—सोरठा—
महाव्रतादी श्रेष्ठ, गुण भूषण को धारतीं।
पूजूँ भक्ति समेत, पुष्पांजलि करके यहाँ।।१।।
अथ प्रथमवलये मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्।
—शंभु छंद—
ऋषभदेव के समवसरण में, ‘ब्राह्मी’ गणिनी मानी हैं।
सर्व आर्यिका तीन लाख, पच्चास हजार बखानी हैं।।
रत्नत्रय गुणमणि से भूषित, शुभ्र वस्त्र को धारे हैं।
इनकी पूजा वंदन भक्ती, भवि को भवदधि तारे हैं।।१।।
ॐ ह्रीं श्रीऋषभदेवस्य ब्राह्मीगणिनीप्रमुखत्रयलक्षपंचाशत्सहस्र-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अजित नाथ के धर्मतीर्थ में, व्रत समिती गुप्ती धारें।
सर्व आर्यिका तीन लाख, अरु बीस हजार धर्म धारें।।
मात ‘प्रकुब्जा’ गणिनी इनमें, धर्म धुरंधर नारी हैं।
इनकी पूजा वंदन भक्ति, सब जन को सुखकारी है।।२।।
ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथस्य प्रकुब्जागणिनीप्रमुखत्रयलक्षविंंशतिसहस्र-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
संभव जिन के समवसरण में, महाव्रतों से भूषित है।
तीन लाख अरु तीस हजार, आर्यिकायें गुण पूरित हैं।।
इनमें गणिनी ‘धर्म श्री’ माँ, धर्मवत्सला सुरवंद्या।
इनकी पूजा वंदन भक्ती, देती सुख परमानंदा।।३।।
ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथस्य धर्मश्रीगणिनीप्रमुखत्रयलक्षत्रिंशत्सहस्र-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अभिनंदन प्रभु धर्म सभा में, सर्व आर्यिकायें पूज्या।
तीन लाख अरु तीस सहस, छह सौ सब शील नियम युक्ता।।
इन सबकी ‘मेरुषेणा’ मां, गणिनी वत्सल गुणधारी।
इन सबकी पूजा भक्ती से, तरें भवोदधि नरनारी।।४।।
ॐ ह्रीं श्रीअभिनंदननाथस्य मेरुषेणाप्रमुखत्रयलक्षत्रिंशत्सहस्रषट्शत-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सुमति जिनेश्वर समवसरण में, तीन लाख अरु तीस सहस।
इन सब व्रतमंडितआर्या में, मात ‘अनंता’ प्रमुख बसत।।
लज्जा शील गुणों से पूरित, एकशाटिका धारी हैं।
ध्यान अध्ययन तपस्या में रत, इन पूजा गुणकारी हैं।।५।।
ॐ ह्रीं श्रीसुमतिनाथस्य अनंतागणिनीप्रमुखत्रयलक्षत्रिंशत्सहस्र-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पद्म प्रभू के धर्म तीर्थ में, धर्म मूर्तियाँ शोभे हैं।
चार लाख अरु बीस सहस, ये व्रती आर्यिकायें सब हैं।।
‘रतिषेणा’ माँ गणिनी इनमें, मानों जिनवर कन्या हैं।
जाती कुल से शुद्ध शील से, शुद्ध आर्यिका धन्या हैं।।६।।
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभनाथस्य रतिषेणागणिनीप्रमुखचतुर्लक्षविंशतिसहस्र-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री सुपार्श्व जिन समवसरण में, तीन लाख अरु तीस सहस।
‘मीना ‘ गणिनी सहित आर्यिका, सब सद्धर्म सुता सदृश।।
संयमशील समिति गुणमंडित, समकित रत्न धरें शोभें।
इनकी पूजा करते सुर नर, पुन: न दुर्गति दुख भोगें।।७।।
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथस्य मीनागणिनीप्रमुखत्रयलक्षत्रिंशत्सहस्र-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
चंद्रनाथ के समवसरण में, श्वेत वस्त्रधारी आर्या।
तीन लाख अस्सी हजार ये, इनमें ‘वरुणा’ प्रमुखार्या।।
लेश्या शुक्ल धरें ये श्रमणी, शुक्लगुणों से मंडित हैं।
जो भविजन इन पूजा करते, वे पद लहें अखंडित हैं।।८।।
ॐ ह्रीं श्रीचंद्रप्रभनाथस्य वरुणागणिनीप्रमुखत्रयलक्षअशीतिसहस्र-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सुविधिनाथ के समवसरण में, ‘घोषा’ प्रमुख आर्यिका हैं।
तीन लाख अस्सी हजार, सब महाव्रतादि धारिका हैं।।
धर्म वत्सला धर्म मूर्तियाँ, धर्म ध्यान में तत्पर हैं।
धर्म प्राण जन इनको पूजें, सब सुख लहें निरंतर हैं।।९।।
ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदंतनाथस्य घोषागणिनीप्रमुखत्रयलक्षअशीतिसहस्र-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री शीतल जिन समवसरण में, प्रमुख आर्यिका ‘धरणा’ हैं।
ये तीन लाख अस्सी हजार, इनके वच अमृत झरना हैं।।
सब क्षमा मार्दव आर्जवादि, दश धर्मों को धारण करतीं।
इनकी पूजा वंदन भक्ती, सब तन मन की व्याधी हरती।।१०।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथस्य धरणागणिनीप्रमुखत्रयलक्षअशीतिसहस्र-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्रेयांसनाथ के यहाँ एक लख, तीस सहस्र आर्यिका हैं।
इनमें गणिनी ‘धारणीमात’, ये रत्नत्रय त्रितय साधिका हैं।।
इस भव में स्त्रीलिंग छेद, इंद्रों का वैभव पाती हैं।
फिर आकर शिवपद प्राप्त करें, इन पूजा भव दुख घाती हैं।।११।।
ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथस्य धारणीगणिनीप्रमुखएकलक्षत्रिंशत्सहस्र-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री वासुपूज्य के यहाँ साध्वियां, एक लाख छह सहस कहीं।
इनमें ‘वरसेना’ गणिनी हैं, सब महाव्रतों को पाल रहीं।।
ये ग्यारह अंग पढ़ें रुचि से, शिष्याओें को शिक्षा देतीं।
जिनवर भक्ती में नित तत्पर, इनकी पूजा दु:ख हर लेती।।१२।।
ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्यनाथस्य वरसेनागणिनीप्रमुखएकलक्षषट्सहस्र-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री विमलनाथ के निकट साध्वियां, एक लाख त्रय सहस कहीं।
ये ‘पद्मा’ गणिनी आज्ञा में, निज आत्म तत्त्व में लीन रहीं।।
सोलह कारण भावना भाय, तीर्थंकर पुण्य कमाती हैं।
इनकी पूजा वंदन भक्ती, भव्यों के कर्म जलाती हैं।।१३।।
ॐ ह्रीं श्रीविमलनाथस्य पद्मागणिनीप्रमुखएकलक्षत्रयसहस्र-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जिनवर अनंत के यहाँ आर्यिका, एक लाख अठ सहस कहीं।
गणिनी माँ ‘सर्वश्री’ उनमें, सब शील गुणों की खान कहीं।।
इनको पूजें सुर नर किन्नर, वीणादिक वाद्य बजा करके।
अप्सरियाँ नृत्य करें सुंदर, इनके गुण मणि गा गा करके।।१४।।
ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथस्य सर्वश्रीगणिनीप्रमुखएकलक्ष-अष्टसहस्र-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री धर्मनाथ के निकट ‘सुव्रता’ गणिनी के अनुशासन में।
बासठ हजार चउशतक आर्यिका, नित तत्पर व्रत पालन में।।
तप त्याग अकिंचन ब्रह्मचर्य, धर्मों से शक्ति बढ़ाती हैं।
निज पाणि पात्र में लें आहार, मुनिव्रत चर्या सु निभाती हैं।।१५।।
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथस्य सुव्रतागणिनीप्रमुखद्विषष्टिसहस्रचतु:शत-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री शांतिनाथ के समवसरण, में साठ हजार तीन सौ हैं।
गणिनी ‘हरिषेणा’ माता भी, निज गुण से सुर नर मन मोहें।।
ये परमशांति पाने हेतु, निज समतारस को चखती हैं।
इनकी आहारदान पूजा, भक्तों में समरस भरती हैं।।१६।।
ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथस्य हरिषेणागणिनीप्रमुखषष्टिसहस्रत्रयशत-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री कुंथुनाथ के यहाँ साठ, हजार तीन सौ पचास हैं।
आर्यिका ‘भाविता’ प्रमुख मान्य, निजगुण से भविजन मन मोहें।।
उपचार महाव्रत हैं इनके, इक साड़ी मात्र परिग्रह से।
गुणस्थान पाँचवाँ देशविरत, होता है पूजूूँ भक्ती से।।१७।।
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथस्य भावितागणिनीप्रमुखषष्टिसहस्रत्रयशत्पंचाशत-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अर जिन के यहाँ आर्यिकायें, सब साठ हजार बखानी हैं।
‘कुंथुसेना’ गणिनी इनकी, ये उज्ज्वल गुणरजधानी हैं।।
इनके वचनामृत भविजन को, पुष्टी तुष्टी शांती देते।
