-गणिनी ज्ञानमती
नमः श्रीवर्धमानाय, निर्धूतकलिलात्मने।
सालोकानां त्रिलोकानां, यद्विद्या दर्पणायते।।१।।
तीर्थंकर भगवन्तों को केवलज्ञान प्रगट होते ही, पृथ्वीतल से पाँच हजार धनुष-बीस हजार हाथ प्रमाण ऊपर आकाश में अधर पहुँच जाते हैं। उसी समय इंद्रों के आसन कंपित होते ही इन्द्र की आज्ञा से कुबेर अर्धनिमिष में आकाश में अधर ही समवसरण की रचना बना देता है। वही समवसरण भगवंतों की दिव्य उपदेश सभा है। तीर्थंकर भगवान की दिव्यध्वनि तीनों समय ६-६ घड़ी (२४ ² ६ · १४४ मिनट, १४४ ´ ६ · दो घंटे चौबीस मिनट) तक खिरती है। कहीं अर्धरात्रि में भी दिव्यध्वनि खिरने को मानने से चार बार दिव्यध्वनि खिरती है। समवसरण का विस्तृत विवेचन यहाँ चार ग्रन्थों से दिया जा रहा है।
तिलोयपण्णत्ति ग्रन्थ में समवसरण में चार परकोटे पाँच वेदिकाएँ मानी हैं। जिनके अंतराल में आठ भूमियाँ हैं।
१. चैत्यप्रासादभूमि, २. खातिकाभूमि, ३. लताभूमि, ४. उपवनभूमि, ५. ध्वजभूमि, ६. कल्पवृक्षभूमि ७. भवनभूमि और ८. श्रीमंडपभूमि।
आदिपुराण तथा हरिवंशपुराण में प्रथम चैत्यप्रासादभूमि का वर्णन न होने से सात भूमियाँ मानी हैं। संक्षेप में देखिए—
यथा— मानस्तम्भाः सरांसि प्रविमलजलसत्खातिका पुष्पवाटी।
प्राकारो नाट्यशाला द्वितयमुपवनं वेदिकान्तर्ध्वजाध्वा।।
सालः कल्पद्रुमाणां सपरिवृतवनं स्तूपहर्म्यावली च।
प्राकारः स्फाटिकोन्तर्नृसुरमुनिसभा पीठिकाग्रे स्वयंभूः।।१९२।।
अर्थ-संक्षेप में समवसरण की रचना इस प्रकार है—सबसे पहले (धूलीसाल के बाद) चारों दिशाओं में चार मानस्तम्भ हैं, मानस्तम्भों के चारों ओर सरोवर हैं, फिर निर्मल जल से भरी हुई परिखा है, फिर पुष्पवाटिका (लतावन) है, उसके आगे पहला कोट है, उसके आगे दोनों ओर दो-दो नाट्यशालाएँ हैं, उसके आगे दूसरा अशोक आदि का वन है, उसके आगे वेदिका है, तदनन्तर ध्वजाओं की पंक्तियाँ हैं, फिर दूसरा कोट है, उसके आगे वेदिका सहित कल्पवृक्षों का वन है, उसके बाद स्तूप और स्तूपों के बाद मकानों की पंक्तियाँ हैं, फिर स्फटिकमणिमय तीसरा कोट है, उसके भीतर मनुष्य, देव और मुनियों की बारह सभाएँ हैं तदनन्तर पीठिका है और पीठिका के अग्रभाग पर स्वयम्भू भगवान् अरहन्तदेव विराजमान हैं।।१९२।।
हरिवंशपुराण में धर्मचक्र का वर्णन है—
पीठानि त्रीणि भास्वन्ति चतुर्दिक्षु भवन्ति तु।
चत्वारि च सहस्राणि धर्मचक्राणि पूर्वके१।।१४०।।
वहाँ चारों दिशाओं में दैदीप्यमान तीन पीठ होते हैं, उनमें पहले पीठ पर चार हजार धर्मचक्र सुशोभित हैं। यहाँ यह अर्थ संगत नहीं होता है।
इसका अर्थ ऐसा प्रतीत होता है कि तीन पीठ—कटनी में से प्रथम पीठ—कटनी पर चार दिशा में एक-एक ऐसे चार धर्मचक्र रहते हैं जिनमें एक-एक धर्मचक्र में एक-एक हजार आरे होते हैं। तिलोयपण्णत्ति में कहा है—प्रथम पीठ-कटनी पर चारों दिशाओं में शिर पर धर्मचक्र को रखे हुए यक्षेन्द्र स्थित रहते हैं१।।’’
आदिपुराण में भी वर्णित है। यथा—
तां पीठिकामलं चक्रुरष्टमङ्गलसंपदः। धर्मचक्राणि चोढानि प्रांशु भिर्यक्षमूर्धभिः।।२९२।।
सहस्राराणि तान्युद्यद्रत्नरश्मीनि रेजिरे। भानुबिम्बानिवोद्यन्ति पीठिकोदयपर्वतात्।।२९३।।
अर्थ—उस पीठिका को अष्ट मंगलद्रव्यरूपी सम्पदाएँ और यक्षों के ऊँचे-ऊँचे मस्तकों पर रखे हुए धर्मचक्र अलंकृत कर रहे थे।।२९२।।
जिनमें लगे हुए रत्नों की किरणें ऊपर की ओर उठ रही हैं ऐसे हजार-हजार आराओं वाले वे धर्मचक्र ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानों पीठिकारूपी उदयाचल से उदय होते हुए सूर्य के बिम्ब ही हों।।२९३।।
इसी प्रकार इस समवसरण रचना के वर्णन में हरिवंशपुराण में तीनलोक स्तूप, मध्यलोक स्तूप आदि का वर्णन भी बहुत ही सुन्दर है। इसी पुराण में मूर्तिमती श्रुतदेवता का व लक्ष्मीदेवी का भी वर्णन आया है। यथा—स्थान आप पढ़ें। यह समवसरण की रचना आज पंचमकाल में यहाँ भरतक्षेत्र में नहीं है किन्तु आज भी यहाँ से २० करोड़ मील दूर विदेह क्षेत्र में श्रीसीमंधर भगवान का समवसरण विद्यमान है। हम और आप ऐसी भावना भाते रहें कि प्रभु सीमंधर स्वामी के समवसरण का दर्शन, भगवान की दिव्यध्वनि सुनने का सौभाग्य हमें भी प्राप्त होवे, इस भावना से अगले भव में निश्चित ही साक्षात् रूप में भगवान के दर्शन का लाभ प्राप्त होगा। इसी भावना के साथ समवसरण में विराजमान तीर्थंकर भगवंतों को, विद्यमान श्रीसीमंधर, युगमंधर आदि बीस तीर्थंकरों को अनंतानंत बार नमस्कार करती हूँ।