तर्ज—धरती का…….
सन्तों का तुम्हें नमन है, युग पुरुषों का वन्दन है।
प्रथमाचार्य शांतिसागर को, सौ सौ बार नमन है।।
सौ सौ बार नमन है-२।। टेक.।।
आदिनाथ से महावीर तक जिनचर्या बतलाई।
कुन्दकुन्द ने उसी तरह की मुनिचर्या अपनाई।।
शांतिसिन्धु भी उसी श्रृंखला के ही लघुनन्दन हैं।
सौ सौ बार नमन है………।।१।।
दक्षिण भारत वसुन्धरा का है इतिहास गवाही।
भोजग्राम माँ सत्यवती का पुत्र मुक्तिपथ राही।।
प्रथम बने आचार्यप्रवर युगप्रमुख तुम्हें वन्दन है।
सौ सौ बार नमन है………।।२।।
लुप्तप्राय यतिचर्या को जीवन्त किया था तुमने।
नग्न दिगम्बर मुद्रा को श्रुतवंत किया था तुमने।।
इसीलिए ‘‘चन्दनामती’’ जग करता तव वन्दन है।
सौ सौ बार नमन हैै………।।३।।
तर्ज—मैं चंदन बनकर……
इस युग के पहले गुरुवर, हैं शांतीसागर जी।
इस युग के पहले मुनिवर हैं, शांतीसागर जी।। इस…।।
।।टेक.।।
दक्षिण भारत के येळगुळ, में जनम हुआ था इनका।
माँ सत्यवती के नंदन, श्री शांतीसागर जी।।१।।
देवेन्द्रकीर्ति मुनिवर से, क्षुल्लक अरु मुनि दीक्षा ली।
आचार्य प्रथम कहलाए, श्री शांतीसागर जी।।२।।
मूलाचारादिक पढ़कर, मुनिचर्या बतलाई थी।
गुरुओं के गुरु कहलाए, श्री शांतीसागर जी।।३।।
धवला आदिक ग्रंथों का, भी जीर्णोद्धार कराया।
उपसर्गजयी कहलाए, श्री शांतीसागर जी।।४।।
‘‘चन्दनामती’’ उन गुरुवर, को कोटी कोटि नमन है।
वे शीघ्र मोक्षपद पाएं, श्री शांतीसागर जी।।५।।
तर्ज—सुहानी जैनवाणी……
दिगम्बर प्राकृतिक मुद्रा, विरागी की निशानी है।
कमण्डलु पिच्छिधारी नग्न मुनिवर की कहानी है।। टेक.।।
दिशाएँ ही बनीं अम्बर न तन पर वस्त्र ये डालें।
महाव्रत पाँच समिति और गुप्ती तीन ये पालें।।
त्रयोदश विधि चरित पालन करें जिनवर की वाणी है।।
कमण्डलु……।।१।।
बिना बोले ही इनकी शान्त छवि ऐसा बताती है।
मुक्ति कन्यावरण में यह ही मुद्रा काम आती है।।
मोक्षपथ के पथिकजन को यही वाणी सुनानी है।
कमण्डलु……।।२।।
यदि मुनिव्रत न पल सकता तो श्रावक धर्म मत भूलो।
देव-गुरु-शास्त्र की श्रद्धा परम कर्तव्य मत भूलो।।
बने मति ‘चन्दना’ जैसी यही ऋषियों की वाणी है।।
कमण्डलु……।।३।।
तर्ज—तेरी दुनिया से दूर……
गुरुवर शांतीसागर, थे इस युग के रत्नाकर, उन्हें याद रखना।।
।।टेक.।।
सुनते हैं जो इनकी मुनिचर्या की कहानी, रोमाँच होता है,
रोमाँच होता है, मन में भान होता है।
उनके जैसा त्यागी, तपस्वी कोई मुनिवर, न प्राप्त होता है,
न प्राप्त होता है, न प्राप्त होता है।।
थे वे ज्ञान के भण्डार, उनमें शांति थी अपार, उन्हें याद रखना।।१।।
बीसवीं सदी के, चारित्र चक्रवर्ती, श्री शांतिसागर जी,
श्री शांतिसागर जी, गुरुवर शांतिसागर जी।
मुनिपथ प्रदर्शक, आचार्य प्रथम थे, वे चउसंघ नायक जी,
चउसंघ नायक जी, गुरुवर मूलनायक जी।।
थे दश धर्मों के भण्डार, उनमें धैर्य था अपार, उन्हें याद रखना।।२।।
भादों सुदी दुतिया, को पुण्यतिथि उनकी, मनाते हैं सभी,
मनाते हैं सभी, उनको ध्याते हैं सभी।
उनकी स्मृतियों के, दर्पण में निज को, सजाते हैं सभी,
सजाते हैं सभी, निज को ध्याते हैं सभी।।
उनकी यादों का संसार, ‘चंदना’ है भण्डार, उन्हें याद रखना।।३।।
तर्ज-चल दिया छोड़…….
