अन्विताकार (यह वही है) द्रव्य और व्यावृत्ताकार (यह वह नहीं है) पर्याय है। ये द्रव्य और पर्याय जिसके स्वभाव-धर्म हैं वह द्रव्यपर्यायात्मक कहलाते हैं। चेतन-अचेतन सभी पदार्थ द्रव्य पर्यायात्मक ही होते हैं। वे परमार्थरूप से वैसे होते हैं न कि कल्पना मात्र से क्योंकि अन्यथारूप से अर्थ-पदार्थ हो नहीं सकते हैं। उसी का स्पष्टीकरण-
प्रमाण के विषयभूत जीवादि पदार्थ द्रव्य पर्यायात्मक हैं क्योंकि वे प्रमाण के विषय हैं। जो द्रव्य पर्यायात्मक नहीं होता है वह प्रमाण का विषय भी नहीं होता है। जैसे-बन्ध्या का पुत्र। और प्रमाण के विषय जीवादि हैं इसलिए वे द्रव्य पर्यायात्मक हैं। इस अनुमान वाक्य से प्रमाण के विषय जीवादि पदार्थ द्रव्य पर्यायात्मक सिद्ध हो जाते हैं।
एकांत से द्रव्य ही अथवा पर्याय ही अथवा परस्पर में निरपेक्ष ये दोनों ही अर्थक्रिया में समर्थ नहीं हैं, जिससे कि वे प्रमाण के विषय हो जावें क्योंकि उस-उस एकांत में क्रम और युगपत् का अभाव होने से अर्थ- क्रिया नहीं हो सकती है। ये क्रम और युगपत् दोनों ही अनेकांत से व्याप्त हैं अत: अनेकांत के बिना नहीं हो सकते हैं।
इन क्रम युगपत् से अर्थक्रिया व्याप्य है और उस अर्थक्रिया से प्रमेय व्याप्य है तथा व्यापक का अभाव परम्परा से भी व्याप्य के अभाव को सिद्ध कर ही देता है। व्याप्य का सद्भाव व्यापक को सिद्ध करता है अत: हमें इसकी चिंता से क्या प्रयोजन है।
शंका-अर्थक्रिया प्रमेय से वैâसे व्यापक है ?
समाधान-ऐसा नहीं कहना। उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य की परिणतिरूप लक्षण वाली अर्थक्रिया में ही अथवा बहिरंग-अंतरंग पदार्थ में प्रमाण की प्रवृत्ति होती है अन्यथा गृहीत को ग्रहण करने वाले होने से सभी ज्ञान अप्रमाणीक हो जावेंगे और विषय रहित होने से असत् रूप हो जावेंगे क्योंकि उस प्रकार की अर्थक्रिया के बिना स्वप्न में भी अस्तित्व उपलब्ध नहीं होता है और असत् अभाव प्रमेय नहीं होता है।
शंका-अनेकांत क्रम और युगपत् में वैâसे व्यापक है ?
समाधान-ऐसा नहीं कहना। पर्याय की अपेक्षा से देश, काल का क्रम और द्रव्य की अपेक्षा से युगपत् संभव है अर्थात् सभी वस्तुओं में पर्याय की अपेक्षा से देश और काल का क्रम देखा जाता है और द्रव्य की अपेक्षा से अक्रम रहता है।
भावार्थ-अपने कार्य का करना अर्थक्रिया कहलाती है। जैसे-घट की जलधारण अर्थक्रिया है। ज्ञान की हेयोपादेय के त्याग और ग्रहणरूप अर्थक्रिया है। यहाँ यह बतलाया है कि केवल अकेला द्रव्य या मात्र स्वतंत्र पर्यायें या परस्पर में एक-दूसरे की अपेक्षा नहीं रखते हुए दोनों ही अर्थ में क्रिया को नहीं कर सकते हैं इसलिए प्रमाण के द्वारा जाने नहीं जा सकते हैं। पुन: यह बतलाया है कि एकांत में क्रम और अक्रम न होने से अर्थक्रिया नहीं है क्योंकि ये क्रम-अक्रम दोनों ही अनेकांत से व्याप्त हैं। (संबंध रखते हैं-अनेकांत के होने पर ही होते हैं) और इन क्रम-अक्रम से अर्थक्रिया व्याप्य है और उस अर्थक्रिया से प्रमेय-प्रमाण का विषय व्याप्य है। ‘व्यापकं तदतन्निष्ठं व्याप्यं तन्निष्ठमेव च’ व्यापक तत् और अतत् दोनों में रहता है और व्याप्य तत् में ही निष्ठ रहता है। जैसे-वृक्षत्व ये व्यापक है नीम आदि सभी वृक्षों में है और नीम व्याप्य है वह उसी में रहता है।
