१. गिरनार की यात्रा कौन कर सकता है?
२. माता ज्ञानमती द्रव्यलिंग से नारी, पर भाव से पुरुषोत्तम वेद।
३. गिरनार से शंत्रुजय आगमन।
४. श्वेताम्बर जिनालयों के बीच दि.जैन मंदिर की शोभा।
५. यात्राकाल में दो श्वेताम्बर साध्वियों से वार्तालाप।
६. शंत्रुजय से ब्यावर आगमन।
७. ब्यावर में माताजी द्वारा संघस्थ साधुओं को अध्यापन।
८. संघ का अजमेर आगमन।
९. माताजी द्वारा ऐलक पन्नालाल ग्रंथमाला के हस्तलिखित ग्रंथों का अवलोकन।
१०. माताजी द्वारा हर क्षण का ज्ञानार्जन में सदुपयोग।
नौ हजार नौ सौ निन्यानूं, भू से गिरि-शिख तक सोपान।
नौ चौकौ यदि पढ़ें पहाड़ा, तो होते छत्तीस प्रमाण।।
जो जग से छत्तीस बन रहें, वे ही चढ़ सकते गिरनार।
वे ही जन उत्तम पद पाते, करते अष्ट कर्म रिपु क्षार।।३५०।।
माताजी श्री ज्ञानमती में, सकल योग्यता पाते हम।
द्रव्यलिंग से वे नारी हैं, किन्तु भाव से पुरुषोत्तम।।
दृढ़संकल्प-धीरता-साहस, ज्ञान-ध्यान-तप-समताभाव।
सघनरूप से अविचल रहते, ज्ञानतरू माता की छाँव।।३५१।।
सिद्धक्षेत्र श्री गिरनारी को, सबने सविनय नमन किया।
सिद्धक्षेत्र श्री शत्रुंजय को, सकल संघ ने गमन किया।।
जिनालयों का गढ़ शत्रुंजय, पालीताना नाम शहर।
साढ़े तीन हजार श्वेत में, एक दिगम्बर जिनमंदिर।।३५२।।
जैसे मणिमाला के मध्य में, शोभित होता है लॉकिट।
वैसे सबमें शोभा पाता, जैन दिगम्बर मंदिर इक।।
अर्जुन-भीम-युधिष्ठिर-पांडव, आठ करोड़ द्रविड़ राजा।
मोक्ष पधारे शत्रुंजय से, स्मृति हो जाती ताजा।।३५३।।
पर्वत के सोपानों ऊपर, चढ़ती जातीं ज्ञानमती।
जल से पूर्ण घड़े ले जाती, संघ श्वेताम्बर दो साध्वी।।
क्या उपयोग करोगी जल का, प्यास सताती बारम्बार।
पर्वत ऊपर जल नहिं मिलता, इससे कर लेतीं उपचार।।३५४।।
चर्या योग्य आपकी ही है, मोक्षमार्ग भी सही वही।
पर श्वेती अपवाद मार्ग से, मोक्ष मिलेगा पता नहीं।।
श्रम से चढ़तीं सोपानों पर, पहुंचीं बढ़ा-बढ़ा पग एक।
मन मयूर हो गया प्रफुल्लित, जिनमंदिर समूह को देख।।३५५।।
द्वितिय टोंक पर शोभित है इक, श्री दिगम्बर जिनमंदिर।
पाण्डव चरण, वेदिकाएँ नौ, राजित हैं उसके अंदर।।
मुख्य वेदिका पर राजित हैं, शांतिनाथ जिनदेव ललाम।
क्रम-क्रम पावन श्री चरणों में, माताजी ने किया प्रणाम।।३५६।।
श्री दिगम्बर जैन जिनालय, श्वेतों मध्य लगे इस भाँति।
जैसे मुख में जीभ अकेली, मध्य रहे बत्तीसों दाँत।।
सिद्धक्षेत्र सबके मन भाया, किया प्रवास दिवस दो-चार।
वापस राजस्थान पहुँचने, सकल संघ ने किया विहार।।३५७।।
इसी बीच श्री माताजी को, आये बहुतेरे अंतराय।
फलत: तन दुर्बलता आई, तदपि रहा मन धर्मोत्साह।।
आगमसम्मत चर्या पालन, माताजी मन मुदित किया।
संघ साथ में दीर्घ गमन भी, अप्रमत्त सम्पन्न किया।।३५८।।
जैसे सरिता बढ़ती क्रमश:, जाती पहुँच लक्ष्य सागर।
वैसे धर्मध्वजा फहराता, आचार्यसंघ पहुँचा ब्यावर।।
नशिया चम्पालाल सेठ जी, मुनि संघ का रहा प्रवास।
ऐलक पन्ना भवन सरस्वती, संघ आर्यिका जी का वास।।३५९।।
हार्दिकता से किया निवेदन, ब्यावर जैन समाज सभी।
चातुर्मासिक धर्मलाभ हो, करुणा धन आचार्यश्री।।
आचार्यश्री शिवसागर जी ने, किया निवेदन सोच-विचार।
द्रव्य-क्षेत्र अनुकूल देखकर, चातुर्मास किया स्वीकार।।३६०।।
पूज्य आर्यिका ज्ञानमती ने, प्राप्त आज्ञा श्री आचार्य।
किये अध्यापित संघस्थों को, राजवार्तिक-गोम्मटसार।।
जिनग्रंथों को श्रीगुरु मुख से, पढ़ा नहीं आर्यिका श्री।
उन्हें स्वत: ही आत्मसात् कर, ज्ञान दिया अन्यों को भी।।३६१।।
स्वाध्याय कर तत्व समझना, यद्यपि यह भी कार्य कठिन।
स्वयं समझ, पर को समझाना, है अति दुष्कर संप्रेषण।।
पर माताजी ज्ञानमती की, शैली सब को भाती थी।
पन्नालाल सदृश विज्ञों की, खूब प्रशंसा पाती थी।।३६२।।
धन्य धन्य माताजी तुमको, तुम दुष्कर को किया सरल।
जड़मति को जिनमति में बदला, राजमल्ल को किया कमल।।
अभीक्ष्ण ज्ञानयोगिनी माता, हर पल का करतीं उपयोग।
अध्ययन करतीं या कि करातीं, लिखती, लखतीं आतम योग।।३६३।।
दिन का क्षण-क्षण व्यर्थ ना जाता, रहता ज्ञान समर्पित क्रम।
अर्द्धरात्रि तक करतीं माता, हस्तलिखित शास्त्रों में श्रम।।
ऐलक पन्नालाल जी द्वारा, स्थापित सरस्वती सदन।।
हस्तलिखित शास्त्रों का माता, करतीं निशि में अवलोकन।।३६४।।
इत: पूर्व खानिया जयपुर, बनी निषद्या वीर निधि।
चरण पादुका हुईं स्थापित, संघे सन्निधि यथाविधि।।
चातुर्मास हुआ निष्ठापित, आचार्य संघ ने करी न देर।
जयपुर मानस्तंभ प्रतिष्ठा, करके संघ पहुँचा अजमेर।।३६५।।