ये भरताद्यैर्नृपतिभिरुद्धाः कारितपूर्वा जिनवरवासाः।
भङ्गमुपेतान् क्वचिदपि रम्यान् सोऽनयदेतानभिनवभावान्१।।१७९।।
इन्द्रनुतानां स्वयमपि रम्यान् तीर्थकराणां परमनिवासान्।
रत्नसमूहैः स्फुरदुरुमासः संततपूजामघटयदेषः।।१८०।।
भरतादि राजाओं ने जो पहले जिनेन्द्र भगवान् के उत्तम मन्दिर बनवाये थे वे यदि कहीं भग्नावस्था को प्राप्त हुए थे तो उन रमणीय मन्दिरों को राजा दशरथ ने मरम्मत कराकर पुनःनवीनता प्राप्त करायी थी।।१७९।। यही नहीं,उसने स्वयं भी ऐसे जिनमन्दिर बनवाये थे जिनकी कि इन्द्र स्वयं स्तुति करता था तथा रत्नों के समूह से जिनकी विशाल कान्ति स्फुरायमान हो रही थी।।१८०।।