समाहित विषयवस्तु
१. आचार्य श्री देशभूषण का बाराबंकी में चातुर्मास।
२. मैना का आचार्यश्री के दर्शन करने अनुज वैâलाश के साथ जाना।
३. रूढ़ी तोड़कर संयम धारण करने का प्रबल पुरुषार्थ।
४. मैना का पिंजरे से उड़ना, फिर नहीं लौटना।
५. आचार्यश्री का केशलोंच उत्सव।
६. माता-पिता द्वारा बार-बार घर चलने का आग्रह।
७. ‘मैना’ द्वारा अपना केशलोंच शुरू करना।
८. पिताजी का अन्यत्र जाना और माता का मूर्च्छित हो जाना।
९. मैना द्वारा मंदिर जाना और व्रतग्रहणपर्यंत घर तथा चतुराहार का त्याग।
१०. मंदिर मे रात भर माँ-बेटी का वार्तालाप।
११. अगर आप मेरी सच्ची माता हैं तो व्रत धारण की अनुमति दें, मेरा उपकार करें।
१२. माता द्वारा स्वीकृति और स्वयं के उद्धार का निवेदन।
१३. प्रात:काल आचार्यश्री से सप्तमप्रतिमा के व्रतग्रहण।
१४. शरद पूर्णिमा-जन्म और संयम का एक ही दिन।
१५. आचार्यश्री के प्रवचन।
१६. व्रत ग्रहण की घर-समाज पर प्रतिक्रिया।
टिकेटनगर से साठ मील है, बाराबंकी शुभ स्थान।
आचार्य श्री देशभूषण का, उस ही ओर हुआ प्रस्थान।।
चातुर्मास काल नियराया, किया निवेदन सकल समाज।
धर्मलाभ का अनुपम अवसर, हमको देवें श्री महाराज।।१६०।।
आचार्य श्री देशभूषण जी, करुणा सागर संत महान्।
भारतगौरव, विद्यालंकृत, आचार्य रत्न, अतिशय विद्वान्।।
सकल समाज निवेदन को सुन, सब पूर्वापर किया विचार।
सन् उन्नीस बावन ईसा का, चातुर्मास किया स्वीकार।।१६१।।
चिनगारी ज्वाला बन जाती, जब मिल जाता पवन निमित्त।
सतत साधना-श्रुताभ्यास से, हुआ शुद्ध मैना का चित्त।।
समाचार मैना तक पहुँचे, बाराबंकी चातुर्मास।
फिर क्या था वैराग्य का धनुष, शोभित हुआ हृदय आकाश।१६२।।
निर्मम-निर्मोही-मैना मन, गृह-तन-भोग विरत संसार।
पल-पल काटा एक वर्ष-सा, थमता नहीं हृदय का ज्वार।।
होते पंख अगर उड़ जाती, जाती गुरुवर चरण-शरण।
कहती जिनवर दीक्षा दे दो, मिटे जन्म-मृतु भव भ्रमण।।१६३।।
माँ-मन होता मोम-सा कोमल, दयापूर्ण, ममता का कोष।
सुखी मानती सदा स्वयं को, जिससे हो सन्तति संतोष।।
मैना ने रट लगा रखी थी, दर्शन करने जाना है।
आचार्यश्री ने दिये पाठ जो, उनको मुझे सुनाना है।।१६४।।
पिघली ममता से अनुमति पा, वैâलाश अनुज को लेकर साथ।
पहुँची मैना गुरुचरणों में, बोली कृपा करो मुनिनाथ।।
अनादिकाल से भव भ्रमण में, पँâसी हुई हूँ बुरी तरह।
तारण-तरण, पोत भव सागर, मुझे बचा लो किसी तरह।।१६५।।
तोता जब उड़ता पिंजरे से, पुन: लौटकर नहिं आता।
मैना ने गृह-त्याग दिया अब, कोई नहीं लौटा पाता।।
रहने लगीं वहीं अब मैना, आहारदान, श्रुतज्ञान निमित्त।
वैâलाश अनुज को पड़ा लौटना, करते रुदन, दुखी हो चित्त ।।१६६।।
