सांख्य-‘इन्द्रियवृत्ति: प्रमाणं’-इंद्रियों का व्यापार ही प्रमाण है।
जैन-प्रमाण का यह लक्षण भी असंभव है, क्योंकि अचेतन रूप होने से यह भी विशेष नहीं है सन्निकर्ष के समान। बात यह है कि इंद्रियों का व्यापार का आप क्या अर्थ करते हैं-उन्मीलन आदि व्यापार या संशयादि का निराकरण। प्रथम पक्ष में प्रमाणता नहीं है क्योंकि व्यभिचार दोष आता है, कहीं संशय आदि में भी इंद्रियों का उन्मीलन आदि व्यापार देखा जाता है। यदि संशयादि का निराकरण होना रूप दूसरा पक्ष लेते हो तब तो ‘ज्ञान ही प्रमाण है’ यह बात सिद्ध हो जाती है क्योंकि अज्ञान से संशयादि का निराकरण हो नहीं सकता है इसलिए इन्द्रियवृत्ति प्रमाण नहीं है। हाँ, इन्द्रियाँ ज्ञान की उत्पत्ति में कारण हैं इसलिए उपचार से प्रमाण हैं यह बात सर्वत्र मान्य ही है।