सांख्य-हमारे द्वारा मान्य अभेद एकांत में प्रकृति आदि तत्त्व प्रमेय बन जाते हैं क्योंकि सर्वत्र आविर्भाव-तिरोभाव के निमित्त से प्रधान का परिणाम संभव है।
जैन-यह आपका कथन भी असंगत है क्योंकि अभेदरूप एकांत के मानने पर तो आविर्भाव और तिरोभाव ही असंभव है, पुन: किससे परिणाम होगा। प्रकृति और पुरुष के भी अभाव का प्रसंग आ जावेगा और अर्थक्रिया भी नहीं बन सकेगी। अभेदैकांत में अर्थक्रिया संभव ही नहीं है क्योंकि उसमें (अभेद में) क्रम का अभाव है।
इस प्रकार से भेदैकांत के समान अभेदैकांत में भी प्रमेयत्व का होना असंभव है इसलिए परमार्थ से चेतन-अचेतनरूप सभी प्रमेय द्रव्य पर्यायात्मक ही हैं, यह बात सुस्थित हो गई।
उपसंहार-कारिका के इस उत्तरार्ध में प्रमाण का विषय बतलाया गया है। आचार्य ने इस बात को स्पष्ट किया है कि परमार्थ से चेतन, अचेतन रूप सभी द्रव्य पर्यायस्वरूप हैं और वे ही ज्ञान के विषय हैं। सांख्य केवल द्रव्य को ही मानता है, बौद्ध केवल पर्याय को मानता है और यौगादि द्रव्य-पर्याय को मानकर भी इन्हेंं परस्पर में अत्यंत भिन्न मानते हैं। आचार्य ने इन्हें समझाया है कि इस एकांत से इस प्रकार केवल द्रव्य या केवल पर्याय अथवा परस्पर में निरपेक्ष दोनों ही ज्ञान के विषय नहीं होते हैं। इनमें क्रम और अक्रम के न होने से अर्थ क्रिया असंभव है और अर्थक्रिया के बिना ज्ञान के विषय नहीं हो सकते हैं। चूँकि क्रम से युगपत् से कार्य आदि का होना अनेकांत में ही संभव है इसलिए अनेकांतात्मक वस्तु ज्ञान से जानी जाती है।
इतना कहने के अनंतर वैशेषिक ने और नैयायिक ने कहा कि हम लोगों ने द्रव्य और पर्याय में सर्वथा भेद माना है फिर भी वे ज्ञान से जाने जाते हैं। आचार्य ने कहा कि यह तुम्हारा कथन गलत है। पहले तो तुम्हारे द्वारा मान्य द्रव्य, गुण आदि परस्पर में भिन्न सिद्ध ही नहीं होते हैं। क्या कहीं उष्णत्व के बिना अग्नि का अस्तित्व दिख रहा है ? अत: जब तुम्हारे मान्य तत्त्व ही सिद्ध नहीं हैं तब वे ज्ञान के विषय वैâसे हो सकेंगे।चार्वाक ने भी अपने द्वारा मान्य भूतचतुष्टय को तो भिन्न मान करके उन्हें प्रमाण का विषय चाहा किन्तु आचार्य ने उसके मान्य भूतचतुष्टय को तो एक अजीव तत्त्व कह करके चेतन तत्त्व को अलग सिद्ध कर दिया और समझाया कि जब तुम्हारी मान्यता ही गलत है, तब तुम्हारे मान्य तत्त्व ज्ञान से वैâसे जाने जायेंगे।ब्रह्माद्वैतवादी ने और ज्ञानाद्वैतवादी ने तथा सांख्य ने एकांत से सभी तत्त्वों में अभेद सिद्ध करना चाहा किन्तु आचार्य ने स्पष्ट बतला दिया कि न तो अद्वैत तत्त्व ही सिद्ध है और न प्रकृति पुरुष का एकत्व ही सिद्ध है अत: अभेदैकांत के मान्य तत्त्व भी ज्ञान के विषय नहीं हैं प्रत्युत् द्रव्य पर्यायात्मक पदार्थ ही प्रमाण के विषय हैं, ऐसा समझना।
उत्थानिका-एकांत में अर्थक्रिया का विरोध ही है, इसी बात को और स्पष्ट करते हैं-
अन्वयार्थ-(नित्यक्षणिकपक्षयो:) नित्य और क्षणिक पक्ष में (अर्थ क्रिया न युज्येत) अर्थक्रिया घटित नहीं होती है, (सा) क्योंकि वह अर्थक्रिया (भावानां) पदार्थों में (क्रमाक्रमाभ्यां) क्रम और यौगपद्य के द्वारा (लक्षणतया मता) लक्षणरूप से मानी गई है।।१।।
अर्थ-नित्य और क्षणिक पक्ष में अर्थक्रिया घटित नहीं होती है क्योंकि वह अर्थक्रिया भावों-पदार्थों में क्रम यौगपद्य के लक्षण से मानी गई है।।१।।
तात्पर्यवृत्ति-कार्य को ‘अर्थ’ कहते हैं और ‘क्रिया’ का अर्थ है करना या निष्पन्न होना। चेतन-अचेतन पदार्थों को ‘भाव’ कहते हैं। ‘क्रम’ देश और काल से व्याप्त है, युगपत् को अक्रम कहते हैं। वस्तु को सर्वथा कूटस्थ मानना नित्य पक्ष है, सर्वथा अनित्य का दुराग्रह क्षणिक पक्ष कहलाता है। अभिप्राय यह हुआ कि नित्य और क्षणिक पक्ष में अर्थक्रिया असंभव है क्योंकि पदार्थों में क्रम-अक्रम का होना ही अर्थक्रिया है।