अर्हन्तो मंगलं कुर्यु:, सिद्धा: कुर्युश्च मंगलम्।
आचार्या: पाठकाश्चापि, साधवो मम मंगलम् ।।
भव्यात्माओं! जैसे सृष्टि, संसार, जैनधर्म अनादि है-शाश्वत है, वैसे ही मुनिपरम्परा, चतुर्विध संघ परम्परा-मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका की परम्परा भी अनादि है। भगवन पुष्पदंतनाथ से धर्मनाथ भगवान के काल तक कुछ-कुछ दिन की धर्मतीर्थ व्युच्छित्ति मानी गई है।
तिलोयपण्णत्ति ग्रंथ में बताया है कि धर्म तीर्थ की व्युच्छित्ति होने पर चतुर्विध संघ परम्परा का अभाव हो जाता है। यह हमेशा ध्यान में रखना है, संसार में जब तक धर्म है, तब तक मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएं हैं। श्रावक, श्राविका के बिना मुनि, आर्यिका नहीं रहते और मुनि, आर्यिकाओं के बिना श्रावक-श्राविकाएँ नहीं रहते हैं इसलिए मुनि परम्परा अनादि है। आज दिगम्बर परम्परा में एक ऐसा सम्प्रदाय बन गया है जो मुनियों को, आर्यिकाओं को, पिच्छीधारी साधुओं को, संयमियों को नहीं मानता है। वे कहते हैं, पंचमकाल में निर्दोष चारित्र को पालन करने वाले साधु नहीं हैं। मैं आपको बताऊँ? यह सर्वथा गलत है। श्री कुन्दकुन्द स्वामी ने कहा है-
‘‘अज्जवि तियरण सुद्धा, अप्पा झाएव लहइ इन्दत्तं।
लोयन्तिय देवत्तं, तत्थ चुदा णिव्वुदिं जंति।।’’
आज भी इस पंचमकाल में रत्नत्रय से शुद्ध साधु पवित्र आत्मा का ध्यान करके इन्द्रपद को प्राप्त कर सकते हैं, लौकान्तिक पद को भी प्राप्त कर सकते हैं और फिर एक भव धारणकर मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं।श्री कुन्दकुन्द स्वामी पंचमकाल के थे। चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज, जिनके मैंने दर्शन किए, वे इस पंचमकाल के थे। मेरे दीक्षागुरु आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज, आचार्य श्री शिवसागर जी महाराज आदि इनकी तपश्चर्या, इनकी निर्दोष चर्या मैंने स्वयं अपनी दृष्टि से देखी है और भी कई लोगों ने देखी है। अभी भी सच्चे साधु हैं और पंचमकाल के अंत तक रहेंगे। तिलोयपण्णत्ति ग्रंथकार का कहना है कि भगवान महावीर का शासन पंचमकाल के अंत तक वीरांगज मुनि और सर्वश्री आर्यिका तक अविच्छिन्न चलता रहेगा।
आचार्य श्री यतिवृषभदेव-तिलोयपण्णत्ति ग्रंथकार निर्दोष साधुओं को मानते हैं। श्री कुन्दकुन्दस्वामी ने निर्दोष साधु माना है। हाँ! कोई सदोष भी हो सकते हैं अत: सबको सदोष अथवा सभी को निर्दोष नहीं कहा जा सकता है। एक कॉलेज में, विश्वविद्यालय में या पाठशाला मेंं पढ़ने वाले सभी विद्यार्थी पास हों, यह कोई नियम नहीं है, कुछ फेल भी हो जाते हैं लेकिन सभी विद्यार्थी फेल हों, ऐसा भी नहीं है।
जो आज के साधुओं को नहीं मानते हैं, उस परम्परा वाले वैâसे साधु ढूँढ़ते हैं? वे कहते हैं ‘‘धन्य मुनि दशा’’ वे मुनियों की प्रशंसा करते हैं, चतुर्थकालीन साधुओं के गुणों का बखान करते हैं और उनकी स्थिति का बार-बार चिंतन करते हैं।
हम भी समयसार में चतुर्थकालीन साधुओं के बारे में पढ़ते हैं-
