गुड़, महुआ आदि मादक वस्तु को सड़ाकर जो बने, उसका नाम शराब है। इसमें प्रतिक्षण अनंत संमूर्च्छन त्रस जीव उत्पन्न होते रहते हैं। शराब अनंत जीवों के कलेवर से निकाला जूस है, इससे अनेकों हानियाँ हैं, इसको पीते ही मनुष्य उन्मत्त हो जाता है एवं बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है।किसी समय भगवान नेमिनाथ की दिव्यध्वनि से श्रीकृष्ण को मालूम हुआ कि १२ वर्ष के बाद शराब के निमित्त से द्वीपायन मुनि द्वारा द्वारिका नगरी भस्म हो जायेगी। तब श्री कृष्ण ने आकर सारी मदिरा को गांव के बाहर कंदराओं में फिकवा दिया पुन: १२ वर्ष बीत चुके, ऐसी भ्रांतिवश कुछ दिन पहले ही द्वीपायन मुनि द्वारिका के बाहर आकर ध्यान में लीन हो गये। इधर द्वारिकापुरी के राजकुमारों ने वनक्रीड़ा को जाते हुए प्यास से पीड़ित होकर मदिरा को पानी समझकर पी लिया और उन्मत्त होकर नाचते गाते हुए नगर को आ रहे थे कि मार्ग में द्वीपायन मुनि को देखकर उन पर पत्थरों की और खोटे शब्दों से गालियों की वर्षा की। मुनिराज ने बहुत कुछ सहन किया। अंत में क्रोध के वश तेजस पुतला द्वारा मुनि ने चारों ओर से द्वारिकापुरी को जला दिया और मरकर दुर्गति में गमन किया। यह सब शराब का ही दुष्फल है। उस समय वहाँ का दृश्य कितना दयार्द्र था, जिसका कोई वर्णन नहीं कर सकता। मात्र श्रीकृष्ण और बलभद्र ही वहाँ से निकलकर बचे थे। इस प्रकार शराब पीने से वैंâसर, फेफड़ों में खराबी एवं नाना प्रकार के रोग हो जाते हैं। पागल के समान घूमता हुआ व्यक्ति सत्य-असत्य को भी नहीं जान पाता है। ऐसे शराब को हमेशा के लिए त्याग कर देना चाहिए। इसी पर एक और कथा है-
एक व्यक्ति शराब पीकर मार्ग में जा रहा था, उधर से हाथी पर बैठे हुए राजा निकले। राजा को देखकर उसने कहा-अब हाथी बेचता है-इतने में ही राजा तलवार निकालकर उसे मारने चला, तब मंत्री ने रोक दिया-बोला-महाराज! यह व्यक्ति नहीं बोल रहा है यह इसके शराब पीने का दोष है। मंत्री ने एक दिन उसी व्यक्ति को लाकर राजा के पास खड़ा कर दिया। कांपता हुआ भयभीत वह व्यक्ति बड़ी विनय से राजा को नमस्कार कर बैठ गया। राजा ने पूछा-अब हाथी लेता है क्या? उसने कहा-महाराज! मैं क्या हाथी खरीद सकता हूँ? इससे यह मालूम पड़ता है कि शराब के नशे में व्यक्ति क्या-क्या अनर्थ नहीं करता अर्थात् सब कुछ अनर्थ करता है। यदि मंत्री नहीं रोकता तो उस व्यक्ति की हत्या हो जाती अत: हर कार्य को खूब सोच समझकर करना चाहिए। जब एक-एक व्यसन इतने दुखदाई हैं फिर जो सातों व्यसनों को करेंगे, उनकी क्या दशा होगी? इसलिए सातों व्यसनों का त्याग करके सदाचारी जीवन को अपनाना चाहिए।