(श्री यतिवृषभाचार्य विरचित-तिलोयपण्णत्ति ग्रंथ से)
णवमो महाधियारो
सिद्धों के निवास स्थान, अवगाहना,सुख एवं भावना का सुंदर वर्णन—
निवास क्षेत्र का वर्णन
उम्मग्गसंठियाणं भव्वाणं मोक्खमग्गदेसयरं।
पणमिय संतिजिणेसं वोच्छामो सिद्धलोयपण्णत्तिं१।।१।।
सिद्धाण णिवासखिदी संखा ओगाहणाणि सोक्खाइं।
सिद्धत्तहेदुभाओ सिद्धजगे पंच अहियारा।।२।।
अट्ठमखिदीए उवरिं पण्णासब्भहियसत्तयसहस्सा।
दंडाणिं गंतूणं सिद्धाणं होदि आवासो।।३।।
पणदो छप्पण इगिअडणहचउसगचउखचदुरअडकमसो।
अट्ठहिदा जोयणया सिद्धाण णिवासखिदिमाणं।।४।।
८४०४७४०८१५६२५
८
।णिवासखेत्तं गदं।
संख्या का वर्णन
तीदसमयाण संखं अडसमयब्भहियमासछक्कहिदा।
अडहीणछस्सयाहदपरिमाणजुदा हुवंति ते सिद्धा।।५।।
अ । ५९२
मा ६ स ८
।संखा गदा।
अवगाहना का वर्णन
पणकदिजुदपंचसया ओगाहणया धणूणि उक्कस्से।
आउट्ठहत्थमेत्ता सिद्धाण जहण्णठाणम्मि।।६।।
७
५२५ ह
२
तणुवादबहलसंखं पणसयरूवेहि ताडिदूण तदो।
पण्णरसदेहि भजिदे उक्कस्सोगाहणं होदि।।७।।
१५७५ !५००! ५२५
१५००
तणुवाद बहलसंखं पणसयरूवेहि ताडिदूण तदो।
णवलक्खेिंह भजिदे जहण्णमोगाहणं होदि।।८।।
१५७५ । ५०० ७
९००००० २
लोयविणिच्छयगंथे लोयविभागम्मि सव्वसिद्धाणं।
ओगाहणपरिमाणं भणिदं िंकचूणचरिमदेहसमो।।९।।
पाठान्तरम्।
दीहत्तं बाहल्लं चरिमभवे जस्स जारिसं ठाणं।
तत्तो तिभागहीणं ओगाहण सव्वसिद्धाणं।।१०।।
पण्णसुत्तरतिसया उक्कस्सोगाहणं हवे दंडं।
तियभजिदसत्तहत्था जहण्णओगाहणं ताणं।।११।।
पाठान्तरम्।
३५० । ह ७/३
तणुवादपवणबहले दोहिं गुणिणयेण भजिदम्मि।
जं लद्धं सिद्धाणं उक्कसोगाहणं ठाणं।।१२।।
२२५० / १५७५ / ५००/१ / एदेण तेरासिलद्धं २ / १५७५ / ३५०।
तणुवादस्स य बहले छस्सयपण्णत्तरीहि भजिदम्मि।
जं लद्धं सिद्धाणं जहण्णओगाहणं होदि।।१३।।
१३५००००० । १५७५ । २००० । १। तेरासिएण सिद्धं १५७५ ७
६७५ ३
पाठान्तरम्।
अवरुक्कस्संमज्झिमओगाहरणसहिदसिद्धजीवाओ।
होंति अणंता एक्केणोगाहिद खेत्तमज्झम्मि।।१४।।
माणुसलोयपमाणे संठियतणुवादउवरिमे भागे।
सरिस सिरा सव्वाणं हेट्ठिमभागम्मि विसरिसा केई।।१५।।
जावद्धं गंदव्वं तावं गंतूण लोयसिहरम्मि।
चेट्ठंति सव्वसिद्धा पुह पुह गयसित्थमूसगब्भणिहा।।१६।।
ओगाहणा गदा।
सुख का वर्णन
णिरुवमरूवा णिट्ठियकज्जा णिच्चा णिरंजणा णिरुजा।
णिम्मलबोधा सिद्धा णिरुवं जाणंति हु एक्कसमएणं।।१७।।
।सोक्खं सम्मत्तं।
भावना का वर्णन
जह चिरसंचिदिंमधणमणलो पवणाहदो लहुं डहदि।
तह कम्मिंधणमहियं खणेण झाणाणलो दहइ।।१८।।
जो खविदमोहकलुसो विसयविरत्तो मणो णिरुंभित्ता।
समवट्ठिदो सहावे सो पावइ णिव्वुदीसोक्खं।।१९।।
जस्स ण विज्जदि रागो दोसो मोहो व जोगपरिकम्मो।
तस्स सुहासुहदहणो झाणमओ जायदे अगणी।।२०।।
दंसणणाणसमग्गं झाणं णो अण्णदव्वसंसत्तं।
जायदि णिज्जरहेदू सभावसहिदस्स साहुस्स।।२१।।
