चारित्रचक्रवर्ती प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर परम्पराचार्य अर्घ्य
सदी बीसवीं के श्री प्रथमाचार्य शान्तिसागर को नमन।
वीर सिन्धु-शिव-धर्म-अजित-श्रेयांस व अभिनंदन को नमन।।
अनेकान्तसागराचार्य सप्तम सूरीश्वर को वन्दन।
सब आचार्यों के श्रीचरणों में मैं अर्घ्य करूँ अर्पण।।
ॐ ह्रीं प्रथमाचार्यश्रीशांतिसागर-वीरसागर-शिवसागर-धर्मसागर-अजितसागर-श्रेयांससागर-अभिनंदनसागर-वर्तमान सप्तमपट्टाचार्य श्रीअनेकांत-सागरादि समस्त परम्पराचार्येभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी का अर्घ्य
दीक्षा लेकर बने शांति-सागर निज कर्म जलाने को।
वैâसे होते हैं मुनिवर, यह बतला दिया जमाने को।।टेक.।।
साधु अवस्था धारण कर, क्रम-क्रम से श्रेणी बढ़ती है।
कर्म निर्जरा के बल पर, अरिहन्त अवस्था मिलती है।।१।।
गुरु चरणों में इसीलिए हम, आए अर्घ्य चढ़ाने को।
आए अर्घ्य चढ़ाने को।। दीक्षा लेकर……
ॐ ह्रीं चारित्रचक्रवर्तीप्रथमाचार्यश्रीशान्तिसागरमहामुनीन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रथम पट्टाचार्य श्री वीरसागर जी का अर्घ्य
यह अष्टद्रव्य की सामग्री, मेरी पूजा का साधन है।
गुरु भक्ती ही कर सकती बस, दुर्गति का सहज निवारण है।।
आचार्य वीरसागर गुरु की, जो पूजा निशदिन करते हैं।
वे पूजक भी पुण्यास्रव कर, इक दिन अनर्घ्य पद वरते हैं।।१।।
ॐ ह्रीं प्रथमपट्टाचार्यश्रीवीरसागरमुनीन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
द्वितीय पट्टाचार्य श्री शिवसागर जी का अर्घ्य
तर्ज—जहाँ डाल-डाल पर…………..
श्री शिवसागर आचार्य प्रवर के पद में शीश नमाएं,
हम अर्घ्य चढ़ाने आए।।टेक.।।
महाराष्ट्र प्रान्त अड़गांव में जन्मे शिवसागर कहलाए।
श्री वीरसिन्धु आचार्यदेव के, प्रथम शिष्य कहलाए।।…….हाँ प्रथम……
शिवपथ के राही परम तपस्वी शिवसागर कहलाए,
हम अर्घ्य चढ़ाने आए।।१।।
बारह वर्षों तक परमेष्ठी आचार्य गुणों को पाला।
श्री महावीरजी में अपने नश्वर शरीर को त्यागा।। नश्वर…….
इनके तप की पूजा करके हम पूज्य परम पद पाएं,
हम अर्घ्य चढ़ाने आए।।२।।
ॐ ह्रीं द्वितीयपट्टाचार्यश्रीशिवसागरमुनीन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
तृतीय पट्टाचार्य श्री धर्मसागर जी का अर्घ्य
तर्ज—माई रे माई………………
श्री आचार्य धर्मसागर के पद में शीश नमाया।
उनकी पूजा करने हेतु, स्वर्णिम थाल सजाया।।
गुरुवर की जय जय जय जय, मुनिवर की जय जय जय जय
शांति सिंधु की परम्परा में, पट्टाचार्य तृतिय ये।
संघ चतुर्विध के अधिनायक, भोले भाले गुरु थे।।
अष्ट द्रव्य का अर्घ्य चढ़ाने, भक्त समूह है आया
उनकी पूजन करने हेतू, स्वर्णिम थाल सजाया।।१।।
गुरुवर की जय जय जय जय, मुनिवर की जय जय जय जय।।१।।
ॐ ह्रीं तृतीयपट्टाचार्यश्रीधर्मसागरमुनीन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
चतुर्थ पट्टाचार्य श्री अजितसागर जी का अर्घ्य
तर्ज—नागिन धुन………..