ऐसे साधु अर्थात् सम्यग्दृष्टि मुनि का ही यह साहस है जहाँ ऐसा वङ्कापात हो, जो तीनों लोकों को चलायमान कर दें, भय से कम्पित कर दें लेकिन सम्यग्दृष्टि स्वभाव से निर्भय होने से समस्त शंकाओं को छोड़कर अपनी आत्मा के ध्यान में लीन रहता है, वह सोचता है कि मैं ज्ञानरूपी शरीर को धारण करने वाला हूँ, मेरा ज्ञानरूपी शरीर किसी से नष्ट नहीं हो सकता, आत्मा अजर-अमर है, वह वङ्का के पात से, अग्नि के निमित्त से कभी नष्ट नहीं हो सकती, जल से कभी भीग नहीं सकती, पवन से कभी हिल नहीं सकती, मृत्यु से मर नहीं सकती, ऐसी आत्मा का ध्यान, अनुभव, चिन्तन करते हुए सम्यग्दृष्टि अपने ज्ञान से च्युत नहीं होते हैं। ऐसा साहस करने वाले महासाधु, विचार करके देखा जाए तो हमें और आपको सभी को अच्छे लगते हैं, किसे बुरे लगेंगे। मैं प्रतिदिन, प्रतिक्षण यह भावना भाती हूँ कि हे भगवन्! ऐसे साधु की अवस्था को प्राप्त करने का दिन मेरा कब आएगा? ऐसे मार्ग में संचरण करते हुए मैं प्रशम भाव को धारण करूँ, ऐसा मेरा समय कब आएगा। आज वैसे साधु न मिले तो दूसरे साधु-मुनि-आर्यिका जो कि २८ मूलगुणों का पालन करते हुए आगम की चर्या के अनुरूप प्रवृत्ति करते हैं क्या वे साधु नहीं हैं? ऐसी बात नहीं है।
भावसंग्रह आदि ग्रंथ में साधु के दो भेद किए हैं-१. जिनकल्पी २. स्थविरकल्पी।
जिनकल्पी ऐसे महासाधु हैं जो एकाकी विचरण करने वाले, गुफाओं में पर्वत की चोटियों पर ध्यान करने वाले महामुनि, उपसर्गविजयी हैं। स्थविरकल्पी जो संघ में रहते हैं, अस्वस्थ होने पर कष्ट आदि को नहीं झेल पाते हैं, तब गुरु उनकी औषधि आदि की व्यवस्था कराते हैं, उनकी परिचर्या करते हैं और उनके चारित्र को पालन कराने में पूर्णरूपेण सहयोगी बनते हैं। वर्तमान में जिनकल्पी होने का एकाकी विचरण का निषेध है क्योंकि आज उत्तम संहनन नहीं है। श्री कुन्दकुन्दस्वामी ने स्वयं कहा है-‘‘मा भूत मे सत्त्व एकागी’’ मेरा शत्रु भी एकाकी विचरण न करे, संघ में ही रहे। इसका मतलब यह है कि पंचमकाल के सभी साधु स्थविरकल्पी हैं। संघ से ही उनकी चर्या निर्दोष पल सकती है।
एक बात मैं आप लोगों को और बताऊँ कि हम साधुओं के दीक्षा लेने के भाव वैâसे हुए और हमारा साहस वैâसे बढ़ा? इसके लिए भावसंग्रह गं्रथ में श्री देवसेन आचार्य ने बहुत सुन्दर और महत्त्वपूर्ण श्लोक लिखा है-
वरिस्सहस्सेण पुरा, जं कम्मं हणइ तेण काएण।
ते संपइ वरिसेण हु, णिज्जरयइ हीणसंहणणे।।१३१।।
चतुर्थकाल में साधु जितने कर्मों को अपने शरीर से १००० वर्ष में नष्ट करते थे, उतने कर्मों को वर्तमान काल में हीन संहननधारी साधु १ वर्ष में नष्ट कर देते हैं। आप उदाहरण देख लीजिए भगवान ऋषभदेव की आयु ८४ लाख पूर्व वर्ष की थी, उन्होंने एक हजार वर्ष में कर्म नष्ट करके केवलज्ञान प्राप्त किया। भगवान महावीर को १२ वर्ष में केवलज्ञान हो गया।