जो सव्वसंगमुक्को णण्णमणो अप्पणो सहावेणे।
जाणदि पस्सदि आदं सो सगचरियं चरदि जीओ।।२२।।
णाणम्मि भावणा खलु कादव्वा दंसणे चरित्ते य ।
ते पुण आदा तिण्णि वि तम्हा कुण भावणं आदे।।२३।।
अहमेक्को खलु सुद्धो दंसणणाणप्पगो सदारूवी।
ण वि अत्थि मज्झि िंकचि वि अण्णं परमाणुमेत्तं पि।।२४।।
णत्थि मम कोइ मोहो बुज्झो उवजोगमेवमहमेगो।
इह भावणाहि जुत्तो खवेइ दुट्ठट्ठकम्माणिं।।२५।।
णाहं होमि परेसिं ण मे परे संति णाणमहमेक्को।
इदि जो झायदि झाणे सो मुच्चइ अट्ठकम्मेहिं।।२६।।
चित्तविरामे विरमंति इंदिया तेसु विरदेसुं।
आदसहावम्मि रदी होदि पुढं तस्स णिव्वाणं।।२७।।
णाहं देहो ण मणो ण चेव वाणी ण कारणं तेिंस।
एवं खलु जो भाओ सो पावइ सासयं ठाणं।।२८।।
देहो व मणो वाणी पोग्गलदव्वप्पगो त्ति णिद्दिट्ठं।
पोग्गलदव्वं पि पुणो िंपडो परमाणुदव्वाणं।।२९।।
णाहं पोग्गलमइओ ण दे मया पुग्गला कुदा िंपडं।
तम्हा हि ण देहो हं कत्ता वा तस्स देहस्स।।३०।।
एवं णाणप्पाणं दंसणभूदं अिंददियमहत्थं।
धुवममलमणालंबं भावेमं अप्पयं सुद्धं।।३१।।
णाहं होमि परेसिं ण मे परे संति णाणमहमेक्को।
इदि जो झायदि झाणे सो अप्पाणं हवदि झादा।।३२।।
जो एवं जाणित्ता झादि परं अप्पयं विसुद्धप्पा।
अणुवममपारविसयं सोक्खं पावेदि सो जीओ।।३३।।
णाहं होमि परेसिं ण मे परे णत्थि मज्झमिह किं पि।
एवं खलु जो भावइ सो पावइ सव्वकल्लाणं।।३४।।
उड्ढोधमज्झलोए ण मे परे णत्थि मज्झमिह किंचि।
इह भावणाहि जुत्तो सो पावइ अक्खयं सोक्खं।।३५।।
मदमाणमायरहिदो लोहेण विवज्जिदो य जो जीवो।
णिम्मलसहावजुत्तो सो पावइ अक्खयं ठाणं।।३६।।
परमाणुपमाणं वा मुच्छा देहादिएसु जस्स पुणो।
सो ण वि जाणदि समयं सगस्स सव्वागमधरो वि।।३७।।
तम्हा णिव्वुदिकामो रागं देहेसु कुण्दि मा किंचि।
देहविभिण्णो अप्पा झायव्वो इंदियादीदो।।३८।।
देहत्थो देहादो किंचूणो देहवज्जिओ सुद्धो।
देहायारो अप्पा झायव्वो इंदियातीदो।।३९।।
झाणे जदि णियआदा णाणादो णावभासदे जस्स।
झाणं होदि ण तं पुण जाण पमादो हु मोहमुच्छा वा।।४०।।
गयसित्थ मूसगब्भायारो रयणत्तयादिगुणजुत्तो।
णियआदा झायव्वो खयरहिदो जीवघणदेसो।।४१।।
जो आदभावणमिणं णिच्चुवजुत्तो मुणी समाचरदि।
सो सव्वदुक्खमोक्खं पावइ अचिरेण कालेणं।।४२।।
कम्मे णोकम्मम्मि य अहमिदि अहयं च म्मणोकम्मं।
जायदि सा खलु बुद्धी सो हिंडह गरुवसंसारं।।४३।।
जो खविदमोहकम्मो विसयविरत्तो मणो णिरुंभित्ता।
समवट्ठिदो सहावे सो मुच्चइ कम्मणिगलेहिं।।४४।।
पयडिट्ठिदिअणुभागप्पदेसबंधेहि वज्जिओ अप्पा।
सो हं इदि िंचतेज्जो तत्थेव य कुणह थिरभावं।।४५।।
केवलणाणसहावो केवलदंसणसाहवो सुहमइओ।
केवलविरियसहाओ सो हं इदि िंचतए णाणी।।४६।।
जो सव्वंसंगमुक्को झायदि अप्पाणमप्पणो अप्पा।
