४५८ अकृत्रिम जिनमंदिर-तेरहद्वीप रचना में प्रथम जम्बूद्वीप में ७८ जिनप्रतिमाएँ हैं। उसे घेरकर लवण समुद्र है। उसे घेरकर धातकीखण्डद्वीप है। इसमें दक्षिण-उत्तर में १-१ इष्वाकार पर्वत हैं। अत: दो खण्ड हो गये।पूर्व धातकीखण्ड में विजयमेरु है एवं जंबूवृक्ष के स्थान पर धात्रीवृक्ष-आंवले का वृक्ष है। शेष सारी रचना जम्बूद्वीप के समान है। अत: यहाँ भी ७८ जिनमंदिर हैं।ऐसे ही पश्चिम धातकी खण्ड में बीच में अचलमेरु है। शेष रचना पूर्वधातकीखण्ड के समान होने से यहाँ भी ७८ जिनमंदिर हैं।
इस धातकीखण्ड को घेरकर कालोदधिसमुद्र है। इसे घेरकर पुष्करद्वीप है। इसके बीचों-बीच में मानुषोत्तर पर्वत है। अत: इस तरफ के आधे पुष्करद्वीप को पुष्करार्धद्वीप कहते हैं। इसमें भी दक्षिण-उत्तर में इष्वाकार नाम के दो पर्वत हैं।
इस निमित्त से वहाँ भी पूर्व पुष्करार्धद्वीप और पश्चिम पुष्करार्ध द्वीप दो भेद हो गये हैं।
पूर्व पुष्करार्ध में मंदरमेरु है और पश्चिम पुष्करार्ध में विद्युन्माली मेरु है एवं धातकी वृक्ष की जगह पुष्कर वृक्ष है। शेष रचना धातकीखण्ड के समान होने से यहाँ भी ७८-७८ जिनमंदिर हैं।
इस प्रकार ७८ को ५ से गुणा करने पर ७८²५·३९० तीन सौ नब्बे अकृत्रिम जिनमंदिर हो गये। पुनश्च धातकीखण्ड के २ इष्वाकार एवं पुष्करार्ध के २ इष्वाकार इन ४ पर्वतों के ४ जिनमंदिर तथा मानुषोत्तर पर्वत के ४ दिशाओं के ४ जिनमंदिर ये ३९०±४±४·३९८ अकृत्रिम जिनमंदिर ढाईद्वीप में हैं।
आगे चौथे, पाँचवें, छठे, सातवें द्वीप में जिनमंदिर नहीं है। पुन: आठवें नंदीश्वर द्वीप में चारों दिशाओं में क्रम से १३-१३ ऐसे १३²४·५२ जिनमंदिर हैं।
इसके आगे ९वें, १०वें द्वीप को छोड़कर ग्यारहवें द्वीप के बीच में कुण्डलवरपर्वत के ४ दिशाओं में ४ जिनमंदिर हैं।
इसके आगे १२वें को छोड़कर तेरहवें रुचकवर द्वीप के बीच में रुचकवर पर्वत पर चारों दिशाओं में १-१ ऐसे ४ मंदिर हैं।
इस प्रकार ढाई द्वीप के ३९८±आठवें द्वीप के ५२±ग्यारहवें द्वीप के ४±तेरहवें द्वीप के ४·४५८ (चार सौ अट्ठावन) ऐसे अकृत्रिम जिनमंदिर हैं।
यहाँ तेरहद्वीप की रचना में ८२१ देवभवनों के ८२१ जिनमंदिर में ८२१ जिनप्रतिमाएं हैं।
प्रत्येक जिनमंदिर में १०८-१०८ जिनप्रतिमाएँ होती हैं किन्तु यहाँ रचना में १-१ प्रतिमा विराजमान हैं, इसके प्रतीक में एक सिंहासन पर १०८ जिनप्रतिमाएँ विराजमान की गईं हैं।इस प्रकार स्वयं सिद्ध अकृत्रिम जिनप्रतिमाओं के समान यहाँ रचना में ४५८±८२१±१०८·ऐसी १३८७ सिद्धप्रतिमाएं विराजमान हैं।