मैं अपनी बताऊँ, जैसा मैंने अनुभव किया है। सन् १९५२ में मैंने घर छोड़ा, सन् १९५३ में मैंने दीक्षा धारण की, उस समय की शक्ति और संहनन बहुत अच्छा था। सन् १९६२ की दिसम्बर में मैंने सम्मेदशिखर की यात्रा के लिए विहार किया, उस समय प्रात: पौष, माघ की भयंकर ठण्डी में हम लोग विहार कर देते थे जबकि कुहरे के कारण एक-दूसरे का हाथ भी नहीं दिखता था। धोती एकदम गीली हो जाती थी फिर भी जुकाम, बुखार नहीं आता था लेकिन आज क्या है? शरीर वही है, पर धीरे-धीरे शक्ति और संहनन में इतनी कमी आई है कि सर्दी में अन्दर कमरे में बैठे-बैठे ही जरा सी बाहर बारिश हुई कि जुकाम हो जाता है, छींक आने लगती है, हाथ पैर गलने लगते हैं। उस समय ऐसे मौसम में भी विहार करते-करते हम लोग छ: महीने में सम्मेदशिखर पहुँच गये थे लेकिन २००२ में जब दिल्ली से कुण्डलपुर के लिए विहार किया, तब कुण्डलपुर पहुँचने में एक वर्ष लग गया। एक चातुर्मास प्रयाग में किया फिर कुण्डलपुर पहुँची, बात यही है कि उम्र के अनुसार शक्ति की हीनता अपने शरीर में ही आती है जिसे हम सभी अनुभव करते हैं।युवावस्था में मैं २-२ घंटे एक आसन से बैठ जाती थी, पिण्डस्थ, पदस्थ आदि का ध्यान भी करती थी। २-२ घंटे आसन नहीं बदलती थी और आज ४८ मिनट भी एक आसन में बैठना कठिन हो जाता है। कहीं कमर में दर्द हो जाता है, कहीं पैर में। बात यही है कि समय के अनुसार शक्ति में अन्तर तो पड़ता ही है। चतुर्थकालीन साधु की शक्ति और वर्तमानकालीन साधु के शरीर की शक्ति में बहुत ज्यादा अन्तर है।
आज सभी का शरीर माता-पिता के रजवीर्य से बना हुआ है। मैं हमेशा चिन्तन करती हूँ और कहती हूँ कि आप जो चतुर्थकालीन साधु, जिनकल्पी, एकाकी विचरण करने वाले महान साधु, पर्वत की चोटी पर ध्यान करने वाले, वङ्का भी सिर पर गिरे, कोई सिगड़ी भी जला दे, ऐसे साधु को ढूंढ रहे हैं। देखो! पाण्डवों को मुनि अवस्था में लोहे के तपाये हुए आभूषण पहना दिए, पर वे आत्मध्यान में लीन होकर कर्मों को नष्ट करके क्षणमात्र में मोक्ष को प्राप्त हो गये। तद्भव मोक्षगामी-चरम शरीरी ऐसे साधु को आप ढूंढ रहे हैं, तो हम ढूंढ रहे हैं चतुर्थकालीन श्रावक को। देखो! वारिषेण, सुदर्शन श्रावक अष्टमी-चतुर्दशी को श्मशान भूमि में जाकर वस्त्र का त्याग करके नग्न होकर ध्यान में पाषाण की मूर्ति के समान खड़े हो जाते थे। एक बार राजा श्रेणिक के सुपुत्र वारिषेण कुमार के सामने ध्यान अवस्था में चोर ने एक हार चोरी करके लाकर डाल दिया। कर्मचारियों ने समझा यही चोर है उन्होंने राजा श्रेणिक से जाकर सब बता दिया। राजा श्रेणिक ने कहा-इसे मृत्युदण्ड दिया जाए, तलवार की धार से इसकी गर्दन अलग कर दो लेकिन वारिषेण की तपस्या का प्रभाव, वह तलवार फूल की माला बन गई। जब राजा श्रेणिक को पता लगा तो वे दौड़े-दौड़े आए और अपने पुत्र से माँफी मांगने लगे लेकिन वारिषेण कुमार ने कहा-पूज्य पिताजी! इसमें आपका कोई दोष नहीं है। यह तो मेरे पूर्वजन्म के अशुभ कर्म का उदय आ गया था लेकिन आज मैंने नियम कर लिया था कि अगर मैं इस संकट से बचूँगा तो मैं नियम से जैनेश्वरी दीक्षा ले लूँगा, करपात्र में ही आहार करूँगा, अब वस्त्र पहनकर घर नहीं जाऊँगा।तो आज हमें भी ऐसे श्रावक चाहिए। जब आप ऐसे श्रावक बनोगे तो ऐसे मुनि भी बन जायेंगे, जैसे की आप चाहते हो। आप में से ही मुनि बनेंगे। मुनि अलग आकाश से नहीं गिरते हैं, कहीं स्वर्ग से नहीं आते हैं वे भी आप जैसे माता-पिता से ही जन्म लेकर मुनि बनते हैं।
