तीन लोक १४ राजु ऊँचा, ७ राजू मोटा-गहरा है। चौड़ाई में नीचे ७ राजु चौड़ा, पुन: घटते हुए मध्य में १ राजु, पुन: बढ़ते हुए ब्रह्मस्वर्ग के पास (साढ़े तीन राजु ऊपर जाकर) ५ राजु, पुन: घटते हुए १ राजु हो गया है।
इसके ठीक बीच में कुछ कम १३ राजु ऊँची, १ राजु चौड़ी, १ राजु मोटी त्रसनाड़ी है।
अधोलोक-इसमें ७ राजु में १० भाग कीजिए। सबसे नीचे निगोद है। पुन: सातवें, छठे आदि ७ नरक हैं। पुन: दो भाग के नाम हैं-खरभाग, पंकभाग।
इन दोनों भागों में भवनवासी देवों के भवनों में ७,७२००००० जिनमंदिर हैं एवं व्यंतर देवों के भवनों में असंख्यात जिनमंदिर हैं।
अधोलोक से ऊपर के ७ राजु में २१ भाग कीजिए।
मध्यलोक-प्रथम भाग १ लाख योजन ऊँचा एवं १ राजु चौड़ा है, यही मध्यलोक है। इसी में असंख्यात द्वीप, समुद्रों में सर्वप्रथम द्वीप का नाम जम्बूद्वीप है एवं प्रथम समुद्र का नाम लवणसमुद्र है तथा अंतिम द्वीप का नाम स्वयंभूरमणद्वीप पुन: सबसे अंत में स्वयंभूरमण समुद्र है।
इसी मध्यलोक में तेरहद्वीपों तक ४५८ जिनमंदिर हैं। असंख्यात द्वीप-समुद्रों तक भवनवासी देवों के अगणित भवनपुर, आवास हैं। व्यंतर देवों के असंख्यात भवनपुर, आवास हैं। ये पर्वतों पर देवभवनों के रूप में हैं तथा समुद्र, नदी, सरोवर, वृक्ष आदि पर आवास बने हुए हैं। इन सभी में अगणित एवं असंख्यातों जिनमंदिर हैं।
सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र आदि ज्योतिषी देवों के भी मध्यलोक में असंख्यात विमानों में असंख्यात जिनमंदिर हैं।
इस मध्यलोक में ही ढाई द्वीपों तक तीर्थंकर, चक्रवर्ती, नारायण आदि महापुरुष होते हैं। मनुष्यों का अस्तित्व यहीं तक है। पशु, पक्षी, कीट, पतंगे आदि इस मध्यलोक में ही होते हैं।अर्हंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु, जिनधर्म, जिनागम, जिनचैत्य और जिनचैत्यालय ये नवदेवता इन ढाईद्वीपों में ही हैं। कृत्रिम जिनमंदिर, जिन-प्रतिमाएं, भूत, भविष्यत्, वर्तमानकाल की अपेक्षा अनंतानंत हैं। पंंचकल्याणक तीर्थ, सिद्धक्षेत्र एवं अतिशय क्षेत्र भी तीनकाल की अपेक्षा अनंतानंत हैं। अधोलोक एवं ऊर्ध्वलोक में केवल जिनचैत्य, चैत्यालय ये दो देवता ही हैं।
ऊर्ध्वलोक-मध्यलोक से ऊपर यह २० भागों में विभक्त है।
सौधर्म, ईशान आदि १६ स्वर्ग, दो-दो युगल एक साथ हैं, अत: ८ भागों में १६ स्वर्ग हैं। नव भागों में ९ ग्रैवेयक हैं। एक भाग में नव अनुदिश एवं एक भाग में पाँच अनुत्तर हैं। ऐसे १९ भागों में इन स्वर्ग, ग्रैवेयक आदि में ८४,९७०२३ जिनमंदिर हैं।
सिद्धशिला-ऊर्ध्वलोक में इक्कीसवें भाग में सिद्धशिला है। यह ४५ लाख योजन विस्तृत अर्धगोलक सदृश बीच में ८ योजन ऊँची ऐसी सिद्धशिला है।
ढाई द्वीप तक मानुषोत्तर पर्वत तक ही मनुष्यों का आवास है। यह ढाईद्वीप भी ४५ लाख योजन विस्तृत है। इसे मनुष्यलोक भी कहते हैं। यहीं से मनुष्य मुनि बनकर कर्मों का नाश कर मोक्ष प्राप्त करते हैं और एक समय में ऊर्ध्वगमन कर सिद्धशिला के ऊपर विराजमान हो जाते हैं।