श्री शांतिसिंधु मुनिराज, जगत सरताज, प्रथम ऋषिराजा
युग के मुनि मार्ग विधाता।।
थे भोजग्राम के राजकुंवर।
माँ सत्यवती के पुत्रप्रवर।।
जन्मे जग के कल्याण हेतु सुखदाता।
युग के मुनिमार्ग विधाता।।१।।
जैसे रवि तिमिर भगाता है।
जग में प्रकाश पैâलाता है।
यूं ही मिथ्यात्व तिमिरनाशक गुरु गाथा।
युग के मुनिमार्ग विधाता।।२।।
मुनि के दर्शन जब दुर्लभ थे।
देवेन्द्रकीर्ति इक गुरुवर थे।।
वे बने शांतिसागर मुनि के निर्माता।
युग के मुनिमार्ग विधाता।।३।।
मुनिचर्या तब जीवन्त हुई।
जिनवाणी सार्थक सिद्ध हुई।।
कलियुग भी सत्पुरुषों का जन्मप्रदाता।
युग के मुनिमार्ग विधाता।।४।।
है वर्तमान गौरवशाली।
उस एक वृक्ष की ही डाली।।
फल फूल रही वंशावलि गौरव गाथा।
युग के मुनिमार्ग विधाता।।५।।
आचार्य प्रथम वे मान्य हुए।
युग में सबसे प्राधान्य हुए।।
उत्कृष्ट समाधिमरण से जोड़ा नाता।
युग के मुनिमार्ग विधाता।।६।।
हम भी परोक्ष यशगान करें।
गुरुवर का मन में ध्यान करें।।
‘‘चन्दनामती’’ वन्दना करें नत माथा।
युग के मुनिमार्ग विधाता।।७।।
तर्ज-वन्दन शत शत बार है……….
मेरा नम्र प्रणाम है,
महावीर के लघुनंदन को मेरा नम्र प्रणाम है।
कलियुग में भी जिनका दर्शन करता जग कल्याण है।
महावीर के लघुनंदन को मेरा नम्र प्रणाम है।।टेक.।।
जिनके तप की कथा सदा, ग्रन्थों में पढ़ी पुरानी है।
कवियों ने जिन मुनियों की, कविता में कही कहानी है।।
भारत की धरती ही उन, सन्तों की मानो खान है।
महावीर के लघुनंदन को मेरा नम्र प्रणाम है।।।१।।
सदी बीसवीं में गुरु शांतीसागर प्रथमाचार्य हुए।
घोर तपस्या करके युग को, कई संत मुनिराज दिये।।
तभी आज मुनियों के दर्शन ही मानो शिवधाम हैं।
महावीर के लघुनंदन को मेरा नम्र प्रणाम है।।२।।
काय में उत्तम बल नहिं है, फिर भी चर्या प्राचीन है।
वही मूलगुण वही परीषह, शास्त्रों के आधीन हैं।।
ब्रह्मचर्य का पालन जिनके, जीवन का आयाम है।
महावीर के लघुनंदन को मेरा नम्र प्रणाम है।।३।।