१७० समवसरण-तेरहद्वीप रचना में ढाईद्वीप तक १७० कर्मभूमि हैं। जैसे कि जम्बूद्वीप में ३२ विदेह क्षेत्र व एक भरत क्षेत्र तथा एक ऐरावत क्षेत्र ऐसी ३४ कर्मभूमि हैं। आगे पूर्वधातकीखण्ड, पश्चिमधातकीखण्ड, पूर्व पुष्करार्ध और पश्चिम पुष्करार्ध में ३४-३४ कर्मभूमि होने से ३४²५·१७० कर्मभूमियाँ हो गई हैं। इन कर्मभूमियों के आर्यखण्डों में भगवान अजितनाथ के समय एक साथ १७० तीर्थंकर उत्पन्न हुए हैं। अत: यहाँ पर १७० कर्मभूमियों में १७० समवसरण बनाये गये हैं। ४ समवसरण ८-८ भूमि सहित हैं। शेष समवसरण गंधकुटी के रूप में हैं। सभी में समवसरण में चतुर्मुखी तीर्थंकरों के प्रतीक में ४-४ जिनप्रतिमाएं होने से १७०²४·६८० जिनप्रतिमाएँ तीर्थंकरों की विराजमान हैं।
अन्य जिनप्रतिमाएं-यहाँ तेरहद्वीप रचना में एक सिंहासन पर विदेह क्षेत्रों के विद्यमान श्री सीमंधर आदि २० तीर्थंकरों की २० प्रतिमाएं विराजमान हैं तथा एक सिंहासन पर श्री ऋषभदेव आदि २४ तीर्थंकर प्रतिमाएँ विराजमान हैं।पुन: ५ भरत क्षेत्र की ५ प्रतिमाएं, श्री शांतिनाथ, श्री मुनिचंद्रनाथ, श्री बाहु स्वामी, श्री विमलेन्द्रनाथ एवं श्री सुसंयतनाथ की ५ प्रतिमाएँ हैं। पाँच ऐरावत क्षेत्रों की श्री अनंतवीर्यनाथ, श्री सर्वनाथ, श्री हरिवासवनाथ, श्री मरुदेवनाथ एवं श्री स्वच्छनाथ ऐसे ५ भगवन्तों की ५ प्रतिमाएँ हैं।
तथा च-श्री ऋषभदेव, श्री सीमंधर स्वामी, श्री सुबाहुस्वामी एवं श्री वीरसेन स्वामी इनकी ४ प्रतिमाएँ एवं श्री अजितनाथ एवं श्री महावीर स्वामी की प्रतिमाएँ विराजमान हैं।
ये तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ ६८०±२०±२४±१६·७४० हैं।
इस प्रकार यहाँ तेरहद्वीप रचना में ४५८±८२१± १०८±६८०±२०±२४±५±५± ४±२·२१२७ जिनप्रतिमाएँ विराजमान हैं।
पुनश्च यहाँ भगवान ऋषभदेव की दीक्षा-कल्याणक की प्रतिमा, आहारदान की प्रतिमा, भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरनाथ की प्रतिमा आदि अन्य प्रतिमाएँ भी विराजमान हैं।
इन सभी जिनप्रतिमाओं को मेरा नमस्कार होवे।
इस प्रकार तेरहद्वीप रचना में पाँच मेरुपर्वत हैं, ४५८ जिनमंदिर हैं। ८२१ देवभवन हैं। १७० कर्मभूमि हैं, जिनमें १७० समवसरण हैं। ३० भोगभूमियाँ हैं। लवणसमुद्र व कालोदधि समुद्र में कुभोगभूमि के प्रतीक में कुछ कुभोगभूमिज मनुष्य दिखाये गये हैं। सुमेरुपर्वत आदि सभी पर्वतों के वर्ण शास्त्र के आधार से दिखाये गये हैं। पर्वतों के सरोवरों में कमलों पर श्री आदि देवियाँ दिखाई गई हैं। यथास्थान नदी, सरोवर, पर्वत, भोगभूमि, कर्मभूमि दिखाई गई हैं। नंदीश्वर द्वीप के अंजनगिरि आदि पर्वत भी शास्त्र के आधार से हैं।