तदा काल नारी का जीवन, अबला भरी कहानी था।
आँचल में था दूध और, आँखों में प्रासुक पानी था।।
नहीं सयानी क्वांरी कन्या, घर से बाहर जा सकती।
एक गाँव से, गाँव दूसरे, जाये उसकी क्या हस्ती।।।१६७।।
पर, मैना ने रूढ़ि तोड़ दी, संयम के सोपानों चढ़।
महिमा मंडित किया नारि को, साहस से आगे बढ़कर।।
नारी तो है नर से भारी, पुण्य कथन चरितार्थ किया।
संयम स्यंदन संचालन कर, जीवन का पूर्णार्घ दिया।।१६८।।
आदि-काल में ब्राह्मी-सुंदरी, जो प्रस्तुत आदर्श किया।
अनंतमती चंदनबाला ने, जिसको आगे बढ़ा दिया।।
उसी महत्तम संयम पथ को, मैना जीवित किया पुन:।
फलस्वरूप मिल रहीं देखने, व्रती-साधिकाएँ अधुना।।१६९।।
समय का पंछी उड़ा दूर तक, बीत गये दो-तीनेक माह।
रवि की किरणें मंद-मंद थीं, पर मैना मन था उत्साह।।
आश्विन शुक्ल चतुर्दशी आयी, केशलुंच मुनि उत्सव आज।
टिवैâतनगर दरियाबादादिक, से जुड़ आई सकल समाज।।१७०।।
मात-पिता भी आये उनके, मैना बोली वचन संभार।
दीक्षा मुझे दिला दें गुरु से, होगा यह मेरा उपकार।।
अष्टमूलगुण पास नहीं हैं, गुरु साक्षी व्रत लिया नहीं।
अत: एकदम दीक्षा देने, का कोई औचित्य नहीं।।१७१।।
चलो! चलो! घर ज्यादा आग्रह, करने लग गए मात-पिता।
केशलुंच प्रारंभ कर दिया, गुरुवर साक्षी वहीं तदा।।
अतिशय भाव विशुद्धि आई, कोई रोक न पाया है।
पिता गये अन्यत्र क्षेत्र तज, माँ मूर्च्छा वर पाया है।१७२।।
जितने मुँह उतनी थीं बातें, भव भ्रमण है एक बला।
मानव तन को सार्थक करने, संयम धारण श्रेष्ठ कला।।
नाबालिग लड़की को रोको, जल्दी लाओ पुलिस बुला।
करो वही जो पूर्ण उचित हो, पहले तौलो न्याय तुला।।१७३।।
इसी मध्य आई कुछ बाधा, मैना ने पथ किया चयन।
और अन्त पहँुची जिनमंदिर, प्रभु सम्मुख यों कहे वयन।।
जब तक मुझको मिलें नहीं व्रत, त्याग किया मैं चतुराहार।
घर जाने का त्याग है मेरा, प्रभु उपसर्ग निवारण हार।।१७४।।
देख केशलुंचन गुरुवर का, मैना ने भी किया शुरू।
अपना केशलोंच करने को, शक्ती पाई देख गुरू।।
उनका साहस देख-देख कर, जनता में खलबली मची।
रोको रोको इस कन्या को, यह है इसकी नासमझी।।१७५।।
शांत हो गया कुछ क्षण में सब, केशलोंच किया आचार्यश्री।
केशलुंच का क्या महत्त्व है, सुष्ठु हुआ उपदेश तभी।।
दिशा-दिशा से आये पक्षी, लौट गये सब अपने घर।
‘‘अहो! लौह बाला विरागिनी, अमर रहे’’ कहते इक स्वर।।१७६।।
वेदी सम्मुख बैठी मैना, प्रभु से करे प्रार्थना यों।
तीन लोक के नाथ आप हैं, मेरी अरज न सुनते क्यों।।
ध्यान लगाकर सुन लो स्वामी, हाथ जोड़ सविनय कहती।
दु:खों से छुटकारा दे दो, हार गई सहती-सहती।।१७७।।
