अद्वैतवादी-भेदैकांत में ये दोष होवें, ठीक ही है किन्तु हमारे यहाँ अभेदैकांत में यह बात नहीं है। द्रव्य और पर्याय को सर्वथा अभिन्न-एकरूप ही मानने पर इनका प्रमेयरूप होना युक्त है क्योंकि भेद तो अविद्या से कल्पित हैं और भेदों के मानने से अनवस्था भी आ जाती है।अनंत भेद प्रमाण के द्वारा जाने नहीं जा सकते हैं क्योंकि अनंत का जानना अशक्य है। प्रत्यक्ष के द्वारा निर्विशेष भेद से रहित वस्तु ही जानी जाती है पुन: उसमें कल्पना ही भेदों को कल्पित कर देती है इसलिए अद्वैत ही तत्त्व है।
जैन-इस प्रकार से आप ब्रह्माद्वैतवादी और ज्ञानाद्वैतवादी दोनों की मान्यता प्रमाण से बाधित ही है। क्रिया और कारकरूप भेदों के अभाव में अर्थक्रिया नहीं हो सकती है क्योंकि वह असत् रूप है। ‘यदेवार्थक्रियाकारि तदेव परमार्थसत्’ जो अर्थक्रियाकारी है, वही परमार्थ सत् है ऐसा आप लोगों का ही कहना है।‘अद्वैत शब्द अपने वाक्य से विपरीत (द्वैत शब्द) का अविनाभावी है, क्योंकि वह नञ् समास पूर्व वाले अखंड पदरूप है जैसे कि ‘अगौ’ इत्यादि पद। इत्यादि रूप अनुमान वाक्य से आपका अद्वैत बाधित हो जाता है। कर्म, उसका फल और परलोक आदि भेदों का भी विरोध हो जाता है।
भावार्थ-अद्वैत शब्द अपने वाच्य अर्थ से विपरीत अर्थ को कहने वाले द्वैत शब्द के बिना नहीं हो सकता है। जैसे-जैन के बिना अजैन शब्द नहीं बनता है। क्योंकि इसमें नञ् समास हुआ है-‘‘न जैन: अजैन:’’ जो जैन नहीं है वह अजैन है। ‘‘न द्वैत: अद्वैत:’’ जो द्वैत नहीं है वह अद्वैत है अर्थात् अद्वैत शब्द अपने विरोधी द्वैत के बिना नहीं होने से द्वैत के अस्तित्व को सिद्ध ही कर रहा है। उपर्युक्त प्रकार के अनुमान से भी अद्वैत सिद्ध नहीं होता है तथा जो कर्मफल परलोकादि रूप या ग्राम, नगर, चेतन, अचेतन आदि रूप से भेद दृष्टिगोचर हो रहे हैं, वे भी विरुद्ध हो जावेंगे।
दूसरी बात यह है कि आप इस अद्वैत को हेतु से सिद्ध करते हो या हेतु के बिना ही। यदि हेतु से कहो तो द्वैत का प्रसंग आ जाता है क्योंकि साध्य और साधन की भेद रूप से ही प्रवृत्ति होती है अर्थात् अद्वैत साध्य को सिद्ध करने वाला साधन हेतु कहलाता है पुन: साध्य और साधन दो चीज हो जाने से द्वैत हो ही गया। यदि आप कहें कि हेतु के बिना ही अद्वैत को सिद्ध करते हैं तब तो वचनमात्र से ही आप अद्वैत को सिद्ध कर रहे हैं पुन: वचनमात्र से सभी लोगों का सभी इष्ट तत्त्व यथेष्ट रूप से सिद्ध हो जावेगा अर्थात् सभी लोग वचनमात्र से अपने-अपने सिद्धांत को सिद्ध कर लेंगे इसलिए अद्वैत एकांत में प्रमेय-प्रमाण का विषय सिद्ध नहीं होता है क्योंकि प्रमाण से विरोध आता है।