सेठ सुदर्शन जी भी अष्टमी-चतुर्दशी को श्मशान भूमि में जाकर नग्न दिगम्बर मुनि बन करके ध्यान में लीन हो जाते थे। एक बार रानी सेठ सुदर्शन पर मोहित हो गई थी, तब उसने युक्ति से श्मशान भूमि में दासियों को भेजकर उन्हें महल में उठवा लिया। रानी ने लाखों चेष्टाएं की लेकिन वे रंचमात्र भी चारित्र से च्युत नहीं हुए। ‘काष्ठवत् त्यक्त देहा’ काठ की मूर्ति के समान, पत्थर की मूर्ति के समान बने रहे, टस से मस नहीं हुए। उन्होंने रानी के उपसर्ग को पूर्णरूपेण सहन किया। जब रानी ने देखा कि इस पर कोई असर नहीं हो रहा है और प्रात:काल होने को है, तब उसने उपद्रव कर दिया। अपने कपड़े फाड़ दिए, शरीर पर खरोंचे बना लीं और कहा कि यह मेरा शील भंग करने आया था। जब राजा को इस बात का पता चला तो उन्होंने आकर सेठ सुदर्शन के लिए प्राणदण्ड का हुक्म दे दिया लेकिन उनकी भी देवों ने आकर रक्षा की। तलवार की धार फूलों की माला बनती चली गई। हम भी ऐसे श्रावकों को चाहते हैं कि जो अष्टमी, चतुर्दशी को उपवास करें, ध्यान करें। आज ऐसे श्रावक हों तो हमें कितना अच्छा लगे।
शिवकुमार श्रावक जो कि चक्रवर्ती के पुत्र थे, जिन्होंने तीन हजार वर्ष तक रानियों के बीच में रह करके अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत पाला और उन्हें उपदेश दिया। उसके मित्र भोजन लाकर भोजन कराते थे, तो वे करते थे। पिता ने दीक्षा लेने की आज्ञा नहीं दी थी। घर में रहकर उन्होंने इस प्रकार से असिधारा व्रत पाला था। कालान्तर में वे मरकर जम्बूकुमार हुए हैं। माँ-पिता ने जम्बूकुमार की जबरदस्ती शादी कर दी। रात्रि में उसकी चारों पत्नियाँ उसे समझाती रहीं, राग की बातें करती रहीं लेकिन वे वैराग्य की बातें करते रहे और प्रात: मुनिराज के पास जाकर दीक्षा ले ली। तो ऐसे श्रावक बनो, यह हम भी चाहते हैं, बात यही है कि कहना सहज है लेकिन आज आप चतुर्थकालीन श्रावक नहीं बन सकते, आप रात्रि भोजन नहीं त्याग कर सकते, प्रात: होते ही आपको चाय चाहिए। आप संयम नहीं धारण कर सकते, व्रती नहीं बन सकते, अणुव्रती नहीं बन सकते, प्रतिमाधारी नहीं बन सकते।फिर भी आज आप घर में रहकर ६ प्रतिमा तक धारण कर सकते हैं, घर में पत्नी के बीच रहते हुए ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर सप्तम प्रतिमा धारी श्रावक बन सकते हैंं। सोलापुर में श्रीगुलाबचंद चंडक और उनकी पत्नी सप्तम प्रतिमाधारी थे, घर में रहते थे। उनके साथ में एक और सज्जन शायद कस्तूरचंद नाम था, वे भी सप्तम प्रतिमाधारी थे। जब हमने सोलापुर से विहार किया तो वे विहार में संघ का संचालन करते हुए साथ में रहे। ऐसे अनेकों श्रावक देखे जाते हैं।
