गोवदणमहाजक्खा तिमुहो जक्खेसरो य तुंबुरओ।
मादंगविजयअजिओ बम्हो बम्हेसरो य कोमारो।।९३४।।
छम्मुहओ पादालो किण्णरकिंपुरुसगरुडगंधव्वा।
तह य कुबेरो वरुणो भिउडीगोमेधपासमातंगा।।९३५।।
गुज्झकओ इदि एदे जक्खा चउवीस उसहपहुदीणं।
तित्थयराणं पासे चेट्ठंते भत्तिसंजुत्ता।।९३६।।
जक्खीओ चक्केसरिरोहिणिपण्णत्तिवज्जसिंखलया।
वज्जंकुसा य अप्पदिचक्केसरिपुरिसदत्ता य।।९३७।।
मणवेगाकालीओ तह जालामालिणी महाकाली।
गउरीगंधारीओ वेरोटी सोलसा अणंतमदी।।९३८।।
माणसिमहमाणसिया जया य विजयापराजिदाओ य।
बहुरूपिणिकुंभंडी पउमासिद्धायिणीओ त्ति२।।९३९।।
गोवदन, महायक्ष, त्रिमुख, यक्षेश्वर, तुम्बुरव, मातंग, विजय, अजित, ब्रह्म, ब्रह्मेश्वर, कुमार, षण्मुख, पाताल, किन्नर, किंपुरुष, गरुड, गंधर्व, कुबेर, वरुण, भृकुटि, गोमेध, पार्श्व, मातंग और गुह्यक, इस प्रकार ये भक्ति से संयुक्त चौबीस यक्ष ऋषभादिक तीर्थंकरों के पास में स्थित रहते हैं।।९३४-९३६।।
चक्रेश्वरी, रोहिणी, प्रज्ञप्ति, वङ्काशृंखला, वङ्काांकुशा, अप्रतिचक्रेश्वरी, पुरुषदत्ता, मनोवेगा, काली, ज्वालामालिनी, महाकाली, गौरी, गांधारी, वैरोटी, सोलसा, अनन्तमती, मानसी, महामानसी, जया, विजया, अपराजिता, बहुरूपिणी, कूष्माण्डी, पद्मा और सिद्धायिनी, ये यक्षिणियाँ भी क्रमश: ऋषभादिक चौबीस तीर्थंकरों के समीप में रहा करती हैं।।९३७-९३९।।
चमरकरणागजक्खगबत्तीसंमिहुणगेहि पुह जुत्ता।
सरिसीए पंतीए गब्भगिहे सुट्ठु सोहंति।।९८७।।
सिरिदेवी सुददेवी सव्वाण्हसणक्कुमारजक्खाणं।
रूवाणि य जिणपासे मंगलमट्ठविहमवि होदि१।।९८८।।
चमर। चमरकरनागयक्षगतद्वात्रिंशन्मिथुनै: पृथक् पृथक् गर्भगृहे सदृश्या पंक्त्या युक्ता: सुष्ठु शोभन्ते।।९८७।।
सिरि। तज्जिनप्रतिमापार्श्वे श्रीदेवी श्रुतदेवी सर्वाह्नसनत्कुमारयक्षाणां रूपाणि अष्टविधानि मङ्गलानि च भवन्ति।।९८८।।
गाथार्थ-वे जिनप्रतिमाएँ, चमरधारी नागकुमारों के बत्तीस युगलों और यक्षों के बत्तीस युगलों सहित, पृथक्-पृथक् एक-एक गर्भगृह में सदृश पंक्ति से भली प्रकार शोभायमान होती हैं। उन जिनप्रतिमाओं के पार्श्वभाग में श्रीदेवी, श्रुतदेवी, सर्वाह्न यक्ष और सानत्कुमार यक्ष के रूप अर्थात् प्रतिमाएँ हैं तथा अष्टमंगल द्रव्य भी होते हैं। झारी, कलश, दर्पण, पङ्खा, ध्वजा, चामर, छत्र और ठोना ये आठ मंगल द्रव्य हैं। ये प्रत्येक मंगल द्रव्य १०८-१०८ प्रमाण होते हैं।।९८७-९८८-९८९।।
इसी प्रकार तिलोयपण्णत्ती में भी कहा है-
सिरिसुददेवीणतहासव्वाण्हसणक्कुमार जक्खाणं।
रूवाणिं पत्तेक्कं पडि वररयणइरइदाणिं२।।१८८१।।
अर्थ-प्रत्येक प्रतिमा के प्रति उत्तम रत्नादिकों से रचित श्रीदेवी, श्रुतदेवी तथा सर्वाह्न व सानत्कुमार यक्षों की मूर्तियाँ रहती हैं।।१८८१।।
विश्वेश्वरादयो ज्ञेया देवता शांतिहेतवे।
क्रूरास्तु देवता: हेया येषां स्याद्वृत्तिरामिषै:३।।
अर्थ-जिनागम में विश्वेश्वर, चक्रेश्वरी, पद्मावती आदि देवता शान्ति के लिए बतलाये हैं परन्तु जिन पर बलि चढ़ाई जाती है, जीव मारकर चढ़ाये जाते हैं, ऐसे चण्डी-मुण्डी आदि देवता त्याग करने योग्य हैं। इसका भी खुलासा इस प्रकार है-
मिथ्यात्वपूरिता: क्रूरा: सशस्त्रा: सपरिग्रहा:।
निंद्या आमिषवृत्तित्वा-न्मद्यपानाच्च हीनका:१।।१।।
कुदेवाश्च ताज्ञेया ब्रह्मोमाविष्णुकादय:।
प्रतिपत्तिश्च तासां हि मिथ्यात्वस्य च कारणम्।।२।।
तस्माद्धेया: कुदेवास्ते मिथ्याभेषधरावहा:।
ग्राह्या: सम्यक्त्व सम्पन्ना जिनधर्मप्रभावका:।।३।।
चक्रेश्वर्यादिदिक्पाला यक्षाश्च शांतिहेतवे।
सम्यग्दर्शनयुक्तत्वात्ते पूज्या जिनशासने।।४।।
नाप्यस्ति मूढता तत्र दृगादिपूजने यत:।
अर्थ-जो देव मिथ्यात्वी, क्रूर, हिंसक हैं, शस्त्र, परिग्रह सहित हैं, मांस की वृत्ति और मद्य की वृत्ति होने से निंद्य और हीन हैं, ऐसे ब्रह्मा, विष्णु, उमा, चण्डी, मुण्डी आदि देवता कुदेवता कहाते हैं। उनकी पूजा करना मिथ्यात्व का कारण है इसलिए मिथ्या भेष को धारण करने वाले ऐसे कुदेव त्याज्य हैं परन्तु जो देव सम्यग्दृष्टि हैं, जो जिनधर्म की प्रभावना करने वाले हैं, ऐसे चक्रेश्वरी, दिक्पाल, यक्ष आदि देवता शान्ति प्रदान करने वाले हैं। ऐसे देव सम्यग्दृष्टी होने के कारण पूज्य हैं, ऐसा जैन शास्त्रों का आदेश है, उनकी पूजा करने में देवमूढ़ता नहीं होती क्योंकि सम्यग्दृष्टि जीव सदा पूज्य होता है।