सो सव्वदुक्खमोक्खं पावइ अचिरेण कालेणं।।४७।।
जो इच्छदि णिस्सरिदुं संसारमहण्णवस्स रुद्दस्स।
सो एवं जाणित्ता परिझायदि अप्पयं सुद्धं।।४८।।
पडिकमणं पडिसरणं पडिहरणं धारणा णियत्ती य।
णिंदणगरुहणसोही लब्भंति णियादभावणए।।४९।।
जो णिहदमोहगंठी रायपदोसे वि खविय सामण्णे।
होज्जं समसुहदुक्खो्र सो सोक्खं अक्खयं लहदि।।५०।।
ण जहदि जो दु ममत्तं अहं ममेदं ति देहदविणेसुं।
सो मूढो अण्णाणी बज्झदि दुट्ठट्ठकम्मेिंह।।५१।।
पुण्णेण होइ विहओ विहवेण मओ मएण मइमोहो।
महमोहेण य पावं तम्हा पुण्णो वि वज्जेज्जो।।५२।।
परमट्ठबाहिरा जे ते अण्णाणेण पुण्णमिच्छंति।
संसारगमणहेदं विमोक्खहेदुं अयाणंता।।५३।।
ण हु मण्णदि जो एवं णत्थि विसेसो त्ति पुण्णपावाणं।
हिंडदि घोरमपारं संसारं मोहसंछण्णो।।५४।।
मिच्छत्तं अण्णाणं पावं पुण्णं चएवि तिविहेणं।
सो णिच्चयेण जोई झायव्वो अप्पयं सुद्धं।।५५।।
जीवो परिणमदि जदा सुहेण असुहेण व सुहो असुहो।
सुद्धेण तहा सुद्धो हवदि हु परिमाणसब्भाओ।।५६।।
धम्मेण परिणदप्पा (अप्पा) जदि सुद्धसंपजोगजुदो।
पावइ णिव्वाणसुहं सुहोवजुत्तो य सग्गसुहं।।५७।।
असुहोदएण आदा कुणरो तिरियो भवीय णेरइयो।
दुक्खसहस्सेहिं सदा अभिद्दुदो भमइ अच्चंतं।।५८।।
अदिसयमादसमुत्थं विसयातीदं अणोवममणंतं।
अव्वुच्छिण्णं च सुहं सुद्धुवजोगप्पसिद्धाणं।।५९।।
रागादिसंगमुक्को दहइ मुणी सेयझाणझाणेणं।
किंम्मधणसंघाये अणेयभवसंचयं खिप्पं।।६०।।
जो संकप्पवियप्पो तं कम्मं कुणदि असुहसुहजणणं।
अप्पासभावलद्धी जाव ण हियये परिफुरइ।।६१।।
बंधाणं च सहावं विजाणिदुं अप्पणो सहावं च।
बंधेसु जो ण रज्जदि सो कम्मविमोक्खणं कुणइ।।६२।।
जाव ण णेदि विसेसंतरं तु आदासवाण दोण्हं पि।
अण्णाणी ताव दु सो विसयादिसु वट्टदे जीवो।।६३।।
ण वि परिणमदि ण गेण्हदि उप्पज्जदि ण परदव्वपज्जाए।
णाणी जाण्ांतो वि हु पोग्गलदव्वं अणेयविहं।।६४।।
जो परदव्वं तु सुहं असुहं व मण्णदे विमूढमईंं।
सो मूढो अण्णाणी बज्झदि दुट्ठट्ठकम्मेहिं।।६५।।
एवं भावणा सम्मत्ता।
अन्त्य मंगल
केवलणाणदिणेसं चोत्तीसादिसयभूदिसंपण्णं।
अप्पसरूवम्मि ठिदं कुंथुजिणेसं णमंसामि।।६६।।
संसारण्णवमहणं तिहुवणभवियाण मोक्ख संजणणं।
संदरिसियसयलत्थं अरजिणणाहं णमंसामि।।६७।।
भव्वजणमोक्खजणणं मुिंणददेिंवदणमिदपयकमलं।
अप्पसुहं संपत्तं मल्लिजिणेसं णमंसामि।।६८।।
णिट्ठवियघाइकम्मं केवलणाणेण दिट्ठसयलट्ठं।
णमह मुणिसुव्वएसं भवियाणं सोक्खदेसयरं।।६९।।
घणघाइकम्ममहणं मुिंणददेिंवदपणदपयकमलं।
पणमह णमिजिणणाहं तिहुवणभवियाण सोक्खयरं।।७०।।
इंदसयणमिदचलणं आदसरूवम्मि सरवकालगदं।
इंदियसोक्खविमुक्कं णेमिजिणेसं णमंसामि।।७१।।
कमठोपसग्गदलणं तिहुयणभवियाण मोक्खदेसयरं।
पणमह पासजिणेसं घाइचउक्कं विणासयरं।।७२।।
एस सुरासुरमणुसिंदवंदिदं धोदघाइकम्ममलं।