आचार्यों ने पंचमकाल के साधुओं के लिए कहा है कि वे मंदिरों में, शहरों में, गाँवों में, खाली मकान में, धर्मशाला आदि में रह सकते हैं इसमें कोई बाधा नहीं है। मैंने इसके बहुत से प्रमाण ‘दिगम्बर मुनि’ और ‘प्रवचननिर्देशिका पुस्तक में दिये हैं। सम्यग्ज्ञान में भी बहुत से प्रमाण छपाए हैं। चतुर्थकाल में भी मुनि घरों में, धर्मशालाओं में, मंंदिरों में रहते थे। श्रीरामचन्द्रजी जिस समय वन में चले गये, उनके भाई भरत अयोध्या के मंदिर में पहुँचे और वहाँ द्युति नाम के भट्टारक-आचार्य विराजमान थे, उनका बहुत बड़ा संघ था भरत ने उनसे नियम लिया कि मेरे भाई श्री रामचन्द्र जी के वापस आने के बाद मैं दीक्षा ले लूँगा आदि-आदि। और भी बहुत से उदाहरण हैं-मुनियों के संघ, आर्यिकाओं के संघ मंदिर में रहते थे। आप पुराण पढ़ के देखें तो ज्ञात होगा कि पहले सब साधु जंगल में ही रहते थे, ऐसी बात नहीं है।
पंचमकाल में आज संहनन हीन होने से तपस्या विशेष नहीं हो सकती है। जंगल में ध्यान विशेष नहीं हो सकता है। आतापन योग आदि तो उत्तरगुण हैं। २८ मूलगुणों का पालन करने वाले साधु आज भी हैं। २८ मूलगुणों का कोई जंगल से संबंध नहीं है। आतापनयोग करना, प्रतिमायोग करना, जंगल में जाकर ध्यान में खड़े होना, जंगल में रहना आदि उत्तरगुण हैं। आज हीन संहनन से जितना तपश्चरण आदि करके कर्म निर्जरा कर रहे हैं, उससे शीघ्र मोक्ष के निकट पहुँच रहे हैं। आगे निसर्गत: ऐसी शक्ति प्रगट होगी। इस भव में तो निश्चित है, मोक्ष तो होगा नहीं। स्त्री पर्याय से मोक्ष होता नहीं। पुरुषों को भी पंचमकाल में मोक्ष होगा नहीं, वे स्वर्ग जायेंगे, वहाँ देव होंगे और वहाँ से आकर मनुष्य बनेंगे, तब तक चतुर्थकाल आ जायेगा क्योंकि देवों की जघन्य आयु ८४ हजार वर्ष है। तब इतनी शक्ति अपने आप मिल जायेगी कि खूब अच्छी तरह से परीषहों और उपसर्गों को सहन करके, आतापन आदि योगों को धारण करते हुए कर्मों की निर्जरा करते हुए मोक्ष को प्राप्त कर लेंगे।
चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज का उदाहरण मैं दिया करती हूँ-जब आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज कोन्नूर की एक गुफा में बैठे हुए थे, उस समय दो ब्रह्मचारी उनके पास पहुँचे, उन्होंने उन्हें नमस्कार नहीं किया। उनके नाम थे-खुशालचंद जी पहाड़े और हीरालाल जी गंगवाल। उन्होंने महाराज से प्रश्नोत्तर चालू कर दिया, फिर बीच में ही बोले-मुनि श्री! हम आपको साधु नहीं मानते, साधु को तो अवधिज्ञान होना चाहिए, ऋद्धियाँ होनी चाहिए, जो आपमें दिखती नहीं हैं। महाराज जी ने प्रेम से ही उन्हें उत्तर दिया, ठीक है, मत मानो बाबा। वे और भी जो प्रश्न करते रहे, वे शान्तिपूर्वक उनका उत्तर देते रहे। मुनि श्री शांतिसागर जी महाराज बहुत विलक्षण बुद्धि के धारक महान थे, उन्हें अपने चारित्र पर बहुत गौरव, आत्मविश्वास और स्वाभिमान था कि हम निर्दोष चारित्र को पालन करने वाले सच्चे साधु हैं। भगवान महावीर के शासन में कुन्दकुन्ददेव के मूलाचार के अनुसार हमारी प्रवृत्ति है। भगवती आराधना आदि ग्रंथों के अनुसार हमारी प्रवृत्ति है। उन्होंने उन दोनों ब्रह्मचारियों को अपने सामने एक वृक्ष दिखाया, बोले-यह वृक्ष किसका है? वे दोनों बोले-आम का, मराठी में बोले-अम्बा च आहे। तो महाराज बोले-मैं इसको आम का वृक्ष नहीं मानता। उन्होंने कहा-क्यों नहीं