे मिट्टी को सर्वथा कूटस्थ नित्य कहने पर तो पहली बात यह है कि उस मिट्टी से कुछ कार्य नहीं होगा। यदि आप जबरदस्ती मानें भी तो मिट्टी से एक घड़ा बनते ही उसी समय संपूर्ण मिट्टी से सारे घड़े बन जावेंगे तथा सहकारी कारण दंड, चाक, कुंभार आदि की भी आवश्यकता नहीं रहेगी क्योंकि सर्वथा नित्यस्वभाव में ये कारण क्या परिवर्तन कर सकेंगे। यदि आप कहें कि सहकारी चक्र, कुंभार आदि कारणों के बिना घट को करने की सामर्थ्य मिट्टी में नहीं है, तब तो पूर्व के असमर्थ स्वभाव का त्याग करके और उत्तर के समर्थ स्वभाव को ग्रहण करके परिणत हुए को ही तो अनित्य कहा जाता है पुन: तुम्हारा नित्य एकांत पक्ष कहाँ रहा ?
इस नित्यपक्ष में युगपत से भी कार्य होना संभव नहीं है। पूर्व समय में कृतकृत्य होने से वह नित्य पदार्थ उत्तर समयों में भी कार्य करने से रहित है। पुन: अर्थक्रिया के बिना उसके अभाव का प्रसंग आ जाता है और स्वभाव में भी अनेक प्रकारता आ जाती है क्योंकि एक स्वभाव से ही अनेक कार्यों का होना युक्त नहीं है अति प्रसंग हो जाता है और कार्य में अभेद-एकत्व का भी प्रसंग आ जाता है।
सांख्य-सहकारी कारण के अनेक प्रकार होने से ही कार्य अनेक प्रकार के होते हैं।
जैन-यह कहना भी गलत है। जो स्वभाव में भेद करने वाले नहीं हैं उन्हें सहकारी कारण ही नहीं कहा जा सकता है इसलिए सर्वथा नित्यपक्ष में क्रम और अक्रम का अभाव होने से अर्थक्रिया का अभाव सिद्ध ही है अत: नित्य पदार्थ का अभाव ही है यह बात सिद्ध हो गई क्योंकि व्यापक का अभाव व्याप्य के अभाव को बतला ही रहा है।
भावार्थ-सांख्य ने कहा कि सभी पदार्थ कूटस्थ नित्य हैं तब आचार्य ने कहा इस नियम से पक्ष में अर्थ क्रिया-कार्य के करने का अभाव रहा तब उन पदार्थों का अस्तित्व वैâसे सिद्ध होगा। कार्य का करना मान भी लीजिए तो यह प्रश्न उठता है कि वह नित्य पदार्थ कार्य करने में समर्थ है या असमर्थ ? यदि समर्थ है तो एक साथ ही सारे कार्य हो जावेंगे और सहकारी कारणों की अपेक्षा भी नहीं रखेंगे क्योंकि वह नित्य पदार्थ हमेशा ही समर्थ स्वभाव वाला है। यदि आप कहें कि सहकारी के मिलने पर ही कार्य होते हैं तब तो तुम्हारा नित्य पदार्थ कार्य करने में स्वयं समर्थ नहीं रहा। सहकारी कारण मिलने पर पूर्व के असमर्थ स्वभाव को छोड़कर समर्थ स्वभाव को ग्रहण करने से वह नित्य कहाँ रहा ? अनित्य ही हो गया। नित्यपक्ष में क्रम से अर्थक्रिया मानने पर ये दोष आते हैं।
यदि आप नित्य पदार्थ में युगपत् अर्थक्रिया मानें तो एक समय में ही सारे कार्य हो जाने से आगे कुछ कार्य नहीं होगा अथवा आगे-आगे कार्य करने में अनेकों स्वभाव मानने पड़ेंगे क्योंकि एकस्वभाव अनेक समयों में अनेक कार्य करे यह संभव नहीं है। आप कहें कि सहकारी कारणों में भेद होने से कार्यों में भेद दिखता है तब तो सहकारी कारण नित्य के स्वभाव में भेद करता है अत: पदार्थ की नित्यता नहीं टिकती है और यदि स्वभाव में भेद नहीं करता है तो वह सहकारी कारण ही नहीं कहलायेगा क्योंकि जो कुछ सहायता करे वही तो सहकारी कारण है अत: नित्यपक्ष में क्रम-अक्रम से अर्थक्रिया का अभाव है।