(गुरुओं के आहार के पश्चात् बोलने वाला भजन)
तर्ज—चाँद मेरे आजा……
मेरे मन खुशियाँ छाई हैं,
आहार देकर मन में मेरे, गुरुभक्ती समाई है।
मेरे मन……।।टेक.।।
प्रभु ऋषभ ने इस धरती पर, पहला आहार लिया था।
हस्तिनापुरी के राजा, श्रेयांस ने उन्हें दिया था।।
याद वह घड़ियाँ आई हैं,
आहार देकर मन में मेरे, गुरुभक्ती समाई है।। मेरे मन……।।१।।
हैं चार दान आगम में, श्रावक के लिए बताए।
उनको शक्ती सम करके, निज जीवन सफल बनाएं।।
आज वह घड़ियाँ आई हैं,
आहार देकर मन में मेरे, गुरुभक्ती समाई है।। मेरे मन……।।२।।
महावीर प्रभू आए थे, चन्दनबाला के घर में।
आहारदान की महिमा, जानी थी तब जन-जन ने।।
दान की महिमा गाई है,
आहार देकर मन में मेरे, गुरुभक्ती समाई है।। मेरे मन……।।३।।
आहारदान से घर में, अक्षय संपति आती है।
गुरुचरणों से चौके की, पावनता बढ़ जाती है।।
दान की घड़ियाँ आई हैं,
आहार देकर मन में मेरे, गुरुभक्ती समाई है।। मेरे मन……।।४।।
प्रतिदिन मेरे जीवन में, यह अवसर मिलता आए।
आहारदान दे गुरु को, नवजीवन खिलता जाए।।
चेतना मन में आई है,
आहार देकर मन में मेरे, गुरुभक्ती समाई है।। मेरे मन……।। ५।।