पढमं ताव सुदं मे आउस्संतो! इह खलु समणेण भयवदा महदि-महावीरेण महा-कस्सवेण सव्वण्ह-णाणेण सव्व-लोय-दरसिणा सावयाणं सावियाणं खुड्डयाणं खुड्डियाणं कारणेण पंचाणुव्वदाणि तिण्णि गुणव्वदाणि चत्तारि सिक्खा-वदाणि बारसविहं गिहत्थधम्मं सम्मं उवदेसियाणि। तत्थ इमाणि पंचाणुव्वदाणि पढमे अणुव्वदे थूलयडे पाणादि-वादादो वेरमणं, विदिए अणुव्वदे थूलयडे मुसावादादो वेरमणं, तदिए अणुव्वदे थूलयडे अदत्ता-दाणादो वेरमणं, चउत्थे अणुव्वदे थूलयडे सदारसंतोस-परदारा-गमणवेरमणं कस्स य पुणु सव्वदो विरदी, पंचमे अणुव्वदे थूलयडे इच्छाकद-परिमाणं चेदि, इच्चेदाणि पंच अणुव्वदाणि।
तत्थ इमाणि तिण्णि गुणव्वदाणि, तत्थ पढमे गुणव्वदे दिसिविदिसि पच्चक्खाणं, विदिए गुणव्वदे विविध-अणत्थ-दण्डादो वेरमणं, तदिए गुणव्वदे भोगोपभोग-परिसंखाणं चेदि, इच्चेदाणि तिण्णि गुणव्वदाणि।
तत्थ इमाणि चत्तारि सिक्खावदाणि, तत्थ पढमे सामाइयं, विदिए पोसहो-वासयं, तदिए अतिथिसंविभागो, चउत्थे सिक्खावदे पच्छिम-सल्लेहणा-मरणं, तिदियं अब्भोवस्साणं१ चेदि।
—(पद्यानुवाद)-
हे आयुष्मन्तों! पहले ही यहां मैंने सुना वीर प्रभु से।
उन महाश्रमण भगवान् महतिमहावीर महाकाश्यप जिनसे।।
सर्वज्ञज्ञानयुत सर्वलोकदर्शी उनने उपदेश दिया।
श्रावक व श्राविका क्षुल्लक अरु क्षुल्लिका इन्हों के लिए कहा।।
ये पांच अणुव्रत तीन गुणव्रत, चउ शिक्षाव्रत बारह विध।
हैं सम्यक् श्रावक धर्म इन्हीं, में जो ये अणुव्रत पांच कथित।।
पहला अणुव्रत स्थूलतया, प्राणीवध से विरती होना।
दूजा अणुव्रत स्थूलतया, असत्यवच से विरती होना।।
तीजा अणुव्रत स्थूलतया, बिन दी वस्तू को नहिं लेना।
चौथा अणुव्रत स्थूलतया परदारा से विरती होना।।
निजपत्नी में संतुष्टी या सब स्त्रीमात्र से रति तजना।
पंचम अणुव्रत स्थूलतया इच्छाकृत परीमाण धरना।।
त्रय गुणव्रत में पहला गुणव्रत, दिश विदिशा का प्रमाण करना।
दूजा गुणव्रत नाना अनर्थ दण्डों से नित विरती धरना।।
तीजा गुणव्रत भोगोपभोग, वस्तू की संख्या कर लेना।
ये तीन गुणव्रत कहे, पुनः चारों शिक्षाव्रत को सुनना।।
पहला शिक्षाव्रत सामायिक दूजा प्रोषध उपवास कहा।
तीजा है अतिथि संविभाग चौथा सल्लेखनमरण कहा।।
शिक्षाव्रत चार कहे पुनरपि, अभ्रावकाश तृतीयव्रत है।
जघन्य श्रावक से उत्तम तक, ये बारह व्रत तरतममय हैंं।।१
चारित्र पाहुड़ में श्रावक के १२ व्रत—
दिसिविदिसिमाण पढमं अणत्थदंडस्स वज्जणं विदियं।
भोगोपभोगपरिमा इयमेव गुणव्वया तिण्णि।।२४।।
दिग्विदिग्माणं प्रथमं अनर्थदण्डस्य वर्जनं द्वितीयम्।
भोगोपभोगपरिमाणं इदमेव गुणव्रतानि त्रीणि।।२४।।
गाथार्थ-दिशाओं और विदिशाओं का प्रमाण करना पहला गुणव्रत है। अनर्थदण्ड का त्याग करना दूसरा गुणव्रत है और भोग तथा उपभोग का परिमाण करना तीसरा गुणव्रत है। इस प्रकार ये तीन गुणव्रत हैं।।२४।।
सामाइयं च पढमं विदियं च तहेव पोसहं भणियं।
तइयं अतिहिपुज्जं चउत्थ सल्लेहणा अंते।।२५।।
सामायिकं च प्रथमं द्वितीयं च तथैव प्रोषधो भणित:।
तृतीयमतिथि-पूज्यं चतुर्थं सल्लेखना अन्ते।।२५।।
गाथार्थ-पहला सामायिक, दूसरा प्रोषध, तीसरा अतिथि-पूज्य और चौथा मरणकाल में सल्लेखना धारण करना ये चार शिक्षाव्रत हैं।।२५।।