जो इनकी पूजा करते हैं, उनके सब पातक हर लेते।।१८।।
ॐ ह्रीं श्रीअरनाथस्य कुंथुसेनागणिनीप्रमुखषष्टिसहस्र-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री मल्लिनाथ के तीरथ में, पचपन हजार साध्वी मानीं।
गणिनी ‘बंधूसेना’ उनमें, सबको शिक्षा दें कुशलानी।।
ये सम्यग्दर्शन से विशुद्ध, निज पर भेद ज्ञान धारें।
चारित निर्दोष पालती हैं, इन पूजत रोग शोक टारें।।१९।।
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथस्य बंधुसेनागणिनीप्रमुखपंचपंचाशत्सहस्र-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
मुनिसुव्रत जिन के सभा बीच, पच्चास हजार आर्यिका हैं।
उनमें सु ‘पुष्पदत्ता’ प्रधान, सब निज शुद्धात्म साधिका हैं।।
रस रूप गंध स्पर्श शून्य, निज आत्मा का चिंतन करतीं।
इनके गुण गाते चक्रवर्ति, ये भक्तों के भवभय हरतीं।।२०।।
ॐ ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथस्य पुष्पदत्तागणिनीप्रमुखपंचाशत्सहस्र-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
नमि जिन के समवसरण में ये, साध्वी पैंतालिस सहस कहीं।
गणिनी ‘मार्गिणी’ मान्य उनमें, ये निजानंद सुख मग्न कहीं।।
भक्तों को शिवपथ दिखलाती, पापों से रक्षा करती हैं।
वात्सल्यमयी माता सच्ची, इन पूजा नवनिधि भरती हैं।।२१।।
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथस्य मार्गिणीगणिनीप्रमुखपंचचत्वािंरशत्सहस्र-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
नेमीप्रभु समवसरण में ये, चालीस हजार बखानी हैं।
उनकी गणिनी ‘राजुलदेवी’, पातिव्रत धर्म निशानी हैं।।
हलधर नारायण चक्रवर्ती, इंद्रादिक इनको नमते हैं।
महिलाओं में ये चूड़ामणि, इनका हम वंदन करते हैं।।२२।।
ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथस्य राजमतीगणिनीप्रमुखचत्वािंरशत्सहस्र-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री पार्श्वनाथ के निकट आर्यिका, अड़तिस सहस मान लीजे।
उनमें ‘सुलोचना’ गणिनी हैं, स्तुति से मन पवित्र कीजे।।
इनके गुण अमलवस्त्र उज्ज्वल, मन धवल शुक्ल लेश्या शोभें।
इनकी पूजा भक्ती करके, हम शिवपुर के सब सुख भोगें।।२३।।
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथस्य सुलोचनागणिनीप्रमुखअष्टिंत्रशत्सहस्र-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री वीरप्रभू की सभा बीच, छत्तीस हजार आर्यिका हैं।
मां सती ‘चंदना’ गणिनी हैं, सब संयम रत्न साधिका हैं।।
इनको वंदामी कर करके, मैं शिवपथ प्रशस्त कर लेऊँ।
मेरा संयम निर्दोष पले, गुरुचरण हृदय में रख लेऊँ।।२४।।
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरस्वामिन: चंदनागणिनीप्रमुखषट्िंत्रशत्सहस्र-आर्यिकाभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
—पूर्णार्घ्य-दोहा—
लाख पचास छप्पन सहस, दो सौ तथा पचास।
समवसरण की साध्वियां, और अन्य भी खास।।
अट्ठाइसों मूलगुण, उत्तर गुण बहुतेक।
धारें सबहीं आर्यिका, नमूँ नमूँ शिर टेक।।१।।
ॐ ह्रीं श्रीचतुर्विंशतित्ाीर्थंकरसमवसरणस्थितब्राह्मीगणिनीप्रमुखपंचाशल्लक्ष-षट्पंचाशत्सहस्रद्वयशतपंचाशत्-आर्यिकाचरणेभ्य: पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
—शंभु छंद—
जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में, चतुर्थ काल से लेकर भी।
इस पंचमकाल के अंतिम तक, सर्वश्री संयतिका होंगी।।
ब्राह्मी माता से सर्वश्री, माता तक जितनी संयतिका।
जो हुईं हो रहीं होवेंगी, मैं जजूँ भक्ति भवदधि नौका।।२।।
ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थचतुर्थकालादिपंचमकालान्त्यपर्यंतब्राह्मी-गणिनीप्रमुखप्रभृतिसर्वश्री-आर्यिकापर्यंतसर्वार्यिकाभ्य: पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:।