महाकल्पद्रुम वीर प्रभु, फल अचिन्त्य दातार।
महावीर भगवान को, नमूं अनन्तों बार।।१।।
वीर दिव्यध्वनि श्रवण कर, द्वादशांग करतार।
गौतम गणधर ग्रंथकृत्, नमूं उन्हें शत बार।।२।।
श्री वीरशासन प्रथित, कुंदकुंद आचार्य।
मूलसंघ में नाम से, कुंदकुंद आम्नाय।।३।।
गच्छ सरस्वती गण कहा, बलात्कार शुभ मान्य।
चारितचक्री प्रथम गुरु, शांतिसागराचार्य।।४।।
उनके पट्टाचार्य गुरु, वीरसागराचार्य।
महाव्रत के दातागुरु, नमूं उभय आचार्य।।५।।
वीर संवत् पच्चीस सौ, चालिस जग अभिवंद्य।
दूज कृष्ण वैशाख की, पूर्ण किया यह ग्रंथ।।६।।
अमृतवर्षाकारिणी, गौतमस्वामी वाणि।
अमृतपद देवे हमें, यह संकलिता वाणि।।७।।
जब तक जिनवर धर्म है, जग में सुखकर पूर्ण।
तब तक ‘कृति’ स्थायि हो, करे ज्ञानमति पूर्ण।।८।।
इति श्रीगौतमस्वामीकृत चैत्यभक्तिप्रशस्ति समाप्ता।