-प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी
श्री शांतिनाथ के समवसरण की, मंगलदीप प्रजाल के,
मैं आज उतारूँ आरतिया।
समवसरण के बीच प्रभू जी नासादृष्टि विराजे।
गणधर मुनि नरपति से शोभित, बारह सभा सुराजे।।प्रभु जी….
ओंकार ध्वनी, सुन करके मुनी, रत रहें स्वपर कल्याण में,
मैं आज उतारूँ आरतिया।।१।।
चार दिशा के मानस्तंभों को भी मेरा वंदन।
मिथ्यादृष्टि जिनको लखकर पाते सम्यग्दर्शन।।प्रभु जी…..
करके दर्शन, प्रभु का वन्दन, सम्यक् का हुआ प्रचार है,
मैं आज उतारूँ आरतिया।।२।।
ध्वजाभूमि के अन्दर देखो, ऊँचे ध्वज लहराएँ।
मालादिक चिन्हों से युत वे, जिनवर का यश गाएँ।। प्रभु जी…
शुभ कल्पवृक्ष, सिद्धार्थ वृक्ष, से समवसरण सुखकार है।
मैं आज उतारूँ आरतिया।।३।।
भवनभूमि के स्तूपों में, जिनवर बिंब विराजें।
द्वादशगण युत श्री मण्डप में, सम्यग्दृष्टि राजें।।प्रभु जी….
अगणित वैभव, युत बाह्य विभव से, शोभ रहें भगवान हैं,
मैं आज उतारूँ आरतिया।।४।।
धर्मचक्रयुत गंधकुटी पर, अधर प्रभू रहते हैं।
उनकी आरति से ही ‘‘चन्दनामती’’ कष्ट टलते हैं।। प्रभु जी…
प्रभु शान्तिनाथ के समवसरण की महिमा अपरंपार है।
मैं आज उतारूँ आरतिया।।५।।