-अथ स्थापना-नरेन्द्र छंद-
तीर्थंकर श्रीमल्लिनाथ ने, निज पद प्राप्त किया है।
काम मोह यम मल्ल जीतकर, सार्थक नाम किया है।।
कर्म मल्ल विजिगीषु१ मुनीश्वर, प्रभु को मन में ध्याते।
हम पूजें आह्वानन करके, सब दु:ख दोष नशाते।।१।।
-दोहा-
मल्लिनाथ प्रभु बालयति, नमूं नमूं त्रयकाल।
पूजूं श्रद्धा भाव से, पुन: नमूं नत भाल।।२।।
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथतीर्थंकर! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथतीर्थंकर! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथतीर्थंकर! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।
-अथ अष्टक-गीता छंद-
जल अमल ले जिनपाद पूजूँ, कर्ममल धुल जायेगा।
आत्मीक समतारस विमल, आनंद अनुभव आयेगा।।
श्री मल्लिनाथ जिनेन्द्र के, चरणाब्ज का अर्चन करूँ।
यमराज मल्ल पछाड़ने को, कोटिश: वंदन करूँ।।१।।
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथतीर्थंकराय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
चंदन सुगंधित ले जिनेश्वर, पद जजूँ आनंद से।
स्वात्मानुभव आह्लाद पाकर, पूजहूँ जगद्वंद से।।श्री.।।२।।
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथतीर्थंकराय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
चंदा किरण सम धवल तंदुल, पुंज जिन आगे धरूँ।
वर धर्मशुक्ल सुध्यान निर्मल, पाय आतम निधि भरूँ।।
श्री मल्लिनाथ जिनेन्द्र के, चरणाब्ज का अर्चन करूँ।
यमराज मल्ल पछाड़ने को, कोटिश: वंदन करूँ।।३।।
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथतीर्थंकराय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
मंदार चंपक पुष्प सुरभित, लाय जिनपद पूजते।
निज आत्मगुण कलिका खिले, जन भ्रमर तापे गूंजते।।श्री.।।४।।
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथतीर्थंकराय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
मोदक पुआ बरफी इमरती, लाय जिन सन्मुख धरें।
आत्मैकरस पीयूष मिश्रित, अतुल आनंद भव हरें।।श्री.।।५।।
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथतीर्थंकराय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दीपक शिखा उद्योतकारी, जिनचरण में वारना।
अज्ञान तिमिर हटाय अंतर, ज्ञान ज्योती धारना।।श्री.।।६।।
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथतीर्थंकराय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
दशगंधधूप मंगाय स्वाहा१, नाथ को अर्पण किया।
वसुकर्म२ स्वाहा हेतु ही, निज आत्म को तर्पण किया।।श्री.।।७।।
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथतीर्थंकराय अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
अंगूर आम अनार गन्ना, लाय जिनपूजा करूँ।
वर मोक्षफल की आश लेकर, कर्मकंटक परिहरूँ।।श्री.।।८।।
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथतीर्थंकराय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
जल गंध अक्षत पुष्प नेवज, दीप धूप फलादि ले।
जिन कल्पतरु पूजत मुझे, वैâवल्य सुज्ञानमती मिले।।श्री.।।९।।
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथतीर्थंकराय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
-दोहा-
कंचनझारी में भरा, यमुना सरिता नीर।
जिनपद में धारा करत, मिले भवोदधि तीर।।१०।।
शांतये शांतिधारा।
सुरभित फूलों को चुना, बेला जुही गुलाब।
पुष्पांजलि अर्पण करत, मिले निजातम लाभ।।११।।
दिव्य पुष्पांजलि:।
(अथ पंचकल्याणक अर्घ्य)
-नरेन्द्र छंद-
मिथिलापुरी में कुंभ नृपति गृह, प्रजावती रानी को।
सोलह स्वप्न दिखा प्रभु आये, गर्भ बसे अतिसुख सों।।
चैत्र सुदी एकम तिथि उत्तम, सुरपति उत्सव कीना।
हम पूजें प्रभु गर्भकल्याणक, भव भव दु:ख क्षय कीना।।१।।
ॐ ह्रीं चैत्रशुक्लाप्रतिपदायां श्रीमल्लिनाथतीर्थंकरगर्भकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
मगसिर सुदि ग्यारस प्रभु जन्में, त्रिभुवन धन्य हुआ था।
रुचकाचल देवियाँ आय के, जातक कर्म किया था।।
सुरगिरि पर जन्माभिषेक कर, सुरगण धन्य हुये तब।
जन्मकल्याणक जजते मेरे, संकट दूर हुये सब।।२।।
ॐ ह्रीं मार्गशीर्षशुक्लाएकादश्यां श्रीमल्लिनाथतीर्थंकरजन्मकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जातिस्मरण हुआ प्रभु को जब, बाल ब्रह्मचारी ही।
देव जयंता पालकि लाये, मगसिर सुदि ग्यारस थी।।
श्वेतबाग में पहुँच प्रभू ने, दीक्षा स्वयं लिया था।
तपकल्याणक पूजा करके, सुरगण पुण्य लिया था।।३।।
ॐ ह्रीं मार्गशीर्षशुक्लाएकादश्यां श्रीमल्लिनाथतीर्थंकरदीक्षाकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पौष वदी दुतिया वन में प्रभु, तरु अशोक तल तिष्ठे।
मोह नाश दशवें गुणथाने, बारहवें में पहुँचे।।
ज्ञानावरण दर्शनावरणी, अंतराय को नाशा।
केवलज्ञान सूर्य किरणों से, लोकालोक प्रकाशा।।४।।
ॐ ह्रीं पौषकृष्णाद्वितीयायां श्रीमल्लिनाथतीर्थंकरकेवलज्ञानकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपमीति स्वाहा।
फाल्गुन सुदि पंचमि तिथि उत्तम, गिरि सम्मेद पर तिष्ठे।
चार अघाती कर्मनाश कर, मोक्षधाम में पहुँचे।।
इन्द्रगणों ने उत्सव करके, तांडवनृत्य किया तब।
शिवकल्याणक पूजा करते, जीवन सफल हुआ अब।।५।।
ॐ ह्रीं फाल्गुनशुक्लापंचम्यां श्रीमल्लिनाथतीर्थंकरमोक्षकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
—पूर्णार्घ्य—दोहा—
मल्लिनाथ की भक्ति से, मृत्युमल्ल का अन्त।
अर्घ्य चढ़ाकर पूजते, भक्त बने भगवन्त।।१।।
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथतीर्थंकरपंचकल्याणकाय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलि।