8.ॐ ह्रीं आर्यिका श्री रत्नमती मात्रे अर्घ्यं….
ॐ ह्रीं गणिनी प्रमुखश्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यं….
ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुख श्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यं….
6. ॐ ह्रीं श्री गणिनी ज्ञानमती मात्रे अर्घ्यं…..
5. ॐ ह्रीं श्री वीरसागराचार्यस्य शिष्या आर्यिका श्री ज्ञानमतीमात्रे अर्घ्यं…
5. ॐ ह्रीं गणिनी प्रमुखश्रीज्ञानमतीमात्रे अर्घ्यं..
3. ॐ ह्रीं अभीक्ष्णज्ञानोपयोग समन्वितायै गणिनीश्श्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यं..
4. ॐ ह्रीं गणिनी प्रमुख श्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यं..
ॐ ह्रीं गणिनीश्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यं..
5. ॐ ह्रीं गणिनी प्रमुखश्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यंं…
2. ॐ ह्रीं गणिनी प्रमुख श्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यंं…
3. ॐ ह्रीं श्री गणिनी प्रमुख ज्ञानमती मात्रे अर्घ्यं..
6. ॐ ह्रीं गणिनीश्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यंं….
3. ॐ ह्रीं गणिनीश्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यंं….
3. ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुख श्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यं…
3. ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुख श्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यं…
3. ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुख श्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यं…
3. ॐ ह्रीं षोडशकारण उपवास कर्ती आर्यिका पद्मावती मात्रे अर्घ्यं….
अजमेर के चातुर्मास बाद आर्यिका संघ का विहार हुआ
पीसांगन में कुछ दिन रहकर ब्यावर में शीत प्रवास रहा
आर्यिका रत्नमती माताजी अब ज्ञानमती संग चलती थीं।
अपनी चर्या के पालन में ही सदा सजग वे रहती थीं ||१||
2. ॐ ह्रीं गणिनी श्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यंं…
नवनिर्मित जम्बूद्वीप तीर्थ का परिसर सचमुच धन्य हुआ।
जहाँ मेरु सुदर्शन कल्पवृक्ष महावीर का मंदिर’ बना हुआ ।।
इस जम्बूद्वीप तीर्थ परिसर में प्रथम बार चौमास हुआ ।
सन् उन्निस सौ इक्यासी में उनतिसवां वर्षायोग हुआ ।।१।।
मानो यह धरती पर अपनी माँ का इन्तजार ही करती थी।
अपनी माता के पद में तभी वह पद प्रक्षालन करती थी ।।
आर्यिका रत्नमती माताजी का अभिनन्दन विद्वानों ने किया ।
माँज्ञानमती की जननी का मूल्यांकन विद्वानों ने किया 11211
उनके अभिनंदन ग्रन्थ छापने का संकल्प किया सबने ।
पूरे भारत से अपनी अपनी विनयांजलि भेजी सबने ॥
पूजा विधान जन्मोत्सव के संग सम्पन्न ये वर्षायोग हुआ।
नव तीर्थ का परिसर गुरुचरणों से पावन सुखद सुबोध रहा ॥३॥
अर्घ्य समर्पण कर नमूँ, जिनमंदिर जिननाथ ।
पुनः अर्घ्य अर्पण करूँ, ज्ञानमती पद आज 11811
1. ॐ ह्रीं एकोनत्रिंशत्तम चातुर्मासस्थल जम्बूद्वीप – हस्तिनापुर तीर्थस्य कमल मंदिरे विराजमान श्री महावीरस्वामिने अर्घ्यंं….
2. ॐ ह्रीं सुमेरु पर्वतस्य षोडशजिनालयस्थ जिनबिम्बेभ्यः अर्घ्यंं…..
3. ॐ हीं जम्बूद्वीपरचनानिर्माण प्रेरिका श्रीगणिनी ज्ञानमती मात्रे अर्घ्यंं….
सन् उन्निस सो व्यासी माता ने दिल्ली में चौमास किया।
तीसवां यह चातुर्मास लालमंदिर के निकट इतिहास रहा ॥
यहाँ लालकिले के ठीक सामने अतिथि भवन है बना हुआ।
गुरुभक्ति और श्रद्धा का वातावरण आज भी दिखे वहाँ ॥१॥
इस वर्षायोग के मध्य नई दिल्ली पहाड़गंज मंदिर में।
इन्द्रध्वज पाठ किया भक्तों ने ज्ञानमती माँ सन्निध में ।॥
अक्टूबर में फिक्की ऑडिटोरियम में सेमीनार हुआ।
सांसद राजीव गांधी ने उद्घाटन कर आशीष लिया ॥2॥
इस सन् में चार जून को पी. एम. इन्द्रागांधी जी आई।
उद्घाटन ज्ञानज्योति का कर आशीर्वाद ले हर्षाई।।
भारत के कोने-कोने में इस रथ से खूब प्रचार हुआ।
भूगोल जैन जाना सबने हस्तिनापुरी का विकास हुआ ॥३॥
अर्घ्य समर्पण कर नमूँ, जिनमंदिर जिननाथ ।
पुनः अर्घ्य अर्पण करूँ, ज्ञानमती पद आज ॥४।।
1. ॐ ह्रीं त्रिंशत्तमचातुर्मास स्थल,चांदनीचौक दिल्ली जिनमंदिरेषु विराजित समस्तजिनप्रतिमाभ्यः अर्घ्यंं….
2. ॐ ह्रीं गणिनीश्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यंं….
सन् उन्निस सौ तेरासी जम्बूद्वीप हस्तिनापुर पहुँचीं ।
इकतिसवाँ चातुर्मास आर्यिका संघ के साथ में हुआ यहीं ॥
लेखन व पठन-पाठन में रत श्री ज्ञानमती माताजी थीं।
भौगोलिक रचना जम्बूद्वीप का ध्यान हृदय में करती थीं ॥१||
जिनबिम्ब पंचकल्याण कराने का शुभ भाव हृदय आया।
गुरुओं के पास तब प्रतिनिधिमंडल आमंत्रण को भिजवाया ॥
आष्टान्हिक औ दशलक्षण में पूजा विधान का रंग छाया|
श्रीरत्नमती अभिनंदन ग्रंथ प्रकाशित होकर था आया ॥२||
कार्तिक पूर्णिमा महोत्सव पर यह ग्रंथ समर्पण बेला थी।
इसमें प्राचीन आर्यिकाओं पर अद्भुत लेखश्रृंखला थी ||
श्रीज्ञानमती माताजी की जननी का यह अभिनंदन था।
इस अभिनंदन में भारतीय संस्कृति का भी अभिनंदन था ॥३॥
अर्घ्य समर्पण कर नमूँ, जिनमंदिर जिननाथ ।
पुनः अर्घ्य अर्पण करूँ, ज्ञानमती पद आज ||४||
1. ॐ ह्रीं एकत्रिंशत् चातुर्मासस्थल जम्बूद्वीप – हस्तिनापुरतीर्थस्य जिनमंदिरेषु विराजित समस्त जिनप्रतिमाभ्यः अर्घ्यंं…..
2. ॐ ह्रीं गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती मात्रे अर्घ्यंं…
हस्तिनापुरी की पुण्यधरा पर जम्बूद्वीप की रचना है।
पर्वत नदियाँ चैत्यालय आदिक के निर्माण जहाँ चलते ॥
इन सबके पंचकल्याणक की तैयारी का अभियान जहाँ ।
चल रहा तथा माँ रत्नमती की सल्लेखना का कार्य जहाँ ॥
इन्द्राजी द्वारा उद्घाटित रथ का भी प्रवर्तन चलता था ।
श्रीज्ञानमती माता का चातुर्मास हस्तिनापुर में था ।
बत्तिसवेँ वर्षायोग में जम्बूद्वीप की चर्चा चलती थी ।
क्योंकि धरती पर प्रथम बार भौगोलिक कृति हुई निर्मित थी ॥२॥
अर्घ्य समर्पण कर नमूँ, जिनमंदिर जिननाथ ।
पुनः अर्घ्य अर्पण करूँ, ज्ञानमती पद आज ||३||
1. ॐ ह्रीं द्वात्रिंशत्तम चातुर्मास स्थल जम्बूद्वीप – हस्तिनापुर अतिशय क्षेत्रे विराजित समस्त जिन प्रतिमाभ्यः अर्घ्यंं..
2. ॐ ह्रीं गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती मात्रे अर्घ्यंं..
उन्निस सौ पचासी में इतिहास का स्वर्णिम पृष्ठ बना भूपर ।
करणानुयोग भूगोल रूप में दिखा विश्व को धरती पर ॥
तीनों लोकों में मध्यलोक का प्रथम द्वीप साकार हुआ ।
जो जम्बूद्वीप के नाम से जग को एक नया उपहार मिला ||१||
उत्तर प्रदेश सरकार ने भी उत्सव में पूर्ण सहयोग दिया ।
सम्पूर्ण देश से आने वाली जनता को संदेश दिया ।।
हुआ जम्बूद्वीप के जिनबिम्बों का पंचकल्याण महोत्सव था ।
फिर ज्ञानमती माताजी संघ का चातुर्मास महोत्सव था ।॥२॥
तेंतिसवें इस चौमासे में माताजी बहुत अस्वस्थ हुईं।
उन्निस सौ पचासी में फिर भी निज आयुकर्मवश स्वस्थ हुईं ॥
हम सबने वीर प्रभू से कहा इस माँ से धरा न सूनी हो।
भारत माता सम इस माता की प्रभा सदा दिन दूनी हो ॥३॥
अर्घ्य समर्पण कर नमूँ, जिनमंदिर जिननाथ।
पुनः अर्घ्य अर्पण करूँ, ज्ञानमती पद आज ||४||
1. ॐ ह्रीं त्रयस्त्रिंशत्तमचातुर्मास स्थल जम्बूद्वीप – हस्तिनापुर तीर्थे विराजित समस्त जिन प्रतिमाभ्यः अर्घ्यंं…
2. ॐ ह्रीं गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती मात्रे अर्घ्यंं..
श्री जम्बूद्वीप हस्तिनापुर में सन् उन्निस सौ, छियासी में ।
चौतिसवाँ चातुर्मास किया श्री ज्ञानमती माताजी ने “
ब्रह्मचारी श्री मोतीचंद का दीक्षा के लिए निवेदन था ।
आचार्य विमलसागर जी ने स्वीकार किया आमंत्रण था ||१||
जिनधर्म प्रभावन का झण्डा माता ने सदा लहराया है।
इस जम्बूद्वीप के चौमासे ने धर्म का पाठ पढ़ाया है||
इस वर्षायोग के मध्य मात ने कल्पदुम का पाठ रचा ।
जो शरदपूर्णिमा के दिन माता’ने लिखकर परिपूर्ण किया ।|२||
यह पंचमकाल की प्रथम कृती इस धरती का इतिहास बनी ।
हस्तिनापुरी की भूमी पर ही प्रथम विधान की रचना थी ॥
यह कल्पवृक्ष सम फल देने वाला पूजा का ग्रन्थ बना ।
चारों प्रकार के दान सहित यह चक्रवर्ति का विधान बना||३||
अर्घ्य समर्पण कर नमू – जिनमंदिर जिननाथ ।
पुनः अर्घ्य अर्पण करूँ, ज्ञानमती पद आज ॥४॥
1. ॐ ह्रीं चतुस्त्रिंशत्तमचातुर्मास स्थल जम्बूद्वीप – हस्तिनापुर तीर्थे विराजमान समस्त जिन प्रतिमाभ्यः अर्घ्यंं….
2. ॐ ह्रीं गणिनीश्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यंं….
सन् उन्निस सौ सत्तासी में दीक्षा मोतीचन्द जी की हुई।
वे क्षुल्लक मोतीसागर बन माता की सेवा में ही रहे ॥
फिर माता का पैंतिसवां चातुर्मास हस्तिनापुर में हुआ।
उन्निस सौ सत्तासी में जम्बूद्वीप का खूब प्रभाव बढ़ा ||१||
चौमासे में पूजन विधान के कई प्रभावक कार्य हुए ।
इन्द्रध्वज कल्पद्रुम व सर्वतोभद्र आदि विधान हुए||
भक्तों की भक्ति भावना से तीरथ का परिसर धन्य हुआ ।
श्रीज्ञानमती माताजी का जन्मोत्सव भी सम्पन्न हुआ ।॥२॥
अर्घ्य समर्पण कर नमूँ, जिनमंदिर जिननाथ ।
पुनः अर्घ्य अर्पण करूँ, ज्ञानमती पद आज ।।३||
1. ॐ ह्रीं पञ्चत्रिंशत्तम चातुर्मास स्थल जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर तीर्थक्षेत्रे विराजमान समस्तजिनप्रतिमाभ्यः अर्घ्यंं….
2. ॐ ह्रीं गणिनी श्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यं..
सन् उन्निस सौ अट्ठासी में छत्तिसवाँ चातुर्मास हुआ ।
श्री गणिनी ज्ञानमती माता का जम्बूद्वीप प्रवास हुआ ।।
माता के ज्ञान- ध्यान की बातें सारे देश में चलती थीं।
इसलिए देशभर की जनता दर्शन को आया करती थी ||१||
हस्तिनापुरी का कण कण यूँ भी युग की आदि से पावन है।
श्रीशांति कुंथुः अरनाथ प्रभु की मूर्ति जहाँ मनभावन है।
तीनों जिनवर के चार- चार कल्याणक धरा को वन्दन है।
इस धरा को ज्ञानमती माता ने बना दिया नन्दन वन है ॥२||
अर्घ्य समर्पण कर नमूँँ, जिनमन्दिर जिननाथ ।
पुनः अर्घ्य अर्पण करूँ, ज्ञानमती पद आज ॥३॥
1. ॐ ह्रीं षट्त्रिंशत्तमचातुर्मासस्थल जम्बूद्वीप – हस्तिनापुरतीर्थे विराजमान समस्तजिनप्रतिमाभ्यः अर्घ्यं..
2. ॐ ह्रीं गणिनी श्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यंं….
उन्निस सौ नवासी जम्बूद्वीप में सैंतिसवां चौमास हुआ ।
श्रीज्ञानमती माँ का ससंघ ‘हस्तिनापुरी में प्रवास रहा ॥
संघस्थ माधुरी की दीक्षा इस चातुर्मास’ के मध्य हुई ।
श्रावण शुक्ला ग्यारस को वे चन्दनामती “आयिका हुई ||१||
श्री ज्ञानमती माता के हाथों प्रथम आर्यिका दीक्षा थी’ ।
जिनने बचपन से ही पाई इन गणिनी माँ से शिक्षा थी ।।
यह मानव निर्मित स्वर्ग हस्तिनापुर का जम्बूदीप कहा।
उत्तरप्रदेश शासन ने इसको प्रमुख पर्यटन केन्द्र कहा ॥२||
अर्घ्य समर्पण कर नमूँ, जिनमंदिर जिननाथ ।
पुनः अर्घ्य अर्पण करूँ, ज्ञानमती पद पद आज ॥३॥
1. ॐ ह्रीं सप्तत्रिंशत्तमचातुर्मास स्थल जम्बूद्वीप – हस्तिनापुर तीर्थे विराजमान समस्तजिनप्रतिमाभ्यः अर्घ्यं..
2. ॐ ह्रीं गणिनी श्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यंं….
इसवी सन् उन्निस सौ नब्बे में अड़तिसवाँ चौमास हुआ।
श्री ज्ञानमती गणिनी माता का जम्बूद्वीप प्रवास हुआ।
सन् नब्बे में श्रेयांससागर मुनि पंचम पट्टाचार्य बने ।
दस जून लोहारिया राजस्थान में संघ चतुर्विधके मधि में ॥१॥
ईसवी सन् उन्निस सौ न्वासी चौमासा जम्बूद्वीप हुआ ।
फिर उसके बाद विहार सरधना और बड़ौत की ओर हुआ ।।
इस लघु विहार के बाद जनवरी नब्बे में वापस आई ।
हस्तिनापुरी की धरा पुनः माता को पाकर हरपाई||२||
चारित्रचक्रवर्ती गुरुवर की प्रतिनिधि ज्ञानमती माँ है’।
ये वीरसिन्धु की शिष्या एवं सन्तों की दात्री माँ हैं ॥
श्री जम्बूद्वीप का प्रथम पंचवर्षीय महोत्सव किया गया ।
उत्तरप्रदेश के राज्यपाल का स्वागत भी वहाँ किया गया ॥3॥
अतिशायी कमल जिनालय पर कलशारोहण भी किया गया |
श्री पंचकल्याणक प्रतिष्ठा ह्रीं के भगवन्तों की हुई यहाँ ।
जिनधर्म खूब चमका प्रभावना सर्वोदय शासन की हुई।
उस जिनशासन को नमन करूँ जिसमें ये मात महान हुई॥४॥
अर्घ्य समर्पण कर नमूँ, जिनमंदिर जिन नाथ ।
पुनः अर्घ्य अर्पण करूँ, ज्ञानमती पद आज ।। ५॥
1. ॐ ह्रीं अष्टत्रिंशत् चातुर्मास स्थल जम्बूद्वीप हस्तिनापुर तीर्थे विराजमान समस्त जिनप्रतिमाभ्यः अर्घ्यंं…
2. ॐ ह्रीं गणिनीश्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यंं…
सन् उन्निस सौ इक्यानवे में उनतालिसवाँ चौ मास किया।
सरधना नगर के भक्तों ने माता के ज्ञान का लाभ लिया ॥
सर्वतोभद्र मण्डल विधान दशलक्षण पर्व में हुआ वहाँ ।
माताजी की अट्ठावनवां जन्मोत्सव मना विशाल वहाँ ||१||
शिक्षण व प्रशिक्षण शिविरों से जन जन में इक जागृति आई।
शासन व प्रशासन के लोगों ने भी गुरुचरण की रज पाई ॥
मुनिचर्या ग्रन्थ विमोचन से सब साधु संघ को लाभ मिला।
गौतम गणधर के प्रतिक्रमण का अतिप्राचीन है पाठ मिला ||२||
सरधना का सबसे बड़ा जिनालय पद्मप्रभ जिनमंदिर है।
लश्कर गंज गांधीनगर व खारा कुंआ आदि में भी प्रभुमंदिर हैं।
हर मंदिर के दर्शन करके भक्तों को प्रवचन लाभ दिया ।
गणिनी श्री ज्ञानमती माता का सबने अति सम्मान किया ।।३।।
अर्घ्य समर्पण कर नमूँ, जिनमंदिर जिननाथ ।
पुनः अर्घ्य अर्पण करूँ, ज्ञानमती पद आज||४||
1. ॐ ह्रीं एकोनचत्त्वारिंशत् चातुर्मास स्थल सरधना नगरस्य जिन मन्दिरेषु विराजमान समस्त जिनप्रतिमाभ्यः अर्घ्यंं…
2. ॐ ह्रीं गणिनीश्री ज्ञानमती मात्रे अर्घ्यंं…
2. ॐ ह्रीं गणिनी ज्ञानमतीमात्रे अर्घ्यंं…
2.ॐ ह्रीं गणिनीश्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यंं…
2. ॐ ह्रीं गणिनी श्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यंं….
2. ॐ ह्रीं गणिनीश्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यंं….
2. ॐ ह्रीं गणिनीश्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यंं….
4. ॐ ह्रीं गणिनीश्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यंं….