महामंत्र का जाप करे कभी, दु:ख हरण विनती पढ़ती।
संकटमोचन स्तुति द्वारा, बार-बार विनती करती।।
प्रभु के सम्मुख लगन लगाये, बीत गया बहुतेरा काल।
अहो! निशा के नौ-दश बज गये, माता ने समझाया बाल।।१७८।।
बेटी उठो! चलो घर अपने, करूँगी वैसा, तुम चाहो।
कौन मात चाहेगी ऐसा, मेरी बेटी सुखी न हो।।
पहुँची वहॉँ, जहाँ ठहरी थी, चला रात्रि भर वार्तालाप।
पहलू हुए उजागर सब ही, माँ मन लगी विरागी छाप।।१७९।।
पाठकवृंद चलें हम सब ही, सुनें विरागी के संवाद।
जिनको हम पढ़ते पुराण में, आज उन्हीं को कर लें याद।।
अप्रमत्त रह जम्बूस्वामी, पँâसे नहीं भोगों के जाल।
तथा विरागी मैना देवी, पँâसी न बैरी राग-कराल।।१८०।।
देखो बेटी! पिता तुम्हारे, दुख में पागल कहाँ गये।
पता नहीं उनका क्या होगा, हम तो विधि से छले गये।।
मोह कर्म ही तो अनादि से, हमको जग में घुमा रहा।
जिसका जो होना सो होगा, मुझे न कोइ विकल्प रहा।।१८१।।
पहले बेटी घर में रहकर, करो साधना अरु अभ्यास।
सफल रहो तो, संघ में आकर, फिर रहना गुरु चरणों पास।।
कल की बात व्यर्थ है माते, कल को किसने जाना है।
कल के विश्वासी अज्ञों को, शेष रहा पछताना है।।१८२।।
माँ की ममता बिलख-बिलख कर, आँसू लगी बहाने जब।
ज्ञानपूर्ण शब्दों के द्वारा, मैना ने समझाया तब।।
माता-पिता, पुत्र-पुत्री सब, झूठे रिश्ते-नाते हैं।
अनादिकाल से बनते-मिटते, यों ही आते-जाते हैं।।१८३।।
देखो बेटी! भाई तुम्हारा, वह रवीन्द्र अति छोटा है।
वह तो हँसना भूल गया है, हरदम रोता-रोता है।।
जीजी बिना जियेगा वैâसे, तुम्हीं बता मेरी मैना।
कुसुम हृदय वङ्का बन बोली-मैं तो कुछ भी जानूँ ना।।१८४।।
अगर आप सच्ची माता हैं, तो मेरा उपकार करें।
व्रतधारण की अनुमति दे, मम जीवन का उद्धार करें।।
ममता बदल गई समता में, लिखी स्वीकृति कागज पर।
मेरी बेटी जो व्रत माँगे, वह दे दें आचार्यप्रवर।।१८५।।
विराग और राग की वर्षा, लगी बरसने नयनों से।
मंगलमय हो पंथ तुम्हारा, ममता बिखरी वयनों से।।
जैसे तुझको पार लगाने, तेरा कहना माना है।
वैसे मुझे भी मोक्षमार्ग पर, तुझको ही ले जाना है।।१८६।।
ब्रह्ममुहूर्त हुआ यह निर्णय, हुआ क्रियान्वित प्रात: काल।
ब्रह्मचर्य व्रत सप्तमप्रतिमा, गुरु से ग्रहण करी तत्काल।।
देखो, यह वैâसा सुयोग है, योग मिलाया श्री भगवन्।
शरद पूर्णिमा जन्म दिवस है, वही रहा दीक्षा का दिन।।१८७।।
पुनर्जन्म प्राप्त कर मैना, नूतन जीवन शुरू किया।
गुरु चरणों के सन्निधान में, गृह का भी परित्याग किया।।
रोते रहे मोह के पुतले, पर मैना कुछ दिया न ध्यान।
बिन विरक्ति, मोह के त्यागे, हो नहिं सकता निज कल्याण।।१८८।।