विशेषार्थ-सामायिक नाम का पहला शिक्षाव्रत है। इसमें चैत्यभक्ति, पञ्चपरमेष्ठी भक्ति और समाधि भक्ति करना चाहिए। व्रत प्रतिमा में जो सामायिक होता है वह दिन में एक बार, दो बार अथवा तीन बार होता है। परन्तु सामायिक प्रतिमा में जो सामायिक कहा गया है, वह नियम से तीन बार करना चाहिए।
भावसंग्रह ग्रंथ में श्रावक के १२ व्रत—
दिसिविदिसि पच्चखाणं अणत्थदंडाण होइ परिहारो।
भोओपभोयसंखा ए एह गुणव्वया तिण्णि१।।३५४।।
दिग्विदिक् प्रत्याख्यानं अनर्थदण्डानां भवति परिहार:।
भोगोपभोगे संख्या एतानि हि गुणव्रतानि त्रीणि।।३५४।।
अर्थ-दिशा—विदिशाओं में आने जाने का नियम धारण कर उनकी सीमा नियत कर शेष दिशा विदिशा में आने जाने त्याग करना, पाँचों प्रकार के अनर्थ दंडों का त्याग करना, भोगोपभोगपदार्थों की संख्या नियत कर शेष भोगोपभोग पदार्थों का त्याग कर देना ये तीन गुणव्रत कहलाते हैं।
देवे थुवइ तियाले पव्वे पव्वे सुपोसहोवासं।
अति हीण संविभागो मरणंते कुणइ सल्लिहणं।।३५५।।
देवान् स्तौति त्रिकाले पर्वणि पर्वणि सुप्रोषधोपवास:।
अतिथीनां संविभाग: मरणान्ते करोति सल्लेखनाम।।३५५।।
अर्थ-प्रात:काल, मध्यान्ह काल, संध्याकाल इन तीनों समय में पंचपरमेष्ठी की स्तुति करना, प्रत्येक महीने की दो अष्टमी, दो चतुर्दशी इन चारों पर्वों में प्रोषधोपवास करना, प्रतिदिन अतिथियों को दान देना और सल्लेखना धारण करना ये चार शिक्षाव्रत कहलाते हैं। इस प्रकार पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत ये बारह अणुव्रत कहलाते हैं। देशव्रती श्रावक को आठ मूलगुण और ये बारह व्रत अवश्य धारण करने चाहिए। इन बारह व्रतों को उत्तर गुण भी कहते हैं।
तत्त्वार्थ सूत्र में बारह व्रत—
व्रत किसे कहते हैं ?
हिंसाऽनृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम्।।१।।
अर्थ-हिंसा, अनृत (झूठ), स्तेय (चोरी) अब्रह्म (कुशील) और परिग्रह से विरक्त होना व्रत कहलाता है।
व्रत के कितने भेद हैं ?
देशसर्वतोऽणुमहती।।२।।
अर्थ-व्रत के दो भेद हैं—अणुव्रत, महाव्रत। हिंसा आदि पांच पापों का एकदेश त्याग करना अणुव्रत कहलाता है और सर्वदेश त्याग करना महाव्रत कहलाता है।
अणुव्रती के और भी कोई व्रत होते हैं ?
दिग्देशानर्थदण्डविरति—सामायिकप्रोषधोपवासोपभोगपरिभोग— परिमाणातिथिसंविभागव्रत-सम्पन्नश्च।।२१।।
अर्थ-अणुव्रती को दिग्व्रत, देशव्रत, अनर्थदण्डव्रत (३ गुणव्रतों) और सामायिक, प्रोषधोपवास, उपभोग-परिभोग परिमाण और अतिथिसंविभागव्रत (ये चार शिक्षाव्रत) और पालने होते हैं।
मारणांतिकीं सल्लेखनां जोषिता।।२२।।
अर्थ-अव्रती को मरण के समय सल्लेखना ग्रहण करनी चाहिए। समतापूर्वक काय और कषायों को कृश करना सल्लेखना कहलाता है।
विशेषार्थ-पांच अणुव्रत सर्वत्र समान हैं। तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत श्रीगौतमस्वामी, श्रीकुंदकुंददेव व भावसंग्रह के कर्ता श्री देवसेन आचार्य के एक सदृश—समान है। श्री उमास्वामी आचार्य के तत्त्वार्थसूत्र में अंतर है और आगे अनेक श्रावकाचारों में इन सातों में कहीं समानता है कहीं—कहीं अंतर है। इसे—‘जिनागम रहस्य’ ग्रंथ में मैंने संकलित किया है।