पणमामि वड्ढमाणं तित्थं धम्मस्स कत्तारं।।७३।।
जयउ जिणविंरदो कम्मबंधा अबद्धो,
जयउ जयउ सिद्धो सिद्धिमग्गासमग्गो।
जयउ जयअणंदो सूरिसत्थो पसत्थो,
जयउ जयदि वण्णीण उग्गसंघो य विग्घो।।७४।।
पणमह चउवीसजिणे तित्थयरे तत्थ भरहखेत्तम्मि।
भव्वाणं भवदुक्खं िंछदंते णाणपरसूहिं।।७५।।
पणमह जिणवरवसहं गणहरवसहं तहेव गुणवसहं।
दट्ठूणपरिसवसहं जदिवसहं धम्मसुत्तपाढए वसहं।।७६।।
चुण्णिस्सरूवछक्करणसरूवपमाण होइ किं जं तं(?)।
अट्ठसहस्सपमाणं तिलोयपण्णत्तिणामाए।।७७।।
एवमाइरियपरंपरागयतिलोयपण्णत्तीए सिद्धलोय-
सरूवणिरूवणपण्णत्ती णाम णवमो
महाधियारो समत्तो।।९।।
उन्मार्ग में स्थित भव्यों को मोक्षमार्ग का उपदेश करने वाले शान्ति जिनेन्द्र को नमस्कार करके सिद्धलोक प्रज्ञप्ति को कहते हैं।।१।।
सिद्धों की निवासभूमि, संख्या, अवगाहना, सौख्य और सिद्धत्व के हेतुभूत भाव, ये सिद्धलोक में पांच अधिकार हैं।।२।।
आठवीं पृथिवी के ऊपर सात हजार पचास धनुष जाकर सिद्धों का आवास है।।३।।
सिद्धों के निवास क्षेत्र का प्रमाण अंकक्रम से आठ से भाजित पांच, दो, छह, पांच, एक, आठ, शून्य, चार, सात, चार, शून्य, चार और आठ इतने योजन है।।४।।
८४०४७४०८१५६२५
८
निवास क्षेत्र समाप्त हुआ।
संख्या का वर्णन
अतीत समयों की संख्या में छह मास और आठ समय का भाग देकर आठ कम छह सौ अर्थात् पांच सौ बानवै से गुणा करने पर जो प्राप्त हो उतने सिद्ध हैं।।५।।
अतीत समय ´ ६ मास, ८ स. ² ५९२ · सब सिद्ध।
संख्या का कथन समाप्त हुआ।
अवगाहना का वर्णन
इन सिद्धों की उत्कृष्ट अवगाहना पांच के वर्ग से युक्त पांच सौ अर्थात् पांच सौ पच्चीस धनुष और जघन्य अवगाहना साढ़े तीन हाथ प्रमाण है।।६।।
उत्कृष्ट ५२५ ध., जघन्य ७/२ हाथ
तनुवात के बाहल्य की संख्या को पांच सौ रूपों से गुणा करके पन्द्रह सौ का भाग देने पर जो लब्ध आवे उतना उत्कृष्ट अवगाहना का प्रमाण होता है।।७।। पाठान्तर।
त. वा. १५७५ ² ५०० ´ १५०० · ५२५ धनुष।
तनुवात के बाहल्य की संख्या को पांच सौ रूपों से गुणा करके नौ लाख का भाग देने पर जघन्य अवगाहना का प्रमाण होता है।।८।।
१५७५ ² ५०० ´ ९०००००· ७/८ धनुष · ३-१/२ हाथ।
लोकविनिश्चय ग्रंथ में लोकविभाग में सब सिद्धों की अवगाहना का प्रमाण कुछ कम चरम शरीर के समान कहा है।।९।। पाठान्तर।
अन्तिम भव में जिसका जैसा आकार,दीर्घता और बाहल्य हो, उससे तृतीय भाग से कम सब सिद्धों की अवगाहना होती है।।१०।।
सिद्धों की उत्कृष्ट अवगाहना तीन सौ पचास धनुष और जघन्य अवगाहना तीन से भाजित सात हाथ प्रमाण है।।११।।
पाठान्तर।
उ.३५० ध.। ज. ७/३ हा.।
तनुवात पवन के बाहल्य को दो से गुणित कर नौ का भाग देने पर जो लब्ध आवे, उतना सिद्धों की उत्कृष्ट अवगाहना का स्थान होता है।।१२।।
१५७५ ² २ ´ ९ · ३५० धनुष।