चकाचौंध के इस युग में, जब नृत्य वासना करती है।
है आश्चर्य महा मैना, ब्रह्मचर्य को धारण करती है।।
वही वीर अति, वही धीर अति, कहती है उसकी गाथा।
बालयोगिनी उस मैना को, सभी नमाते हैं माथा।।१८९।।
जब प्रातकाल के आठ बजे, आचार्य संघ मण्डप आया।
तब श्रोताओं ने मैना को, श्वेत साटिका में पाया।।
हर श्रोता मन जिज्ञासा थी, कल का क्या परिणाम हुआ।
तब श्वेत साटिका ने सबकी, शंका को पूर्ण विराम दिया।।१९०।।
जनसमूह अति भारी था, कल की हलचल मन मची हुई।
मात-पिता, भाई-भगिनी, मन राग की मेंहदी रची हुई।।
पर मैना मन समता थी, ज्यों शांत सरोवर होता है।
शरद निशा का पूर्ण चंद्र, उसमें प्रतिबिम्बित होता है।।१९१।।
आचार्यश्री के प्रवचन का, नहिं शब्द छूटने पाता था।
कर्ण अंजलि से मन में, सीधा प्रवेश कर जाता था।।
मान सरोवर का हंसा, ज्यों मोती चुग सुख पाता है।
त्यों बालयोगिनी मैना को भी शब्द-शब्द मन भाता है।।१९२।।
जैसे ग्रह-नक्षत्र सभी, सूरज की परिक्रमा करते हैं।
वैसे ही व्रतधर्म आदि, ब्रह्मचर्य के भीतर रहते हैं।।
ब्रह्मचर्य तो अंक सदृश है, और सकल व्रत शून्य समान।
ब्रह्मचर्यबिन सकलव्रतादिक, रह जाते हैं शून्य प्रमाण।।१९३।।
ईसा सन् उन्नीस सौ बावन, असौज शुक्ल पूर्णिमा जान।
शरदपूर्णिमा पर्व स्वयं में, आज हो गया पर्व महान।।
बालयोगिनी मैना द्वारा, सदी बीस में पहला लेख।
लिखा गया इतिहास त्याग का, अब तक मिला न यह उल्लेख।।१९४।।
जैसी उत्तम भाव विशुद्धि, मैना के उर आई थी।
वैसी उज्ज्वल श्वेत साटिका, माता ने पहनाई थी।।
श्वेत साटिका धारे मैना, लगती सभा बीच ऐसे।
मानों कोई ज्योतिपुंज ही, उतरा हो भू-पर जैसे।।१९५।।
श्वेत साटिका धारे मैना, श्रीफल धारे युगल करों।
किया नमोऽस्तु, श्रीफल अर्पण, आचार्यश्री पावन चरणों।।
ब्रह्मचर्यव्रत-सप्तमप्रतिमा, गुरुवर मुझे प्रदान करें।
जगत्ताप-दुखदावानल से, हे गुरुवर उद्धार करें।।१९६।।
प्रवचन हुए समाप्त श्रीगुरु, सभाविसर्जित सभी प्रकार।
किन्तु खड़ा था आश लगाये, मैना का मोही परिवार।।
सूज रही थीं सबकी आँखें, रो-रो अश्रु बहाने से।
लेकिन पिघला नहीं हिमालय, राग की आग जलाने से।।१९७।।
अनुज रवीन्द्र दौड़कर पकड़ा, जीजी की धोती का छोर।
रोकर बोला अच्छी दीदी, चलो-चलो अब घर की ओर।।
पर पत्थर दिल लेश न पिघला, परिजन से मुँह मोड़ लिया।
वर्ष अठारह, बालयोगिनी, गृह से नाता तोड़ लिया।।१९८।।
हो निराश लौटे सब घर को, मैना-मैना रटन लगा।
लेकिन इस दुनिया के भीतर, कोई भी तो नहीं सगा।।
हमने जो सपना देखा था, अपनों से ही पूर्ण हुआ।
इस प्रकार मैना दीदी का, प्रथम व्रतोत्सव पूर्ण हुआ।।१९९।।