श्री रविषेणाचार्य ने पद्मपुराण में जिनमंदिर व जिनप्रतिमा बनवाने की महिमा का वर्णन करते हुए लिखा है—
भवनं वस्तु जैनेन्द्रं निर्मापयति मानव:।
तस्य भोगोत्सव: शक्य: केन वक्तुं सुचेतस:२।।१७२।।
प्रतिमां यो जिनेन्द्राणां कारयत्यचिरादसौ।
सुरासुरोत्तमसुखं प्राप्य याति परं पदम्।।१७३।।
व्रतज्ञानतपोदानैर्यान्युपात्तानि देहिन:।
सर्वैस्रिष्वपि कालेषु पुण्यानि भुवनत्रये।।१७४।।
एकस्मादपि जैनेन्द्रबिम्बाद् भावेन कारितात्।
यत्पुण्यं जायते तस्य न संमान्त्यतिमात्रत:।।१७५।।
जो मनुष्य जिनमन्दिर बनवाता है उस सुचेता के भोगोत्सव का वर्णन कौन कर सकता है ?।।१७२।। जो मनुष्य जिनेन्द्र भगवान् की प्रतिमा बनवाता है वह शीघ्र ही सुर तथा असुरों के उत्तम सुख प्राप्त कर परम पद को प्राप्त होता है।।१७३।। तीनों कालों और तीनो लोकों में व्रत, ज्ञान, तप और दान के द्वारा मनुष्य के जो पुण्य—कर्म संचित होते हैं वे भावपूर्वक एक प्रतिमा के बनवाने से उत्पन्न हुए पुण्य की बराबरी नहीं कर सकते।।१७४-१७५।।