तनुवात के बाहल्य में छह सौ पचहत्तर का भाग देने पर जो लब्ध आवे उतनी सिद्धों की जघन्य अवगाहना होती है।।१३।।
१५७५ ´ ६७५ · ७/३ · २- १/३ ध.।
एक जीव से अवगाहित क्षेत्र के भीतर जघन्य,उत्कृष्ट और मध्यम अवगाहना से सहित अनन्त सिद्ध जीव होते हैं।।१४।।
मनुष्य लोक प्रमाण स्थित तनुवात के उपरिम भाग में सब सिद्धों के सिर सदृश होते हैं। अधस्तन भाग में कोई विसदृश होते हैं।।१५।।
जितना मार्ग जाने योग्य है उतना जाकर लोकशिखर पर सब सिद्ध पृथक्- पृथक् मोम से रहित मूषक के अभ्यन्तर आकाश के सदृश स्थित हो जाते हैं।।१६।।
अवगाहना का कथन समाप्त हुआ।
सुख का वर्णन
अनुपम स्वरूप से संयुक्त, कृतकृत्य, नित्य, निरंजन, नीरोग और निर्मल बोध से युक्त सिद्ध एक ही समय में समस्त पदार्थों को सदैव जानते हैें।।१७।।
सौख्य का कथन समाप्त हुआ।
भावना का वर्णन
जिस प्रकार चिरसंचित ईंधन को पवन से आहत अग््िना शीघ्र ही जला देती है, उसी प्रकार ध्यानरूपी अग््िना अधिक कर्मरूपी ईंधन को क्षणमात्र में जला देती है।।१८।।
जो दर्शनमोह और चारित्रमोह को नष्टकर विषयों से विरक्त होता हुआ मन को रोककर आत्मस्वभाव में स्थित होता है, वह मोक्ष सुख को प्राप्त करता है।।१९।।
जिसके राग, द्वेष, मोह ओर योगपरिकर्म (योगपरिणति) नहंीं हैं उसके शुभाशुभ (पुण्य-पाप) को जलाने वाली ध्यानमय अग््िना उत्पन्न होती है।।२०।।
शुद्ध स्वभाव से सहित साधु का दर्शन-ज्ञान से परिपूर्ण ध्यान निर्जरा का कारण होता है, अन्य द्रव्यों से संसक्त वह निर्जरा का कारण नहीं होता है।।२१।।
जो अन्तरङ्ग, बहिरङ्ग सर्व संग से रहित और अनन्यमन अर्थात् एकाग्रचित्त होता हुआ अपने चैतन्य स्वभाव से आत्मा को जानता व देखता है वह जीव आत्मीय चारित्र का आचरण करता है।।२२।।
ज्ञान, दर्शन और चारित्र में भावना करना चाहिये। चूंकि वे तीनों (दर्शन, ज्ञान और चारित्र) आत्मस्वरूप हैं इसीलिए आत्मा में भावना को करो।।२३।।
मैं निश्चय से सदा एक, शुद्ध, दर्शन-ज्ञानात्मक और अरूपी हूँ। मेरा परमाणु मात्र भी अन्य कुछ नहीं है।।२४।।
मोह मेरा कोई नहीं है, एक ज्ञान-दर्शनोपयोगरूप ही मैं जानने योग्य हूँ; ऐसी भावना से युक्त जीव दुष्ट आठ कर्मों को नष्ट करता है।।२५।।
न मैं पर पदार्थों का हूँ और न पर पदार्थ मेरे है, मैं तो ज्ञानस्वरूप अकेला ही हूँ; इस प्रकार जो ध्यान में िंचतन करता है वह आठ कर्मों से मुक्त होता है।।२६।।
चित्त के शान्त होने पर इन्द्रियां शान्त होती हैं और उन इन्द्रियों के शान्त होने पर आत्मस्वभाव में रति होती है। पुनः इससे उसे स्पष्टतया निर्वाण प्राप्त होता है।।२७।।
न मैं देह हूँ, न मन हँ, न वाणी हूँ और न उनका कारण ही हूँ। इस प्रकार जो भाव है वह शाश्वत स्थान को प्राप्त करता है।।२८।।
