-नरेन्द्र छंद-
पुरी अयोध्या में सिद्धार्था, माता के आँगन में।
रत्न बरसते पिता स्वयंवर, बाँट रहे जन जन में।।
मास श्रेष्ठ वैशाख शुक्ल की, षष्ठी गर्भकल्याणक।
इन्द्र महोत्सव करते मिलकर, जजें गर्भकल्याणक।।१।।
ॐ ह्रीं वैशाखशुक्लाषष्ठ्यां श्रीअभिनंदननाथजिनगर्भकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ऐरावत हाथी पर चढ़कर, इन्द्र शची सह आए।
जिनबालक को गोदी में ले, सुरगिरि पर ले जायें।।
माघ शुक्ल द्वादश तिथि उत्तम, जन्म महोत्सव करते।
जिनवर जन्मकल्याणक पूजत, हम भवदधि से तरते।।२।।
ॐ ह्रीं माघशुक्लाद्वादश्यां श्रीअभिनंदननाथजिनजन्मकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपमामीति स्वाहा।
सुंदर नगर मेघ का विनशा, देख प्रभू वैरागी।
लौकांतिक सुर स्तुति करते, प्रभु गुण में अनुरागी।।
हस्तचित्र पालकि में प्रभु को, बिठा अग्रवन पहुँचे।
माघ शुक्ल बारस दीक्षा ली, बेला कर प्रभु तिष्ठे।।३।।
ॐ ह्रीं माघशुक्लाद्वादश्यां श्रीअभिनंदननाथजिनदीक्षाकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपमामीति स्वाहा।
पौष शुक्ल चौदश तिथि जिनवर, असनवृक्ष तल तिष्ठे।
बेला करके शुक्ल ध्यान में, घातिकर्म रिपु दग्धे।।
केवलज्ञान ज्योति जगते ही, समवसरण की रचना।
अर्घ्य चढ़ाकर पूजत ही मैं, झट पाऊँ सुख अपना।।४।।
ॐ ह्रीं पौषशुक्लाचतुर्दश्यां श्रीअभिनंदननाथजिनकेवलज्ञानकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपमामीति स्वाहा।
प्रभु सम्मेदशिखर पर पहुँचे, योग निरोध किया जब।
तिथि वैशाख शुक्ल षष्ठी के, निज शिवधाम लिया तब।।
इन्द्र सभी मिल मोक्षकल्याणक, पूजा किया रुची से।
अभिनंदन जिन मोक्षकल्याणक, जजूँ यहाँ भक्ती से।।५।।
ॐ ह्रीं वैशाखशुक्लाषष्ठ्यां श्रीअभिनंदननाथजिनमोक्षकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपमामीति स्वाहा।
-पूर्णार्घ्य (दोहा)-
अभिनंदन जिन पदकमल, निजानंद दातार।
पूर्ण अर्घ्य अर्पण करत, मिले भवोदधि पार।।१।।
ॐ ह्रीं श्रीअभिनंदननाथपंचकल्याणकाय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलि:।