मानते? क्योंकि इसमें बौर नहीं है, फल नहीं है, इसलिए हम इनको आम का वृक्ष नहीं मानते। तो ब्रह्मचारी बोल पड़े-अरे महाराज जी! यह आम का ही वृक्ष है, अभी आम का मौसम नहीं है, जब मौसम आयेगा, तब इसी वृक्ष में बौर आयेगा, फूल आयेगा और इसी में फल आयेगा। बस महाराज जी बोल पड़े-वैसे ही हम साधु हैं, आज हीन संहनन है अत: अवधिज्ञान, ऋद्धि आदि का समय नहीं है, उत्तरगुणों को पालन करने का समय नहीं है, जबकि उनके उत्तरगुण विशेष थे फिर भी उन्होंने कहा कि जब समय आयेगा, चतुर्थकाल आयेगा, उत्तमक्षेत्र, काल, भाव की सामग्री मिलेगी, तब हम घोर तपस्या करके अवधिज्ञान क्या केवलज्ञान प्राप्त कर लेंगे। यह सुन वे दोनों आचार्यश्री के प्रति नतमस्तक हो गये और उन्हें अपना गुरु बना लिया।
देखिए, उनका ३६ वर्ष का दीक्षित जीवन जिसमें उनके उपवासों की गणना कीजिए। साढ़े पच्चीस वर्ष की संख्या उपवासोें की आती हैं ये उत्तरगुण नहीं तो क्या हैं? बारह प्रकार के तप और २२ प्रकार के परीषहों को सहन करना ये उत्तरगुण हैं। वे गुफाओं में, जंगलों में बैठकर ध्यान करते थे। कई बार उन पर सर्प चढ़ गया, चींटी का उन पर उपसर्ग हुआ, उन्होंने अनेकों उपसर्ग झेले हैं। सर्दी-गर्मी को भी सहन करते थे। ४-४, ५-५ घंटे बैठकर ध्यान किया है। कितने दिनों तक अन्न का त्याग किया है। इसके पूर्व भी एक रस लेते थे।आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज का आहार मैंने देखा है। श्रावक रोटी बनाकर उसे चूर देते थे, उस रोटी के चूरमे को मट्ठे से वे लेते थे। पहले दूध लेते एक रस। दीक्षा के बाद मैंने उन्हें कभी छहों रस लेते नहीं देखा। ६-६, ७-७ वर्ष तक एक धान लिया है। केवल एक गेहूूँ अथवा चावल धान। मैंने स्वयं भी कभी एक रस, कभी दो रस लिया है। बात यह है कि यह सब त्याग करना जिह्वा इन्द्रिय को अपने वश मेंं रखना है। समय-समय पर जितना बन सके, उतना उपवास आदि करना चाहिए। मैंने देखा है एक-एक महीने का उपवास करने वाले भी साधु रहे हैं। हमारे साथ में एक पद्मावती नाम की आर्यिका थी, जिन्होंने दो बार भादों में १-१ महीने के उपवास किए। पहली बार जब बत्तीस उपवास किए तो उसमें बीच में १-२ बार पानी और १-२ बार दूध लिया था, दूसरी बार ३२ उपवास में दूध नहीं लिया था, २ बार पानी लिया था। दूसरी बार ३२ उपवास के अंत में उनकी समाधि हुई है। १ दिन उपवास और १ दिन पारणा करने वाली, हमारी कई शिष्याएँ रही हैं। आर्यिका पद्मावती, आर्यिका जिनमती आदि जो १ उपवास, १ पारणा करके विहार भी करतीं, मेरी वैय्यावृत्ति भी करतीं, स्वाध्याय भी करतीं, पढ़तीं और पढ़ाती भी। उनकी पूरी दैनिक चर्या निराबाध निर्विघ्न चलती थी।
आज भी साधु १०-१० उपवास करके आपके सामने आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं। आपके साधु पदविहार करते हैं, केशलोंच करते हैं, एक बार ही करपात्र में भोजन करते हैं, कभी दूसरी बार भोजन नहीं करते हैं। कितनी भी सर्दी पड़े, केवल घास लेते हैं, कभी कम्बल नहीं लेते हैं। आज साधु समय, शरीर की शक्ति के अनुसार चर्या का पालन कर रहे हैं। तृण-घास लेने की, चटाई, पाटा लेने की शास्त्र में आज्ञा है। आर्यिकाएं एक वस्त्र मात्र परिग्रह रखती हैं, दो साड़ी का नियम है। १ साड़ी १ दिन, दूसरी दूसरे दिन। अगर बुखार आ गया या कोई विशेष समस्या हुई तो यह नहीं कि दूसरी साड़ी ओढ़ लें। उसी एक साड़ी में रहेंगी, दूसरी साड़ी दूसरे दिन पहनेंगी।