देह के समान मन और वाणी पुद्गल द्रव्यात्मक पर हैं, ऐसा कहा गया है। पुद्गल द्रव्य भी परमाणु द्रव्यों का पिण्ड है।।२९।।
न मैं पुद्गलमय हूँ और न मैंने उन पुद्गलों को पिण्डरूप (स्कन्धरूप) किया है। इसीलिये न मैं देह हूँ और न उस देह का कर्ता ही हूँ।।३०।।
इस प्रकार ज्ञानात्मक, दर्शनभूत, अतीन्द्रिय, महार्थ, नित्य, निर्मल और निरालम्ब शुद्ध आत्मा का चिन्तन करना चाहिये।।३१।।
न मैं पर पदार्थों का हूं और न पर पदार्थ मेरे हैं, मैं तो ज्ञानमय अकेला हूँ, इस प्रकार जो ध्यान में आत्मा का चिन्तन करता है, वह ध्याता हेै।।३२।।
जो विशुद्ध आत्मा इस प्रकार जानकर उत्कृष्ट आत्मा का ध्यान करता है वह जीव अनुपम और अपार विषयिक अर्थात् अनन्तचतुष्टयात्मक सुख को प्राप्त करता है।।३३।।
न मैं पर पदार्थों का हूं और न पर पदार्थ मेरे हैं, यहाँ मेरा कुछ भी नहीं है; इस प्रकार जो भावना भाता है वह सब कल्याण को पाता हेै ।।३४।।
यहाँ ऊर्ध्वलोक, अधोलोक और मध्यलोक में मेरे पर पदार्थ कोई नहीं हैं, यहां मेरा कुछ भी नहीं हैं। इस प्रकार की भावनाओं से युक्त वह जीव अक्षय सुख को पाता है।।३५।।
जो जीव मद, मान व माया से रहित; लोभ से वर्जित और निर्मल स्वभाव से युक्त होता है वह अक्षय स्थान को पाता है।।३६।।
जिसके परमाणु प्रमाण भी देहादिक में राग है वह समस्त आगम का धारी होकर भी अपने समय को नहीं जानता है।।३७।।
इसलिए मोक्ष के अभिलाषी पुरुष को देह में कुछ भी राग न करके देह से भिन्न अतीन्द्रिय आत्मा का ध्यान करना चाहिये।।३८।।
देह में स्थित, देह से कुछ कम, देह से रहित, शुद्ध देहाकार और इन्द्रियातीत आत्मा का ध्यान करना चाहिये।।३९।।
जिस जीव के ध्यान में यदि ज्ञान से निज आत्मा का प्रतिभास नहीं होता है तो वह ध्यान नहीं है। उसे प्रमाद, मोह अथवा मूर्छा ही जानना चाहिये।।४०।।
मोम से रहित मूषक के (अभ्यन्तर ) आकाश के आकार, रत्नत्रयादि गुणों से युक्त, अविनश्वर और जीवघनदेशरूप निज आत्मा का ध्यान करना चाहिये।।४१।।
जो साधु नित्य उद्योगशील होकर इस आत्मभावना का आचरण करता है, वह थोड़े समय में सब दुःखों से छुटकारा पा लेता है।।४२।।
कर्म और नोकर्म में ‘मैं हूंं ’ तथा मैं कर्म नोकर्म रूप हूं; इस प्रकार जो बुद्धि होती है उससे यह प्राणी महान् संसार में घूमता है।।४३।।
जो मोहकर्म (दर्शनमोह और चारित्रमोह) को नष्टकर विषयों से विरक्त होता हुआ मन को रोककर स्वभाव में स्थित होता है, वह कर्मरूपी सांकलों से छूट जाता है।।४४।।
जो प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश बन्ध से रहित आत्मा है वही मैं हूँ, इस प्रकार चिन्तन करना चाहिए और उसमें ही स्थिर भाव को करना चाहिये।।४५।।
