‘प्रकर्षेण’-प्रकृष्ट रूप से-संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय का व्यवच्छेद-निराकरण करके स्व और पर स्वरूप को जो ‘मिमीते जानाति’ जानता है, या ‘मीयतेऽनेन’ जिसके द्वारा जाना जाता है अथवा ‘मितिमात्रं’ जानना मात्र प्रमाण है। प्रमाण शब्द की ऐसी व्युत्पत्ति होती है। निश्चय और व्यवहारनय के द्वारा द्रव्य और पर्याय में अभेद और भेद की विवक्षा से उस प्रकार की संभव है अर्थात् निश्चयनय से द्रव्य और पर्याय में अभेद होने से ‘प्रकर्षेण मिमीते इति प्रमाणं’ जो प्रकर्ष रीति से जानता है वह जानने वाला आत्मा ही प्रमाण है क्योंकि ज्ञान और आत्मा में कोई भेद नहीं है और व्यवहारनय से द्रव्य-पर्याय में भेद होने से ‘मीयतेऽनेनेति प्रमाणं’ जिसके द्वारा जाना जाय वह प्रमाण है, यहाँ आत्मा कर्तारूप और ज्ञान करण रूप होने से आत्मा से ज्ञान में कथंचित् भेद विवक्षित है।
अज्ञान को प्रमाण मान लेने से उस अज्ञान से संशय आदि मिथ्या ज्ञानों का निराकरण करना शक्य नहीं है क्योंकि वे अज्ञान के अविरोधी हैं। जो जिसका विरोधी होता है वही उसको अलग कर सकता है ,अन्य नहीं कर सकता है। जैसे कि प्रकाश अंधकार का विरोधी होने से उसे दूर कर देता है। अज्ञानस्वरूप सन्निकर्षादि संशय आदि मिथ्याज्ञान के निराकरण करने वाले नहीं हैं इसलिए वे सन्निकर्ष आदि प्रमाणता को वैâसे प्राप्त हो सकते हैं ?
सन्निकर्षवाद का खंडन-रूप के समान रस में भी चक्षु इंद्रिय का संयुक्त समवाय लक्षण सन्निकर्ष विद्यमान है। फिर भी वह सन्निकर्ष-संबंध उसके ज्ञान में हेतु नहीं है अर्थात् जैसे चक्षु रूप को देख रही है वैसे ही रस को भी देख रही है, रस के साथ भी उसका सन्निकर्ष लक्षण संबंध मौजूद है फिर भी वह चक्षु रस का ज्ञान नहीं कर पाती है। रस का ज्ञान रसना इंद्रिय से ही तो होता है।
चक्षु इन्द्रिय का भी रूप के साथ सन्निकर्ष-स्पर्श करके जानने रूप संबंध नहीं है, क्योंकि वह चक्षु इंद्रिय अप्राप्त-बिना स्पर्श किये ही पदार्थों का प्रकाशन करती है। देखिये! पर्वत आदि को देखते समय चक्षु पर्वत आदि अर्थरूप प्रदेश के पास नहीं जाती है और न वे पर्वत आदि चक्षु इंद्रिय के स्थान तक आते हैं जिससे कि चक्षु का पदार्थ के साथ संयोग इन दोनों का अपने-अपने योग्य प्रदेश में अवस्थित रहना ही प्रतीति में आ रहा है।
वैशेषिक-उस चक्षु के तेज का संयोग है ही है।
जैन-ऐसा आप नहीं कर सकते। तेज का संयोग होने से तो अंधकार का ही विच्छेद होगा न कि संशयादि मिथ्या ज्ञानों का। क्योंकि तेज का संशय आदि से कोई विरोध नहीं है, ऐसा मैंने पहले ही कह दिया है।
इसलिए सन्निकर्ष प्रमाण नहीं है, अचेतन होने से घट आदि के समान।
भावार्थ-वैशेषिक कहता है कि इंद्रियों का पदार्थ को छूकर जानना सन्निकर्ष है और वही प्रमाण है। तब आचार्य ने कहा जैसे चक्षु का रूप से संबंध है वैसे ही रस से भी है पुन: रूप को तो जान लें और रस को न जाने यह क्या बात है। दूसरी बात यह है कि चक्षु इंद्रिय तो अप्राप्यकारी है, पर्वत आदि प्रदेश बहुत दूर हैं। उन पर अग्नि जल रही है चक्षु ने देख लिया है किन्तु न पर्वतादि चक्षु से स्पर्शित हुए हैं और न चक्षु ही उनके पास गई है। ये लोग चक्षु में एक तेजोद्रव्य मानते हैं वह भी कल्पना निराधार है तथा यदि चक्षु में तेज मान भी लें तो भी वह तेज अंधकार को दूर करेगा न कि संशयादि को। इसलिए सन्निकर्ष प्रमाण नहीं है।