श्री चतुर्थ पट्टाचार्य प्रवर गुरु अजित सिन्धु मुनिराज को
हम सविनय अर्घ्य चढ़ाते हैं।।
सन् उन्निस सौ पच्चिस में भौरा-आष्टा में जन्मे।
नाम राजमल पाया तुमने, त्यागी बनकर चमके।।गुरुजी……
शिवसागर सूरि, से दीक्षा ले, बने अजित सिन्धु मुनिराज जी,
हम सविनय अर्घ्य चढ़ाते हैं।।१।।
सन् उन्निस सौ सत्तासी में, पट्टाचार्य बने थे।
संघ चतुर्विध संचालन कर, धर्माचार्य बने थे।।गुरूजी……
जल-चन्दन-अक्षत, आदि अष्ट द्रव्यों का थाल सजाय के,
हम सविनय अर्घ्य चढ़ाते हैं।।२।।
ॐ ह्रीं चतुर्थपट्टाचार्यश्रीअजितसागरमुनीन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पंचम पट्टाचार्य श्री श्रेयांससागर जी का अर्घ्य
आवो हम सब करें अर्चना, पंचमपट्टाचार्य की।
श्री श्रेयांस सिन्धु की पूजन, चलो करें मिल आज ही।
वंदे गुरुवरं, वंदे गुरुवरं।।
जल चंदन अक्षत व पुष्प नैवेद्य दीप अरु धूप लिया।
फल युत अष्टद्रव्य को लेकर अर्घ्य समर्पित चरण किया।
रत्नत्रय की करें याचना, हम इस अर्घ्य के साथ ही।
श्री श्रेयांस सिन्धु की पूजन, चलो करें मिल आज ही।।
वंदे गुरुवरं, वंदे गुरुवरं।।१।।
ॐ ह्रीं पंचमपट्टाचार्यश्रीश्रेयांससागरमुनीन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
षष्ठ पट्टाचार्य श्री अभिनंदनसागर जी का अर्घ्य
तर्ज—जिन्दगी एक सफर है सुहाना……………
गुरूपद से है प्रीत लगाना, गुरु चरणों में अर्घ्य चढ़ाना।
जय हो जय हो जय हो जय-२
अभिनंदनसागर मुनिवर।
षष्ठम पट्टाचार्य प्रवर।।
उनकी भक्ति में मन को लगाना, गुरुचरणों में अर्घ्य चढ़ाना।।१।।
अष्ट द्रव्य का थाल लिया।
गुरुपद में नत भाल किया।।
है भाव रत्नत्रय पाना, गुरुचरणों में अर्घ्य चढ़ाना।।२।।
ॐ ह्रीं षष्ठपट्टाचार्यश्रीअभिनंदनसागरमुनीन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
वर्तमान सप्तम पट्टाचार्य श्री अनेकान्तसागर महाराज का अर्घ्य
तर्ज—धीरे-धीरे बोल कोई सुन ना ले………….
पूजन कर लो गुरुवर की, गुरुवर की सूरीश्वर की।
श्री सप्तम पट्टाचार्य की, अनेकान्तसिन्धु आचार्य की।।टेक.।।
गोटेगांव के दीपक कुल दीपक बने।
शांति सिन्धु वंशावलि के शीर्षक बने।
अभिनन्दन सागर सूरि की देशना।
ज्ञानमती माताजी की मिली प्रेरणा।।
पूजन करो, अर्चन करो-२
श्री सप्तम पट्टाचार्य की, अनेकान्त सिन्धु आचार्य की।।
पूजन कर लो।।१।।
अष्ट द्रव्य का थाल सजा कर ले लिया।
गुरु चरणों में अर्घ्य समर्पित कर दिया।।
युग-युग तक जीवन्त रहो आचार्यश्री।
परम्परा के सप्तम पट्टाचार्य जी।
पूजन करो, अर्चन करो-२
श्री सप्तम पट्टाचार्य की, अनेकांत सिन्धु आचार्य की।।
पूजन कर लो।।२।।
ॐ ह्रीं सप्तमपट्टाचार्यश्रीअनेकान्तसागरमुनीन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का अर्घ्य
पिच्छि कमण्डलुधारी माता, नमन तुम्हें हम करते हैं।
अष्ट द्रव्य का थाल सजाकर, अर्घ्य समर्पण करते हैं।।
युग की पहली ज्ञानमती के, चरणों में अभिवन्दन है।
तेरी पावन प्रतिभा लखकर, मेरा मन भी पावन है।।
ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुख श्रीज्ञानमती मात्रे अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।