—सोरठा—
दोष अनंतानंत, त्रिभुवन जन में व्याप्त हैं।
आप किया उन अंत,भक्ति भाव से मैं नमूं।।१।।
—भुजंगप्रयात छंद—
क्षुधा व्याधि पीड़ा करे सर्व जन को।
ये आहार संज्ञा हरें घातिहर जो।।
प्रभो केवली के असाता उदय भी।
फले सौख्य में मैं नमूँ नित उन्हें ही।।१।।
तृषा वेदना से पिपासित सभी हैं।
प्रभो आपने स्वात्म अमृत पिया है।।
इसे नाशने हेतु प्रभु को नमूँ मैं।
सदा साम्य पीयूष रुचि से चखूँ मैं।।२।।
महा दोष भीती सभी को सतावे।
प्रभू ने सभी भय डराकर भगाये।।
नमूँ सात भय नाश हेतू तुम्हीं को।
भजूँ सात उत्तम परं स्थान ही को।।३।।
महा क्रोध अग्नी दहे सर्व जग को।
प्रभू ने महाशांति से नाशा उसको।।
इसी क्रोध आश्रित सभी दोष आते।
नमूँ आप को क्रोध को मूल नाशें।।४।।
चिता से अधिक दु:ख चिंता करे है।
तनू स्वास्थ्य को हर महा दुख भरे है।।
इसे मूल से आपने नष्ट कीना।
नमूँ मैं न चिंता कभी हो हृदय मा।।५।।
जरा जर्जरी देह करके सुखावे।
इसे नाश कर मूल से सौख्य पावें।।
प्रभो केवली आपको ही नमूँ मैं।
इसे नाश के स्वात्म सुख को भजूँ मैं।।६।।
सदा राग संसार में ही भ्रमावे।
प्रभो आपमें राग मुक्ती दिलावे।।
तथापी तुम्हीं ने सभी राग नाशे।
नमूँ भक्ति से तो अशुभ राग भागे।।७।।
महा मोह सम्राट से सब दुखी हैं।
इसे मूल से प्रभु उखाड़ा सुखी हैं।।
इसी मोह को नाश हेतू नमूँ मैं।
महा ध्वांत हर ज्ञान ज्योती भजूँ मैं।।८।।
करोड़ों भरे रोग इस देह में हैं।
प्रभू रोग को नाश करके सुखी हैं।।
विविध भांति के रोग नित कष्ट देते।
तुम्हें वंदते ये मुझे छोड़ देते।।९।।
महामल्ल मृत्यू ने त्रैलोक्य जीता।
इसे जीत तुम मुक्ति लक्ष्मी गृहीता।।
नमें आपको सर्व दुख के जयी हों।
वही लोक में शीघ्र मृत्युंजयी हों।।१०।।
पसीना न तन में प्रभू आप के हो।
प्रभो केवली आपके ये नहीं हो।।
इसे मूल से जो हरें वीतरागी।
उन्हीं को नमूँ मैं बनूं सौख्यभागी।।११।।
प्रभो! एक क्षण में त्रयी लोक लोका।
नहीं ‘‘खेद’’ श्रम रंच भी आपको था।।
विषादो महादोष जीता तुम्हीं ने।
नशे दोष मेरा नमूँ भक्ति से मैं।।१२।।
महामद कहें आठ विध या असंख्यें।
उन्हीं से लहें नीचगति जीव सब ये।।
हरें मान उनको सभी इंद्र वंदे।
नमूँ आपको सर्वमद को विखंडे।।१३।।
रती दोष से प्रीति हो इष्ट पर में।
इसे नाश निज में धरी प्रीति प्रभु ने।।
प्रभू केवली प्रीति नाहीं किसी में
तथापी जगत हित करो नित नमूँ मैं।।१४।।
कुतूहलमयी विश्व को देख करके।
करें जोऽतिविस्मय हरें पूर्ण सुख वे।।
सभी कर्मकृत फेर आश्चर्य वैâसा।
नमूँ भक्ति से सौख्य हो आप जैसा।।१५।।
जो निद्रा के वश वो स्वयं को न देखें।
निजातम दरश पूर्ण को रोक ले ये।।
इसे नष्टकर सर्व जग को विलोका।
नमूँ मैं दरश प्राप्त होवे प्रभू का।।१६।।
अनंतों दफे जन्म धर-धर दु:खी मैं।
न हो जन्म फिर से करूँ यत्न वो मैं।।
तुम्हीं ने पुनर्जन्म नाशा जगत में।
अत: नित नमूं तुम चरण नाथ अब मैंं।१७।।
अरतिदोष से आकुलित चित्त होवे।
इसे नाशकर आपने कर्म धोये।।
यही दोष मुझको सदा दु:ख देता।
नमूँ आपको ये भगे शीघ्र भीता।।१८।।
—शंभु छंद—
इन दोष अठारह ने जग में, सबको दुख दे दे वश्य किया।
इनसे बच सका नहीं कोई इन त्रिभुवन में अधिपत्य किया।।
जो इनको जीते वे ‘जिनेन्द्र’, सौ इंद्रों से वंदित जग में।
‘सज्ज्ञानमती’ देवें मुझको, हर दोष भरें गुण वे मुझमें।।१९।।