—अथ स्थापना-गीता छंद—
तीर्थंकरों के तीर्थ में अनुबद्ध केवलि जिन हुये।
बहुतेक यतिगण शिव गये बहुतेक अनुत्तर गये।।
बहुतेक मुनि सौधर्म आदिक ग्रैवेयक तक भी गये।
उन सर्व यति की थापना कर, पूजते सब सुख भये।।१।।
ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थंकरतीर्थेषु अनुबद्धकेवलि—अपवर्ग—स्वर्गप्राप्तमुनिसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थंकरतीर्थेषु अनुबद्धकेवलि—अपवर्ग—स्वर्गप्राप्तमुनिसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थंकरतीर्थेषु अनुबद्धकेवलि—अपवर्ग—स्वर्र्गप्राप्तमुनिसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।
अथ अष्टक—चाल पूजों पूजों श्री……
स्वच्छ गंगा नदी का जल है। जो स्वातम का हरता मल है।
पूजते ही मिले इष्ट फल है। मुनींद्र पाद वंदन करूँ मैं नित ही।।
आवो पूजें नगन मुनिनाथा। जिन्हें सुरगण नमाते माथा।
तीन रत्नों के हैं ये प्रदाता। मुनीन्द्र पाद वंदन करूँ मैं नित ही।।१।।
ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थंकरतीर्थेषु अनुबद्धकेवलि—अपवर्ग—स्वर्र्गप्राप्तसाधुभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा।
गंध कर्पूर केशर लाऊँ, सौगंधित बनाके घिसाऊँ।
चर्चते चर्ण में शांति पाऊँ, मुनींद्र पाद वंदन करूँ मैं नित ही।।आ.।।२।।
ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थंकरतीर्थेषु अनुबद्धकेवलि—अपवर्ग—स्वर्र्गप्राप्तसाधुभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
चंद्रकांती सदृश तंदुल हैं। पुंज धारे हृदय निर्मल है।
स्वात्मसुखप्राप्त होता विमल है मुनींद्रपाद वंदन करूँ मैं नित ही।।आ.।।३।।
ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थंकरतीर्थेषु अनुबद्धकेवलि—अपवर्ग—स्वर्र्गप्राप्तसाधुभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
कुंद पुष्पों का हार बनाऊँ। काम जेता मुनी को चढ़ाऊँ।
आत्मगुण की सुगंधी पाऊँ। मुनींद्र पाद वंदन करूँ मैं नित ही।।आ.।।४।।
ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थंकरतीर्थेषु अनुबद्धकेवलि—अपवर्ग—स्वर्गप्राप्तसाधुभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
सेमई खीर लाडू भराऊँ। अर्पते भूख बाधा मिटाऊँ।
आत्म पीयूष का स्वाद पाऊँ। मुनीन्द्र पाद वंदन करूँ मैं नित ही।।आ.।।५।।
ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थंकरतीर्थेषु अनुबद्धकेवलि—अपवर्ग—स्वर्र्गप्राप्तसाधुभ्य: ्नौवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
स्वर्ण दीपक में कर्पूर ज्वाला। आरती से भगे तम काला।
हो स्वातम में ज्ञान उजाला। मुनींद्र पाद वंदन करूँ मैं नित ही।।आ.।।६।।
ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थंकरतीर्थेषु अनुबद्धकेवलि—अपवर्ग—स्वर्गप्राप्तसाधुभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
धूप खेऊँ सुगंधि अगनि में। कर्म जल के भसम होें क्षण में।
स्वात्मगुण कीर्ति पैâले गगन में। मुनींद्र पाद वंदन करूँ मैं नित ही।।आ.।।७।।
ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थंकरतीर्थेषु अनुबद्धकेवलि—अपवर्ग—स्वर्र्गप्राप्तसाधुभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
आम अंगूर सेव सरस हैं। अर्पते ही मिले समरस है।
हो संयम सुधामय रस है। मुनींद्र पाद वंदन करूँ मैं नित ही।।आ.।।८।।
ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थंकरतीर्थेषु अनुबद्धकेवलि—अपवर्ग—स्वर्गप्राप्तसाधुभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा।
नीर गंधादि अर्घ बनाऊँ। स्वर्ण पुष्प भी उसमें मिलाऊँ।
साधुगण के निकट में चढ़ाऊँ। मुनीन्द्र पाद वंदन करूँ मैं नित ही।।आ.।।९।।
ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थंकरतीर्थेषु अनुबद्धकेवलि—अपवर्ग—स्वर्गप्राप्तसाधुभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
—सोरठा—
मुनिवर चरण सरोज, जलधारा से पूजते।
मिले पूर्ण संतोष, शांतिधारा मैं करूँ।।१०।।
शांतये शांतिधारा।
पारिजात के पुष्प, सुरभित करते दश दिशा।
होवे पुष्टी, तुष्टि, पुष्पांजलि अर्पण करूँ।।११।।
दिव्य पुष्पांजलि:।