सिद्धशिला के ऊपर सिद्ध भगवान हैं-
सिद्धशिला से ऊपर ३७०००००, ८६०००, ९७५ धनुष ऊपर जाकर ५२५ धनुष की उत्कृष्ट अवगाहना वाले सिद्ध भगवान विराजमान हैं। जैसे कि श्री बाहुबली ५२५ धनुष ऊँचे थे। एक धनुष में ४ हाथ होते हैं।
जघन्य अवगाहना वाले मनुष्य सिद्धशिला से ३७ लाख, ८७ हजार, ४९९ धनुष अर्ध हाथ प्रमाण ऊपर जाकर विराजमान हैं। मध्यम अवगाहना वाले उत्कृष्ट से नीचे और जघन्य के ऊपर अनेक अवगाहना से सहित हुए सिद्धशिला से ऊपर विराजमान हैं।
इन सभी सिद्ध भगवन्तों को मेरा अनंत-अनंतबार नमस्कार होवे।
तीनलोक के अकृत्रिम जिनमंदिर-तीनों लोकों में ७७२०००००±४५८±८४९७०२३·८५६९७४८१ अकृत्रिम जिनमंदिर हैं। ९२५ करोड़, ५३ लाख, २७ हजार, ९४८ जिनप्रतिमाएँ हैं। व्यंतर देव व ज्योतिष्क देवों के असंख्यात जिनमंदिर हैं। सभी में १०८-१०८ जिनप्रतिमाएँ हैं।
नवनिर्मित तीनलोक रचना-यहाँ जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर में नवनिर्मित तीनलोक रचना में अधोलोक में नारकी दिखाये गये हैं। इसी अधोलोक में प्रथम पृथ्वी के खरभाग और पंकभाग में भवनवासी के १० भेद व व्यंतर देवों के ८ भेदों के १-१ मंदिर ऐसे १०±८·१८ मंदिर स्थापित हैं। उन १८ प्रकार के इंद्रों के महल के आगे के प्रतीक में १८ चैत्यवृक्ष हैं। उनमें भी ४-४ प्रतिमाएँ विराजमान हैं।
मध्यलोक में-ढाईद्वीप में पाँच मेरु दिखाये गये हैं एवं श्री ऋषभदेव, शांतिनाथ आदि की प्रतिमाएँ विराजमान हैं। यहाँ मध्यलोक में मनुष्य और तिर्यंच दिखाये गये हैं। यहीं पर सूर्य, चंद्र, ग्रह, नक्षत्र व ताराओं के विमान दिखाये गये हैं।
मध्यलोक के ऊपर सोलह स्वर्गों में १-१ मंदिर हैं। सौधर्मेन्द्र के महल आदि बने हैं। इंद्र सभा बनाई गई हैं। चैत्यवृक्ष एवं मानस्तंभ तथा नीलांजना आदि नृत्यांगनाएँ हैं। यथास्थान इंद्र-इन्द्राणी, देव-देवियाँ दिखाये गये हैं।
इनसे ऊपर नवग्रैवेयक में ९ मंदिर, नव अनुदिश के ९ मंदिर एवं पाँच अनुत्तर के ५ मंदिर हैं। यथास्थान अहमिन्द्र दिखाये गये हैं।
अनंतर सिद्धशिला पर पद्मासन एवं खड्गासन सिद्धप्रतिमाएँ विराजमान हैं।
इस प्रकार यहाँ तीनलोक रचना में अधोलोक में १०±८·१८ मंदिर, मध्यलोक में पाँच मेरु में प्रतिमाएँ, मध्यलोक में प्रतिमाएँ एवं सूर्य, चंद्र में प्रतिमा विराजमान हैं। ऊर्ध्वलोक में १६±९±९±५·३९ मंदिर हैं। ऐसे १०±८±१६±९±९±५·५७ मंदिरों में प्रत्येक में ४-४ प्रतिमाएँ विराजमान हैं।
अधोलोक में १८ एवं १६ स्वर्गों में १६ ऐसे १८±१६·३४ चैत्यवृक्षों में ४-४ प्रतिमाएँ विराजमान हैं।
इस प्रकार ५७ मंदिर में ५७²४·२२८ पुन: ३४ चैत्यवृक्षों की ३४²४·१३६, मध्यलोक में मेरु की ४०±२ सूर्य, २ चंद्र की ४ तथा अन्य २८ प्रतिमाएँ एवं सिद्धशिला की ४ पद्मासन एवं ८ खड्गासन ऐसी १२ प्रतिमाएँ हैं। कुल मिलाकर २२८±१३६±४०±४±२८±१२· ४४८ प्रतिमाएँ यहाँ विराजमान हैं। इन सभी ४४८ जिनप्रतिमाओं को तीनलोक भ्रमण समापन हेतु मेरा मन, वचन, कायपूर्वक अनंत-अनंत बार नमस्कार होवे।