जो केवलज्ञान व केवलदर्शन स्वभाव से युक्त, सुखस्वरूप और केवल वीर्यस्वभाव है वही मैं हूँ, इस प्रकार ज्ञानी जीव को विचार करना चाहिए।।४६।।
जो जीव सर्व संग से रहित होकर अपनी आत्मा का आत्मा के द्वारा ध्यान करता है, वह थोड़े ही समय में समस्त दुःखों से छुटकारा पा लेता है।।४७।।
जो भयानक संसाररूपी महासमुद्र से निकलने की इच्छा करता है वह इस प्रकार जानकर शुद्ध आत्मा का ध्यान करता है।।४८।।
निजात्म भावना से प्रतिक्रमण, प्रतिसरण, प्रतिहरण, धारणा, निवृत्ति, निन्दन, गर्हण और शुद्धि को प्राप्त करते हेैं।।४९।।
जो दर्शन मोहरूप ग्रन्थि को नष्ट कर श्रमण अवस्था में राग-द्वेष का क्षपण करता हुआ सुख-दु:ख में समान हो जाता है वह अक्षय सुख को प्राप्त करता है।।५०।।
जो देह और धन में क्रमशः ‘अहम्’और ‘ममेदं’ इस प्रकार के ममत्व को नहीं छोड़ता है वह मूर्ख अज्ञानी दुष्ट आठ कर्मों से बंधता है।।५१।।
चूंकि पुण्य से विभव,विभव से मद, मद से मतिमोह और मतिमोह से पाप होता है; इसलिये पुण्य को भी छोड़ना चाहिये।।५२।।
जो परमार्थ से बाहर है वे संसारगमन और मोक्ष के हेतु को न जानते हुए अज्ञान से पुण्य की इच्छा करते है।।५३।।
पुण्य और पाप में कोई भेद नहीं है, इस प्रकार जो नहीं मानता है वह मोह से युक्त होता हुआ घोर एवं अपार संसार में घूमता है।।५४।।
मिथ्यात्व, अज्ञान, पाप और पुण्य, इनका (मन, वचन, काय) तीन प्रकार से त्याग करके योगी को निश्चय से शुद्ध आत्मा का ध्यान करना चाहिये।।५५।।
परिणामस्वभावरूप जीव जब शुभ अथवा अशुभ परिणाम से परिणमता है तब शुभ अथवा अशुभ होता है और जब शुद्ध परिणाम से परिणमता है तब शुद्ध होता है।।५६।।
धर्म से परिणत स्वरूप आत्मा यदि शुद्ध उपयोग से युक्त होता है तब निर्वाण सुख को और शुभोपयोग से युक्त होकर स्वर्गसुख को प्राप्त करता है।।५७।।
अशुभोदय से यह आत्मा कुमानुष, तिर्यंच और नारकी होकर सदा अचिन्त्य हजारों दुःखों से पीड़ित होकर संसार में अत्यन्त घूमता है।।५८।।
शुद्धोपयोग से उत्पन्न अरहन्त और सिद्ध जीवों को अतिशय, आत्मोत्थ, विषयातीत, अनुपम, अनन्त और विच्छेद रहित सुख प्राप्त होता है।।५९।।
रागादि परिग्रह से रहित मुनि शुक्लध्यान नामक ध्यान से अनेक भवों में संचित किये हुए कर्मरूपी ईंधन के समूह को शीघ्र जला देता है ।।६०।।
जब तक हृदय में आत्मस्वभावलब्धि प्रकाशमान नहीं होती तब तक जीव संकल्पविकल्परूप शुभ-अशुभ को उत्पन्न करने वाला कर्म करता है ।।६१।।
जो बन्धों के स्वभाव को और आत्मा के स्वभाव को जानकर बन्धों में अनुरंजायमान नहीं होता है वह कर्मों के मोक्ष को करता है।।६२।।
जब तक आत्मा और आस्रव इन दोनों के विशेष अन्तर को नहीं जानता है तब तक वह अज्ञानी जीव विषयादिकों में प्रवृत्त रहता है ।।६३।।
