श्री वीरसेनाचार्य ने धवला पु. ६ में जिनेन्द्रदेव के दर्शन का फल बताते हुए लिखा है—
तिर्यंचों में एकेन्द्रिय, दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय, चार इंद्रिय और असंज्ञी पंचेन्द्रिय इनके सम्यक्त्व उत्पन्न नहीं होता है तथा सम्मूर्च्छन तिर्यंचों के भी प्रथम उपशम सम्यक्त्व प्राप्त करने की योग्यता नहीं है। अत: गर्भ से जन्म लेने वाले पर्याप्तक, संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यंच ही इस सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं।
वे बहुत से दिवस पृथक्त्व के व्यतीत हो जाने पर तीन कारणोें से सम्यक्त्व प्राप्त कर सकते हैं। कितने ही जातिस्मरण से, कितने ही धर्मोपदेश सुनकर और कितने ही जिनबिम्बों के दर्शन करके।
कधं जिणिंबबदंसणं पढमसम्मत्तुप्पत्तीए कारणं ? जिणबिम्बदंसणेण णिधत्तणिका-चिदस्स वि मिच्छत्तादिकम्मकलावस्स खयदंसणादो।
शंका-जिनबिम्ब का दर्शन प्रथम सम्यक्त्व की उत्पत्ति में कारण किस प्रकार से है ?
समाधान-जिनबिम्ब के दर्शन से निधत्त और निकाचितरूप भी मिथ्यात्व आदि कर्मसमूह का क्षय देखा जाता है, जिससे जिनबिम्ब का दर्शन प्रथम सम्यक्त्व की उत्पत्ति का कारण होता है।
कहा भी है-
‘‘दर्शनेन जिनेन्द्राणां पापसंघातकुंजरम्।
शतधा भेदमायाति गिरिर्वङ्काहतो यथा।।२’’
जिनेन्द्रों के दर्शन से पापसंघातरूपी कुंजर के सौ टुकड़े हो जाते हैं, जिस प्रकार कि वङ्का के आघात से पर्वत के सौ टुकड़े हो जाते हैं।
मनुष्यों में गर्भज पर्याप्तक मिथ्यादृष्टि मनुष्य ही इस प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं, सम्मूर्च्छन और अपर्याप्तक नहीं। ये मनुष्य आठ वर्ष की उम्र से लेकर किसी भी काल में तीन कारणों से सम्यक्त्व को प्राप्त कर सकते हैं, उसके नीचे के काल में नहीं।
कितने ही मनुष्य जातिस्मरण से, कितने ही धर्मोपदेश सुनकर और कितने ही जिनबिम्ब के दर्शन करके सम्यक्त्व को प्राप्त कर लेते हैं।
शंका-जिनमहिमा को देखकर भी कितने ही मनुष्य प्रथम सम्यक्त्व को प्राप्त करते हैं। इसलिए चार कारण कहना चाहिए ?
समाधान-जिनमहिमादर्शन का जिनबिम्बदर्शन में अंतर्भाव हो जाता है अथवा मिथ्यादृष्टि मनुष्यों के आकाश में गमन करने की शक्ति न होने से उनके चतुर्विध देवनिकायों के द्वारा किये जाने वाले नंदीश्वरद्वीपवर्ती जिनेन्द्र प्रतिमाओं के महामहोत्सवों का देखना सम्भव नहीं है, इसलिए उनके जिनमहिमादर्शनरूप कारण का अभाव है। किन्तु मेरुपर्वत पर किये जाने वाले जिनेन्द्र महोत्सवों को विद्याधर मिथ्यादृष्टि देखते हैं, इसलिये उपर्युक्त अर्थ नहीं कहना चाहिए, ऐसा कितने ही आचार्य कहते हैं। अतएव पूर्वोक्त अर्थ ही ग्रहण करना योग्य है।
लद्धिसंपण्णरिसिदंसणं पि पढमसम्मत्तुप्पत्तीए कारणं होदि तमेत्थ पुध किण्ण भण्णदे ? ण, एदस्सं वि जिणबिम्बदंसणे अंतब्भावादो। उज्जयंतचंपा-पावाणयरादि दंसणं पि एदेणेव घेत्तव्वं। कुदो ? तत्थतणजिणबिम्बदंसणजिणणिव्वुइगमणकहणेहि विणा पढमसम्मत्तगहणाभावा। णइसग्गियमवि पढमसम्मत्तं तच्चट्ठे उत्तं, तं हि एत्थेव दट्ठव्वं, जाइस्सरण-जिणबिम्बदंसणेहि विणा उप्पज्जमाण-णइसग्गियपढमसम्मत्तस्स।
शंका-लब्धिसम्पन्न ऋषियों का दर्शन भी तो प्रथम सम्यक्त्व की उत्पत्ति में कारण होता है, पुन: इस कारण को यहाँ पृथक््âरूप से क्यों नहीं कहा ?
समाधान-नहीं, क्योंकि लब्धिसंपन्न ऋषियों के दर्शन का भी जिनबिम्ब दर्शन में ही अंतर्भाव हो जाता है।
ऊर्जयंत पर्वत तथा चंपापुर व पावापुर आदि के दर्शन को भी जिनबिम्ब दर्शन के भीतर ही ग्रहण कर लेना चाहिये। क्यों ? क्योंकि उक्त प्रदेशवर्ती जिनबिम्बों के दर्शन तथा जिन भगवान के मोक्षगमन के कथन के बिना प्रथम सम्यक्त्व का ग्रहण नहीं हो सकता।