सन् १९८५ में जब मैं बहुत अस्वस्थ थी, उस समय कई बार यहाँ श्वेताम्बर साध्वियाँ और श्वेताम्बर साधु आ जाते थे। वे मुझसे बहुत आग्रह करते और कहते-अरे! ‘आपत्तिकाले मर्यादा नास्ति’। आप तो और वस्त्र लो, औषधि भी लो, बाद में प्रायश्चित्त ले लेना। क्या होता है? उनके यहाँ साधु अस्वस्थ होते हैं, तत्काल ही हॉस्पिटल ले जाकर भर्ती करा देते हैं, सब दवाई लेते हैं। आप्रेशन, दवाई, इंजेक्शन उनका सब चलता है। रात-दिन का कोई भेदभाव नहीं रहता है। चातुर्मास में भी दूसरे स्थान इलाज कराने ले जाते हैं लेकिन अपनी दिगम्बर चर्या में ऐसा नहीं है। वैâसी भी सीरियस स्थिति आ जाये। मई २००७ में मुझे बुखार आ गया था, टाइफाईड हो गया था, जरा सा पानी, रस लेना भी मुश्किल हो रहा था। बैठना मुश्किल हो रहा था, ऐसी स्थिति में भी जैसे-तैसे २४ घंटे में एक बार जरा सा जल, जरा सा शुद्ध चिरायते का काढ़ा लिया। उसी के बल पर, संयम के बल पर, आत्मबल पर ,मनोबल पर और भगवान का नाम स्मरण करते हुए उठकर बैठ गई। तो बात यही है कि आज भी दिगम्बर जैन साधु बीमारी को, कष्ट को झेलते हैं लेकिन चर्या में शिथिलता नहीं आने देते, यह क्या है? यह निर्दोष चर्या आगम के अनुरूप है। देखा जाये तो आज भी दिगम्बर जैन साधु अपने पूरे २८ मूलगुणों का पालन कर रहे हैं।
श्री यतिवृषभाचार्य, श्री कुन्दकुन्ददेव ने कहा है-
भरहे दुस्समकाले, धम्मज्झाणं हवेइ साहुस्स।
तं अप्पसहावठिदे, ण हु मण्णइ सो हु अण्णाणी।।
इस भरत क्षेत्र में दु:षमकाल में साधुओं को आत्म स्वभाव में स्थित होने पर धर्मध्यान होता है, शुक्लध्यान नहीं होता, किन्तु जो ऐसा नहीं मानते, वे अज्ञानी हैं, मिथ्यादृष्टि हैं इसलिए हमेशा ध्यान में रखो कि आज भी चतुर्विध संघ परम्परा अविच्छिन्न चल रही है। मुझे आज गौरव है सन् १९५२ में जब मैंने घर छोड़ा था, उस समय मुश्किल से अधिकतम १०० के अंदर ही साधु थे। उत्तर और दक्षिण के मिलाकर अधिकतम १५ या २० मुनि थे, १५-२० करीब आर्यिकाएं थीं, कुछ क्षुल्लक और क्षुल्लिकाएं थीं। आज वृद्धि होते-होते, मेरे देखते-देखते सन् १९५२ से आज १००० से अधिक संख्या में दिगम्बर जैन साधु-साध्वी हैं। मुनि, आर्यिका, ऐलक, क्षुल्लक और क्षुल्लिका ये पाँच प्रकार के साधु होते हैं, इनमें से लंगोटी मात्र को धारण करने वाले ऐलक हैं। यह प्रसन्नता की बात है कि आज छोटी-छोटी उमर में दीक्षा ले रहे हैं, तपश्चरण कर रहे हैं, धर्म की खूब प्रभावना कर रहे हैं, पढ़-लिखकर खूब प्रवचन कर रहे हैं और अपनी चर्या निराबाध पाल रहे हैं। वे ध्यान कर रहे हैं, पद विहार कर रहे हैं, केशलोंच कर रहे हैं।एक बात और ध्यान में रखना कि दिगम्बर जैन साधुओं की चर्या एक खुली किताब है जिसे आप जब चाहे पढ़ लें। वे केशलोंच, आहार, विहार, सामायिक आदि खुले में करते हैं। सारी चर्या उनकी खुली है, जब चाहे दिन में, रात में आकर उनकी चर्या देख सकते हैंं।