ज्ञानी जीव अनेक प्रकार के पुद्गल द्रव्य को जानता हुआ परद्रव्यपर्याय से न परिणमता है, न ग्रहण करता है और न उत्पन्न होता है।।६४।।
जो मूढ़मति परद्रव्य को शुभ अथवा अशुभ मानता है वह मूढ़ अज्ञानी होकर दुष्ट आठ कर्मों से बंधता हेै।।६५।।
इस प्रकार भावना समाप्त हुई।
अन्त्य मंगल
जो केवलज्ञानरूप प्रकाश युक्त सूर्य हैं, चौंतीस अतिशयरूप विभूति से सम्पन्न और आत्मस्वरूप में स्थित हैं, उन कुंथु जिनेन्द्र को नमस्कार करता हूँ।।६६।।
जो संसार-स्ामुद्र का मथन करने वाले और तीनों लोकों के भव्य जीवों को मोक्ष के उत्पादक हैं तथा जिन्होंने सकल पदार्थों को दिखला दिया है ऐसे अर जिनेन्द्र को नमस्कार करता हूं।।६७।।
जो भव्य जीवोें के लिये मोक्ष प्रदान करने वाले हैं, जिनके चरण-कमलों में मुनीन्द्र और देवेन्द्रों ने नमस्कार किया है और जो आत्मसुख को प्राप्त कर चुके हैं, उन मल्लि जिनेन्द्र को नमस्कार करता हूं।।६८।।
जो घातिकर्म को नष्ट करके केवलज्ञान से समस्त पदार्थों को देख चुके हैं और जो भव्य जीवों को सुख का उपदेश करने वाले हैं, ऐसे मुनिसुव्रतस्वामी को नमस्कार करो।।६९।।
घनघातिकर्मों का मथन करने वाले,मुनीन्द्र और देवेन्द्रों से नमस्कृत चरण-कमलों से संंयुक्त तथा तीनों लोकों के भव्य जीवों को सुखदायक, ऐसे नमि जिनेन्द्र को नमस्कार करो।।७०।।
सैकड़ों इन्द्रोें से नमस्कृत चरणों वाले,सब काल आत्मस्वरूप में स्थित और इन्द्रिय सुख से रहित,ऐसे नेमि जिनेन्द्र को नमस्कार करता हूँ।।७१।।
कमठकृत उपसर्ग को नष्ट करने वाले, तीनों लोकों सम्बन्धी भव्यों के लिये मोक्ष के उपदेशक और घातिचतुष्टय के विनाशक पार्श्व जिनेन्द्र को नमस्कार करो।।७२।।
जो इन्द्र,धरणेन्द्र और चक्रवर्तियों से वंदित, घातिकर्मरूपी मल से रहित और धर्म-तीर्थ के कर्त्ता हैं, उन वर्धमान तीर्थंकर को नमस्कार करता हूं।।७३।।
कर्मबन्ध से मुक्त जिनेन्द्र देव जयवन्त होवें, समग्र सिद्धिमार्ग को प्राप्त हुए सिद्ध भगवान् जयवन्त होवें, जगत् को आनन्द देने वाला प्रशस्त सूरिसमूह जयवन्त होवे और विघ्नों से रहित साधुओं का प्रबल संघ जगत् में जयवंत होवे।।७४।।
जो ज्ञानरूपी परशु से भव्यों के भव-दु:ख को छेदते हैं, उन भरत क्षेत्र में उत्पन्न हुए चोैबीस तीर्थंकरों को नमस्कार करो।।७५।।
जिनवर वृषभ को, गुणों में श्रेष्ठ गणधर वृषभ को तथा परिषहों को सहन करने वाले व धर्मसूत्र के पाठकों में श्रेष्ठ यतिवृषभ को देखकर नमस्कार करो।।७६।।
चूर्णिस्वरूप तथा षट्करणस्वरूप का जितना प्रमाण है, त्रिलोकप्रज्ञप्ति नामक ग्रन्थके भी प्रमाण उतना—आठ हजार श्लोक परिमित है (?)।।७७।।
इस प्रकार आचार्यपरम्परा से प्राप्त हुई त्रिलोकप्रज्ञप्ति
में सिद्धलोकस्वरूप-निरूपणप्रज्ञप्ति नामक
नवमां महाधिकार समाप्त हुआ।