तात्पर्यवृत्ति-जीव का लक्षण चेतना है। अजीव पुन: उससे विपरीत पुद्गल आदि हैं। त्रस-स्थावर आदि अवांतर विशेष जीव के प्रभेद हैं। ये भेद-प्रभेद सहित सभी जीव-अजीव जिसमें अंतर्गर्भित हैं वह सत्-सत्तासामान्य है-मौजूद है-प्रतीति में आ रहा है।
निश्चित ही सत्त्व-अस्तित्व से व्यतिरिक्त द्रव्य अथवा पर्याय ‘अस्ति-है’ इस प्रकार कुछ भी व्यवहार करना शक्य नहीं है क्योंकि स्ववचन में विरोध आता है और अतिप्रसंग दोष आता है अर्थात् ‘अस्ति’ को ही ‘है’ इस शब्द से कहते हैं। जब द्रव्य या पर्याय का अस्तित्व ही नहीं है तब यह द्रव्य है या पर्याय है ऐसा कहना तो ‘मैं मौनव्रती हूँ’ ऐसा बोलने वाले के समान स्ववचन बाधित ही है और अतिप्रसंग से आकाश के फूल, बंध्या के पुत्र आदि भी दिखने लगेंगे।
प्रश्न-एक ही अनेक जीवादि भेदों में व्यापक वैâसे हो सकता है ?
उत्तर-जैसे आपके द्वारा मान्य एक ही ज्ञान चित्रपटाति को विषय करने वाला है स्वनिर्भासी है। स्व-अपने ज्ञानस्वरूप निर्भास-नीलादि आकार जिसमें हैं, वह स्वनिर्भासी कहलाता है और जिस प्रकार से एक जीव-आत्मा अपनी पर्यायों से सहित है। स्व-चिद्रूप पर्याय-रागादि परिणामों से आक्रांत-व्याप्त प्रतीति के पद पर आरूढ़ हुआ विरुद्ध नहीं है अर्थात् चैतन्य स्वरूप राग, द्वेषादि भावों से व्याप्त और प्रतीति में आता हुआ एक जीव द्रव्य सिद्ध है। उसी प्रकार से जीवादि अनेक भेदों से आक्रांत सत्त्व भी विरुद्ध नहीं है।
उत्थानिका-उस सत्सामान्य के नय का निरूपण करते हैं-
अन्वयार्थ-(संग्रह: तदभेदत:) संग्रहनय उस सामान्य के अभेद से (शुद्धं द्रव्यं) शुद्ध द्रव्य को (अभिप्रैति) स्वीकार करता है। (भेदानां) भेदों में (असदात्मा) असत्स्वरूप (एक: अपि भेद:) एक भी भेद (न अस्ति) नहीं है।।३।।
अर्थ-संग्रहनय उस सामान्य के अभेद से शुद्ध द्रव्य को विषय करता है। भेदों में असदात्मा-असत्स्वरूप एक भी भेद नहीं है क्योंकि विरोध आता है अर्थात् संग्रहनय भेदों को न देखकर-गौण करके अभेद से केवल मात्र अस्तित्व सामान्य-महासत्ता को विषय करता है।।३।।