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जैन तीर्थ
अयोध्या
October 17, 2026
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vinarmamati- mataji
प्रथम दिवस का अर्ध्य
(1)
सदी बीसवीं की पहली तुम बालयोगिनी हो माता ।
बाराबंकी शहर सन् बावन से जुड़ा संयम नाता ॥
वहाँ के अतिशयकारी चन्द्रप्रभ जिनवर को है वन्दन ।
मैना से जो बनीं ज्ञानमति गणिनी माता को बन्दन ॥
दोहा
अर्घ्य समर्पण कर नमूँ, चन्द्रप्रभ जिनराज ।
पुनः अर्घ्य अर्पण करूँ, ज्ञानमती पद आज ।।
1. ॐ ह्रीं श्रीऋषभदेव-अजितनाथ-अभिनंदन – सुमति- अनंतनाथ जिनेंदेभ्य अर्घ्यंं…..
2. ॐ ह्रीं बाराबंकी अतिशयक्षेत्रस्य श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यंं…….
3. आचार्य शांतिसागर 4. “बीर सागर, 5.देशभूषणजी का अर्घ्य, 6.आ. भद्रबाहुका अर्घ्यं
7. ॐ ह्रीं बाराबंकी नगरे प्रथम गृहत्यागं कृत्वा शिवपथप्रदर्शिका गणिनीश्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यं…..
8. रत्नमती जी का अर्घ्यं
द्वितीय दिवस । प्रथम वर्षायोग
अर्घ्य – सन् 1953
(१)
महावीरजी अतिशय तीरथ पर पहली सुल्लिका बनी ।
सन् उन्निस सौ त्रेपन में देशभूषणाचार्य ने दीक्षा दी||
पुनः क्षुल्लिका वीरमती गुरु संग टिकैतनगर आईंं ।
पहला वर्षायोग हुआ पारस प्रभु की छाया पाई ।।
दोहा – अर्घ्य समर्पण कर नमूँ, वीर पार्श्व जिनराज’ |
पुनः अर्घ्य अर्पण करूँ, ज्ञानमती पद आज ॥
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजीचांदनपुर अतिशय क्षेत्रे विराजितश्रीमहावीर जिनेन्द्राय अर्घ्यंं…..
ॐ ह्रीं प्रथम चातुर्मासस्थल गणिनीश्री ज्ञानमती मातुः जन्मभूमि टिकैतनगरस्य जिनमन्दिरे विराजित अतिशयकारीश्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं.
आ.देशभूषणजी
ॐ ह्रीं प्रथमबालयोगिनी क्षुल्लिकाश्रीवीरमती मात्रे अर्घ्यं…
ॐ ह्रीं गणिनी प्रमुखश्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यं….
तृतीय दिवस | द्वितीय चातुर्मास
जयपुर का अर्घ्य
(2) सन् 1954
जयपुर में पाटोदी जिनमन्दिर का पावन धर्मस्थल है।
सन् उन्निस सौ चौवन में गुरुवर देशभूषण जी के संघ में ||
इस चौमासे में माता ने संस्कृत ज्ञानार्जन खूब किया।
कातंत्रव्याकरण को निज ज्ञान की नींव बना मजबूत किया ।
– दोहा –
अर्घ्य समर्पण कर नमूँ, मन्दिर के भगवान ।
पुनः अर्घ्य अर्पण करूँ, गुरु व मात पद आन ॥
ॐ ह्रीं द्वितीयचातुर्मासस्थल जयपुर महानगरस्य पाटोदी जिनमंदिरे विराजित सर्वजिन प्रतिमाभ्यः अर्घ्यं..
ॐ ह्रीं गणिनीश्रीज्ञानमतीमातुः सुल्लिका दीक्षागुरु-श्रीदेशभूषणाचार्य परमेष्ठिने अर्घ्यं.
ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुखश्रीज्ञानमतीमात्रे अर्घ्यं.
जयपुर खानिया चातुर्मास- अर्घ्य
सन् 1956
[4]
गुरु समाधि को देख क्षुल्लिका वीरमती वापस आईं ।
म्हसवड़ वर्षायोग समापन कर अगली निधियाँ पाई ॥
शांतिसिन्धु प्रेरणा मिली थी वीरसिन्धु से दीक्षा की।
अतः उन्हीं के चरण में जाकर प्रथम आर्यिका दीक्षा ली ||
राजस्थान के माधोराजपुरा में बीरसागर गुरु ने ।
शुभ वैशाख कृष्ण दुतिया थी सन् उन्निस सौ छप्पन में ।॥
लघुवय की सुकुमार योगिनी ज्ञानमती आर्यिका बनी ।
वर्षायोग हुआ छप्पन में जयपुर खानिया नाम था जिनका दानमती गगशा रखना नाम का ध्यान सदा गुरु से प्रथम शिक्षा पाई।
अक्षरशः आचार्यदेव की शिक्षा निज में अपनाई ॥ गुरु आज्ञावश उसी समय से मुनियों को भी पढ़ाती थीं।
अध्यापन को कह करके स्वाध्याय विनय दिखलातीधीं ॥३॥
दोहा – अर्घ्य समर्पण कर नमूँ, जिनवर गुरुवर पाद ।
पुनः अर्घ्य अर्पण करूं, ज्ञानमती पद आज ।॥५॥
1. ॐ ह्रीं माधोराजपुरानगरस्य जिनमंदिरे विराजित
मूलनायक श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्य
2. ॐ ह्रीं माधोराज पुरा नगरे, नवनिर्मित गणिनी ज्ञानमतीदीसातीर्थे विराजित पार्श्वनाथ जिनेन्द्रो समन्वित सम्मेद शिखर कृत्रिम सिद्ध –
क्षेकरी भाय अर्घ्य चतुर्थ चातुमीम स्थल
3. ॐ ह्रीं जयपुर खानियास्थित राणाजी नशियामंदिरे
विराजित समस्त जिनप्रतिमाभ्यः अर्घ्य
나. ॐ ह्रीं आर्थिका दीक्षाप्रदाता गुरुदेव चारित्रचूडामणिश्री वीरसागराचार्य परमेष्ठिने अर्घ्य –
5. ॐ ह्रीं श्वीवीरसागराचार्यस्य शिष्या आर्यिका श्री ज्ञानमतीमाले अध्यं
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मुनि श्री भावसागर महाराज जी
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