व्यापकरूप वृक्षत्व का अभाव अपने व्याप्यरूप नीम के अभाव को ही सिद्ध करता है। यहाँ क्रम और अक्रम अनेकांत से व्याप्त है इसलिए अनेकांत व्यापक है और उनसे अर्थक्रिया व्याप्य है।
वैशेषिक-हमारे यहाँ द्रव्य और पर्याय में एकांत से भेद मानने पर भी उनका प्रमेय होना अविरुद्ध ही है। उसी का स्पष्टीकरण-
द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय ये छह पदार्थ भावरूप हैं। इनमें द्रव्य के नव भेद हैं। गुण चौबीस होते हैं, कर्म पाँच हैं। सामान्य दो हैं, विशेष अनेक हैं और समवाय एक है। अभावरूप चार हैं-प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, इतरेतराभाव और अत्यंताभाव। यह सत-असत् रूप पदार्थों का वर्ग परस्पर में अत्यंत भिन्न है और प्रमाण का विषय है।
भावार्थ-वैशेषिक के द्वारा मान्य छह पदार्थों में द्रव्य के नव भेद हैं। उनके नाम-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा और मन। गुण के चौबीस भेद हैं। उनके नाम-रूप, रस, गंध, स्पर्श, संख्या, परिणाम, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, शब्द, बुद्धि, सुख, दु:ख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और संस्कार। कर्म के पाँच भेद हैं-उत्क्षेपण, अवक्षेपण, आव्रुâुंचन, प्रतारण और गमन। सामान्य के दो भेद हैं-पर सामान्य और अपर सामान्य। विशेष केवल नित्य द्रव्यों में रहता है और वह अनंत है। पूर्वोक्त नव द्रव्य और परमाणु नित्य माने गये हैं। समवाय एक ही है। अनेक भेदों को लिए हुये ये छहों पदार्थ अस्तित्व रूप हैं और प्रागभाव आदि चार प्रभाव के अभाव सर्वथा अभाव-नास्तित्व रूप हैं। ये द्रव्यगुण आदि परस्पर में, सर्वथा भिन्न-भिन्न हैं, इस प्रकार के पदार्थों को प्रमाण जानता है। ऐसा वैशेषिक ने कहा है।
जैन-ऐसी मान्यता ठीक नहीं है। क्योंकि इन सभी में अत्यंत भेद होने पर संबंध नहीं बन सकता है।
वैशेषिक-इनमें समवाय संबंध पाया जाता है।
जैन-नहीं, वह समवाय सभी में साधारणरूप से रहने से नियामक नहीं है। जैसे ज्ञान आदि का आत्मा में समवाय होता है वैसे पृथ्वी आदि में भी ज्ञान के समवाय का प्रसंग हो जावेगा। दूसरी बात यह है कि जिस प्रकार से द्रव्य से भिन्न सभी गुण अद्रव्य हैं उसी प्रकार से सत्तासामान्य से भिन्न द्रव्य आदि का भी असत्व क्यों नहीं हो जाता है ? इसमें कोई अंतर नहीं है।यदि आप कहें कि द्रव्य अनुगत स्वरूप है अर्थात् अन्वयरूप स्वरूप है। तब तो वह सामान्य ही है अर्थात् वही अन्वय स्वभाव ही तो द्रव्य होता है जो कि सत्सामान्य रूप से अस्तित्व सहित है। पुन: द्रव्य सत्सामान्य से भिन्न कहाँ रहे ? यदि आप कहें कि द्रव्य व्यावृत्त स्वरूप है, तब तो वह व्यावृत्त स्वरूप भी (पररूप से नहीं होना) विशेष ही है अर्थात् अनुगतस्वरूप और व्यावृत्तस्वरूप कहो या सामान्यस्वरूप, विशेषस्वरूप कहो एक ही बात है, इनमें कुछ अन्तर नहीं है।
इसी प्रकार से गुणादि में भी लगा लेना चाहिए अन्यथा पदार्थद्वैत का प्रसंग आ जाता है।