सन् १९७५-७६ में एक प्रâांस की महिला मेरे पास आई-एन. शांता। उन्हें विद्वानों ने मेरे पास भेजा था। वो क्रिश्चियन साध्वी एवं जैन साध्वी पर थीसिस लिख रही थी। लोगों ने कहा कि ज्ञानमती माताजी से जैन साधुओं की चर्या जाकर समझो। वह केवल मुझसे साधुओं की चर्या ही नहीं पूछना चाहती थीं बल्कि वह चाहती थीं कि मैं पूरी चर्या सुबह से शाम तक देखूँ। मैंने कहा-बिल्कुल ठीक है, देखो आप। हम शौच को जाते, लघुशंका को जाते, साथ-साथ आती, महिला थी अत: कोई बात का संकोच नहीं था। हमको देखती, वैâसे हम शुद्धी करते हैं, वैâसे कायोत्सर्ग करते हैं, वैâसे मौन से रहते हैं, इनकी चर्या क्या है, आहार भी पूरा देखती, आहार के बाद उसी थाली का प्रसाद लेती। उस समय मैं नमक नहीं लेती थी, बिना नमक का रूखा-सूखा भोजन। २२ वर्ष तक मेरा नमक का त्याग रहा है। उस समय मैं नमक नहीं लेती, घी नहीं लेती, कभी दूध लिया तो लिया नहीं तो नहीं। ऐसा नीरस भोजन, फिर भी वो कहती कि हम इसी थाली का खायेंगे और भी सब चर्या मेरी देखती वैâसे सामायिक करती हैं, वैâसे आवर्त करती हैं, कितने आवर्त, कितनी शिरोनति, कितनी बार पंचांग प्रणाम, कितनी बार किस प्रकार कौन सी मुद्रा से सामायिक भक्ति का पाठ करना, चैत्यभक्ति का पाठ करना आदि सारी क्रियाएं बहुत बारीकी से देखती थीं। माताजी एक साड़ी वैâसे पहनती हैं? वैâसे एक साड़ी में रहती हैं, ये सारी क्रियाएँ देखती। तो बात यही है कि जैन साधु की सारी क्रियाएँ खुली किताब है। जब चाहे आप उसे देख लो और दूसरे साधुओं को मैंने देखा है कि भोजन कमरा बंद करके करते हैं, प्रतिक्रमण में किसी को आने नहीं देते हैं….. आदि।
कलकत्ते में जब मेरा चातुर्मास हुआ था, उस समय कुछ लोगों ने कुछ चर्चाएँ उठाई थीं, उस समय मैंने उनसे कहा था कि आप यह नियम करो कि पहले हम एक महीना साधु के संघ में रहेंगे, फिर आप अनुभव करेंगे कि ये पंचमकालीन साधु सही हैं, सच्चे हैं कि नहीं, भावलिंगी हैं कि नहीं और निर्दोष चारित्र को पालन करते हैं कि नहीं।पण्डित श्री जगन्मोहनलालजी-कटनी ने आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज की महीनों परीक्षा की थी गुप्तचर बन करके, सी.आई.डी के रूप में परीक्षा करते रहे थे। जब उन्हें महाराज की चर्या अच्छी लगी, तब उन्होंने अपने आपको महाराज के प्रति समर्पित किया और उनसे प्रतिमा के व्रत ग्रहण किए। यह संस्मरण उन्होंने स्वयं लिखा हुआ है। बात यही है कि जब व्यक्ति निकट आता है, तब उसे साधु के बारे में सही पता चलता है कि ये वैâसे हैं, क्या हैं?
जो साधुओं को नहीं मानते हैं, मेरा उनके लिए बार-बार कहना है, आह्वान है, चैलेंज है कि आओ, साधुओं की चर्या देखो और स्वयं साधु बनकर दिखाओ, तब ज्ञात होगा कि साधु की वैâसी चर्या पंचमकाल में होती है? इस प्रकार देखा जाये तो यह बिल्कुल सत्य है कि जब आप चतुर्थकालीन श्रावक बनकर दिखायेंगे तो आपको अवश्य चतुर्थकालीन मुनि भी दिख जायेंगे।